बी के झा
नई दिल्ली/लखनऊ/ढाका, 23 दिसंबर
बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा ने न केवल अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ाई है, बल्कि भारत की घरेलू राजनीति में भी तीखी बयानबाज़ी को जन्म दे दिया है। इसी कड़ी में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का बयान—
“प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बनाइए ना, फिर देखिए इंदिरा गांधी की तरह जवाब”—अब सियासी बहस के केंद्र में है।यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पर बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर कथित चुप्पी को लेकर हमला बोला था।
बीजेपी का आरोप:
‘गाजा पर बोलती हैं, बांग्लादेश पर नहीं’बीजेपी नेताओं का आरोप है कि प्रियंका गांधी“गाजा और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर मुखर रहती हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रही हिंसा पर खामोश हैं।”बांग्लादेश में हाल ही में दीपू चंद्र दास की कथित ईशनिंदा के आरोप में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या के बाद यह मुद्दा और भड़क गया। देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए और विपक्ष से स्पष्ट रुख की मांग तेज हो गई।
इमरान मसूद का पलटवार: ‘
सबसे ज़्यादा प्रियंका ने ही बोला’बीजेपी के आरोपों पर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कड़ा जवाब देते हुए कहा—“पिछली बार जब बांग्लादेश में हालात बिगड़े थे, तब सबसे ज़्यादा आवाज़ प्रियंका गांधी ने ही उठाई थी।
”उन्होंने आगे कहा—“प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बना दीजिए, फिर देखिए कैसे इंदिरा गांधी की तरह जवाब देती हैं। इंदिरा गांधी पाकिस्तान के दो टुकड़े कर आई थीं।”मसूद ने दावा किया कि प्रियंका गांधी के नेतृत्व में“बांग्लादेश भारत विरोधी अड्डा नहीं बन पाएगा।”
राहुल गांधी पर सवाल, बदला सुर
जब पत्रकारों ने पूछा—“अगर प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री बनती हैं, तो राहुल गांधी क्या करेंगे?
”तो इमरान मसूद का सुर अचानक बदल गया।उन्होंने कहा—“राहुल गांधी हमारे नेता हैं, प्रियंका गांधी के भी नेता हैं। ये इंदिरा गांधी के पोता-पोती हैं। ये एक चेहरे की दो आंखें हैं, इन्हें अलग-अलग नहीं देखना चाहिए।”उन्होंने यह भी जोड़ा कि“कौन क्या भूमिका निभाएगा, यह पार्टी तय करेगी। मैं तो एक छोटा सिपाही हूं।
”बाद में सफाई: ‘
यह काल्पनिक सवाल था’बाद में एक टीवी इंटरव्यू में इमरान मसूद ने सफाई देते हुए कहा कि“मुझसे एक काल्पनिक सवाल पूछा गया था—
अगर प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री होतीं, तो क्या करतीं?
मैंने उसी संदर्भ में जवाब दिया।”उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा—“प्रियंका गांधी सिर्फ भाषण नहीं देतीं, बल्कि इंदिरा गांधी की तरह ठोस कार्रवाई करतीं।
”शशि थरूर पर भी निशाना
इमरान मसूद ने कांग्रेस नेता शशि थरूर पर भी टिप्पणी करते हुए कहा—“वह दिशा भ्रमित हो गए हैं। जिस विचारधारा को लेकर जीते, उसी के खिलाफ बोल रहे हैं।
”राजनीतिक विश्लेषण:
नेतृत्व बनाम भावनात्मक राजनीति राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही अंतर्ध्वनिऔर बांग्लादेश मुद्दे पर स्पष्ट रणनीति के अभाव को उजागर करता है।
एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार—“इमरान मसूद का बयान भावनात्मक है, लेकिन इससे यह सवाल भी उठता है कि कांग्रेस विदेश नीति पर संस्थागत लाइन क्यों नहीं तय कर पा रही।
”शिक्षाविदों की राय
: विदेश नीति व्यक्तियों से नहीं, संस्थाओं से चलती है अंतरराष्ट्रीय राजनीति के शिक्षाविदों का कहना है—“भारत जैसे देश की विदेश नीति व्यक्तित्व आधारित नहीं हो सकती। इंदिरा गांधी का उदाहरण देना ऐतिहासिक रूप से आकर्षक है, लेकिन आज का वैश्विक परिदृश्य बिल्कुल अलग है।”उनके मुताबिक,“बयानबाज़ी और रणनीतिक कार्रवाई में फर्क समझना ज़रूरी है।”
हिंदू संगठनों का सवाल:
‘कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं?
’कुछ हिंदू संगठनों ने इस बहस को एक कदम आगे ले जाते हुए कहा—“अगर आज इंदिरा गांधी जैसी प्रधानमंत्री होतीं, तो बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार का मुंहतोड़ जवाब दिया जाता।”उनका आरोप है कि“प्रधानमंत्री मोदी इस्लामी देशों में अपनी छवि को लेकर सतर्क हैं, इसलिए बांग्लादेश पर खुलकर दबाव नहीं बना रहे।”
हिंदू धर्म गुरुओं की प्रतिक्रिया
कुछ धर्मगुरुओं ने कहा—“हिंदुओं पर अत्याचार का मुद्दा केवल राजनीति नहीं, सभ्यतागत चिंता है। सरकार को धर्मनिरपेक्षता और कूटनीति के साथ-साथ नैतिक साहस भी दिखाना चाहिए।”
कानूनविदों की राय:
सीमित हस्तक्षेप की बाध्यता संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों का कहना है—“किसी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संभव नहीं है।”हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि“कूटनीतिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुद्दा उठाना और शरणार्थी नीति—ये सभी विकल्प खुले हैं।
”रक्षा विशेषज्ञ
: भावनाओं से नहीं, रणनीति से चलेगा समाधान रक्षा और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों ने चेताया कि—“1971 की तुलना आज के बांग्लादेश से करना रणनीतिक भूल हो सकती है।”उनके अनुसार—“भारत को भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि बहुपक्षीय दबाव, खुफिया सहयोग और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।
”निष्कर्ष:
बयान से आगे नीति की ज़रूरत इमरान मसूद का बयान भले ही सुर्खियों में हो, लेकिन असली सवाल अब भी कायम है—बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा के लिए भारत की ठोस नीति क्या है?
बीजेपी इसे विपक्ष की दोहरी राजनीति बता रही है कांग्रेस इसे नैतिक साहस का सवाल कह रही है और विशेषज्ञ इसे कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा मान रहे हैं स्पष्ट है कि बयानबाज़ी से आगे बढ़कर अब नीति, दबाव और रणनीति की ज़रूरत है।
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