बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 23 नवंबर
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘निडर पत्रकारिता’ की प्रशंसा को आधार बनाकर एक ऐसा गंभीर प्रश्न उठाया है जिसने भारतीय मीडिया की वर्तमान स्थिति पर तीखी बहस छेड़ दी है। चिदंबरम अपने लेख की शुरुआत ही एक व्यंग्यात्मक वाक्य से करते हैं—“
पाठक मुझे क्षमा करें…
प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही कहा।”लेकिन इसके बाद वे जिस साहस से मीडिया में फैलते डर, दबाव और अदृश्य सेंसरशिप को उजागर करते हैं, वह पूरे विमर्श को झकझोर देता है।
प्रधानमंत्री के शब्द—या एक भूली हुई आज़ादी की प्रतिध्वनि?
चिदंबरम लिखते हैं कि प्रधानमंत्री के भाषण के शब्द इतने प्रेरणादायक थे कि कोई भी समझ सकता था कि यह तिलक, नेहरू, जेपी या मंडेला का उद्धरण है।लेकिन उनके अनुसार विडंबना यहाँ है कि ये बातें उन्हीं प्रधानमंत्री द्वारा कही जा रही हैं—जिनसे पत्रकार पिछले 11 वर्षों से संवाददाता सम्मेलन की उम्मीद कर रहे हैं,और जिनके शासनकाल में मीडिया की स्वतंत्रता लगातार संदेह के घेरे में रही है।प्रधानमंत्री ने रामनाथ गोयनका की ‘साहसी पत्रकारिता’ का स्मरण किया—वही गोयनका जिन्होंने ब्रिटिश शासन और आपातकाल—दोनों के सामने सिर झुकाने से इनकार कर दिया था।
चिदंबरम पूछते हैं—“प्रधानमंत्री ने सही कहा। लेकिन क्या आज की वास्तविकता उस साहस का साथ देती है?
गोदी मीडिया से अदृश्य सेंसरशिप—आज का भयावह परिदृश्य
चिदंबरम लिखते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन की तपिश में जन्मे अखबार आज ऐसे दौर में पहुँच गए हैं जहाँ—बड़े मीडिया संस्थानों के पाठक व दर्शक लगातार घट रहे हैं,फिर भी कई चैनल सरकारी संरक्षण और विज्ञापनों के दम पर फल-फूल रहे हैं,और पत्रकारिता का एक हिस्सा ऐसा भी है जो “सत्ता की कृपा पर निर्भर” रहता है।प्रधानमंत्री ने कहा कि “खाली संपादकीय भी शासन को चुनौती दे सकते हैं”,लेकिन चिदंबरम सवाल उठाते हैं—“आज कितने संपादक वह खाली जगह छापने का साहस रखते हैं?
डर और दमन की कहानियाँ—साहसी पत्रकारों की जगह भयग्रस्त न्यूज़रूम
चिदंबरम अपने लेख में कई मार्मिक अनुभव साझा करते हैं—
1. ‘दिन के अंत तक डेस्क खाली करो’ — एक संपादक की कहानी एक वरिष्ठ संपादक को पूर्ण वेतन देकर रातों-रात बाहर का रास्ता दिखा दिया गया—सिर्फ इसलिए क्योंकि उनकी लेखन शैली सत्ता को असहज कर रही थी।
2. ‘आधी रात का तख्तापलट’ — TRP एंकर की बर्खास्तगीएक लोकप्रिय टीवी एंकर को मालिकाना ढाँचा बदलने के साथ ही निकाल दिया गया—बिना कारण, बिना चेतावनी।
3. “मेरी नौकरी चली गई तो क्या आप नौकरी दिलाएँगे?” — युवा पत्रकार की व्यथायशवंत सिन्हा के कार्यक्रम में एक युवा पत्रकार का यह सवाल सुनकर पूरे हॉल में सन्नाटा फैल गया।सिन्हा का जवाब था—“कृपया अपनी नौकरी बचाकर रखिए।
”4. ‘मेरे माता-पिता बुजुर्ग हैं… EMI बाकी है’ — एक मजबूर रिपोर्टरएक रिपोर्टर को आधी रात को घर से खींचकर एक तैयार बयान पढ़ने को भेजा गया।उसने इनकार क्यों नहीं किया?
