बी के झा
NSK

नई दिल्ली / कोलकाता, 9 मई
पश्चिम बंगाल की राजनीति में वर्ष 2026 का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन भर नहीं, बल्कि एक लंबे वैचारिक संघर्ष, राजनीतिक धैर्य और संगठनात्मक तपस्या की परिणति के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार बंगाल की सत्ता पर निर्णायक विजय प्राप्त कर इतिहास रच दिया है। इस ऐतिहासिक अवसर पर केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah ने मुख्यमंत्री पद के लिए Suvendu Adhikari के नाम की घोषणा करते हुए जहां भाजपा कार्यकर्ताओं के दशकों लंबे संघर्ष को याद किया, वहीं एक ऐसी महिला विधायक का उल्लेख कर पूरे सभागार को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया, जिसकी कहानी आज बंगाल की नई सामाजिक-राजनीतिक तस्वीर का प्रतीक बन चुकी है।
अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह जीत अचानक नहीं आई है। इसके पीछे वर्षों की वैचारिक यात्रा, राजनीतिक संघर्ष और कार्यकर्ताओं का बलिदान छिपा है। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2015 में बंगाल विधानसभा में भाजपा का खाता तक नहीं था, लेकिन 2026 में पार्टी 207 सीटों के विशाल बहुमत तक पहुंच गई। शाह ने कहा कि इस सफर की कीमत भी पार्टी ने भारी चुकाई है। उनके अनुसार, बंगाल में भाजपा के 321 कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों की आहुति दी, तब जाकर यह ऐतिहासिक दिन आया है।
अपने भाषण के दौरान अमित शाह ने कुछ खास विजयी प्रत्याशियों का उल्लेख करते हुए उनके राजनीतिक और सामाजिक महत्व को रेखांकित किया। लेकिन सबसे अधिक भावुक क्षण तब आया जब उन्होंने औसग्राम विधानसभा सीट से जीतकर आईं भाजपा विधायक Kalita Majhi का नाम लिया।
शाह ने मंच से कहा—“कलिता माझी के लिए ताली बजाओ जरा।” इसके बाद पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।दरअसल, कलिता माझी की कहानी साधारण राजनीतिक जीत की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मसम्मान और सामाजिक बदलाव की जीवंत मिसाल बनकर उभरी है। अत्यंत गरीब परिवार से आने वाली कलिता कभी दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर अपना जीवनयापन करती थीं। आर्थिक अभावों के बावजूद उन्होंने राजनीतिक सक्रियता नहीं छोड़ी।
वर्ष 2014 में वह भाजपा की एक बूथ एजेंट थीं। संगठन के प्रति समर्पण और मेहनत के कारण धीरे-धीरे पार्टी में उनकी पहचान मजबूत होती गई।भाजपा ने 2021 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें उम्मीदवार बनाया था, लेकिन तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, पराजय ने उनके हौसले को कमजोर नहीं किया। उन्होंने जनता के बीच अपनी सक्रियता बनाए रखी और अंततः 2026 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार श्यामा प्रसन्ना लोहार को 12,535 वोटों के अंतर से हराकर विधानसभा पहुंच गईं।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि पार्टी की जिला महासचिव बनने के बाद भी कलिता माझी घरेलू सहायिका का काम करती रहीं। स्वयं कलिता ने स्वीकार किया कि टिकट मिलने के बाद भी लगभग एक सप्ताह तक उन्होंने घरों में काम किया, लेकिन नामांकन और चुनाव प्रचार में व्यस्तता बढ़ने के बाद उन्हें यह काम छोड़ना पड़ा। यही कारण है कि अमित शाह ने उन्हें “बंगाल की गरीब महिलाओं के लिए आशा का प्रतीक” बताया।अपने भाषण में शाह ने पानीहाटी से विजयी रत्ना देवनाथ और संदेशखाली आंदोलन से चर्चित हिंगलगंज की प्रत्याशी रेखा पात्रा का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि इन महिलाओं ने बंगाल की माताओं-बहनों पर हुए अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनकर जनता का विश्वास जीता है।
अमित शाह ने भाजपा की इस जीत को केवल राजनीतिक उपलब्धि मानने से इनकार करते हुए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि अब पश्चिम बंगाल में घुसपैठ और गौतस्करी पर निर्णायक रोक लगेगी। शाह के अनुसार, “गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा की सरकार” बनना राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने इस विजय को Syama Prasad Mukherjee की वैचारिक विरासत की जीत करार दिया। शाह ने कहा कि 1950 में जनसंघ की स्थापना के साथ शुरू हुई वैचारिक यात्रा आखिरकार 2026 में बंगाल की धरती पर सत्ता तक पहुंची है। उनके अनुसार, यह केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि दशकों पुराने राजनीतिक स्वप्न की ऐतिहासिक पूर्ति है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह बदलाव आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। भाजपा जहां इसे वैचारिक विजय और संगठनात्मक संघर्ष का परिणाम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे बंगाल की पारंपरिक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देख रहा है।
लेकिन इन तमाम राजनीतिक विमर्शों के बीच कलिता माझी जैसी महिला की कहानी इस चुनाव की सबसे मानवीय और प्रेरक तस्वीर बनकर उभरी है—
एक ऐसी तस्वीर, जिसमें संघर्ष की धूल से उठकर लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था तक पहुंचने का सपना सच होता दिखाई देता है।