उसका जवाब था—“डर… नौकरी का डर।”डर, लालच और दबाव—यही है आज की मीडिया की त्रासदी
चिदंबरम लिखते हैं—कुछ पत्रकार लालच से प्रेरित होकर सत्ता का समर्थन करते हैं कुछ डर के कारण चुप रहते हैंऔर कुछ ईमानदारी से काम करते हुए हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं“ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान कराची बंदरगाह पर भारतीय नौसेना की काल्पनिक घुसपैठ जैसी खबरें इस अति-उत्साही सत्ता-प्रेरित पत्रकारिता की ही उपज हैं।
अदृश्य सेंसरशिप—सबसे खतरनाक सेंसरशिप
चिदंबरम के अनुसार—बड़े समाचार संस्थानों पर लगातार निगरानी रहती है,संपादकों को ‘मित्रवत सलाह’ के फोन किए जाते हैं,अनसुना करने पर मुसीबत खड़ी हो जाती है,कई खबरें जन्म लेने से पहले ही दबा दी जाती हैं,और कुछ प्रकाशित होने के बाद गायब कर दी जाती हैं।
वे लिखते हैं—“भारत में या तो भयग्रस्त मीडिया हो सकता है या स्वतंत्र मीडिया—दोनों साथ संभव नहीं।
क्षेत्रीय मीडिया में अब भी थोड़ी साँस, पर हिंदी मीडिया सबसे अधिक दबाव में चिदंबरम
कहते हैं कि—छोटे शहरों के अखबार क्षेत्रीय भाषाओं के डिजिटल प्लेटफॉर्म अब भी साहस दिखा रहे हैं।लेकिन उनके अनुसार—“हिंदी का बड़ा मीडिया सबसे अधिक दबाव में है और सबसे अधिक नियंत्रित।
”एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा—आज मीडिया बड़े पैमाने पर सरकारी दबाव में काम कर रहा है, सरकार के खिलाफ काम करने वाले संस्थानों पर ED–CBI के छापे पड़ते हैं,जबकि सरकार के प्रति नरम रुख रखने वाले—even कम प्रसार वाले अखबार—सरकारी विज्ञापनों और लाभ से संपन्न रहते हैं। उन्होंने कहा आज मिडिया की स्वतंत्रता लगभग खत्म होने के कगार पर है जो चिंता और चिंतन करने का समय है। उन्होंने एक चौंकाने वाली बात कही—“ऐसे कई अखबारों के असली मालिक भाजपा के मंत्री या नेता हैं—और कहावत है, ‘सैंयाँ भये कोतवाल, फिर डर काहे का।’
”निष्कर्ष:
प्रधानमंत्री ने सही कहा—पर उनकी ही कसौटी पर आज मीडिया कितना खरा उतरता है?
लेख एक सवाल पर खत्म नहीं होता—बल्कि कई गहरे सवाल खोल देता है—क्या आज का पत्रकार रामनाथ गोयनका जैसा जोखिम उठा सकता है?
क्या संपादक खाली संपादकीय के जरिए सत्ता को चुनौती दे पाएंगे?
क्या रिपोर्टर नौकरी, EMI और परिवार के भय से ऊपर उठ पाएंगे?
और सबसे महत्वपूर्ण—**क्या भारतीय मीडिया वास्तव में मुक्त है—या सिर्फ स्वतंत्र दिखने का भ्रम पैदा किया गया है?
चिदंबरम का लेख एक आलोचना नहीं—बल्कि मीडिया की आज़ादी पर मंडराते गंभीर खतरे की चेतावनी है।
