बिहार NDA में शराबबंदी पर संग्राम: CM बोले लागू रहेगी नीति, मांझी ने कहा- ‘सम्राट जी विचार करें’; सत्ता गलियारों में बढ़ी सियासी गर्मी

बी के झा

NSK

पटना, 19 अप्रैल

बिहार में नई सरकार के गठन के साथ ही सत्ता के भीतर पहला बड़ा वैचारिक टकराव सामने आ गया है। मुद्दा है—शराबबंदी कानून।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ शब्दों में कहा है कि राज्य में शराबबंदी जारी रहेगी और इस पर पुनर्विचार का कोई प्रश्न नहीं उठता। लेकिन उनके इस बयान के कुछ ही घंटों बाद केंद्रीय मंत्री और एनडीए के वरिष्ठ सहयोगी जीतन राम मांझी ने समीक्षा की मांग दोहराते हुए संकेत दे दिया कि गठबंधन के भीतर राय एक नहीं है।बिहार की राजनीति में यह बहस अब केवल शराब नीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि सरकार की स्थिरता, भाजपा के आंतरिक समीकरण, एनडीए की एकजुटता और आने वाले चुनावी गणित तक पहुंच गई है।

मुख्यमंत्री का स्पष्ट संदेश

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि बिहार में शराबबंदी लागू रहेगी और सरकार इसे जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके बयान को सरकार की आधिकारिक लाइन माना जा रहा है।राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह संदेश महिलाओं, ग्रामीण मतदाताओं और सामाजिक संगठनों को भरोसा दिलाने के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि शराबबंदी लंबे समय से बिहार की संवेदनशील सामाजिक नीति रही है।

मांझी का जवाब: नीति ठीक, क्रियान्वयन गलत

पटना में मीडिया से बातचीत करते हुए जीतन राम मांझी ने कहा कि मुख्यमंत्री बने अभी कुछ ही दिन हुए हैं, आगे सभी लोग बैठकर विचार करेंगे और लाभ-हानि देखकर निर्णय लेंगे।उन्होंने कहा कि उनका पुराना रुख आज भी वही है—शराबबंदी की भावना गलत नहीं, लेकिन उसका क्रियान्वयन गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है।मांझी ने दावा किया कि प्रतिबंध के कारण अवैध शराब का कारोबार बढ़ा है, जिसमें जहरीले रसायनों का इस्तेमाल होता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान गरीब तबके को उठाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि समीक्षा कर कानून को व्यावहारिक और मानवीय बनाया जाना चाहिए।

NDA के भीतर बढ़ते मतभेद

एनडीए के कई घटक दलों और नेताओं ने समय-समय पर शराबबंदी पर अलग राय रखी है। कुछ नेता इसे सामाजिक सुधार बताते हैं, तो कुछ इसे आर्थिक और प्रशासनिक विफलता मानते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नई सरकार बनने के तुरंत बाद ऐसा सार्वजनिक मतभेद यह संकेत देता है कि गठबंधन के भीतर कई मुद्दे अभी सुलझे नहीं हैं।

भाजपा के अंदर भी असंतोष?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा के भीतर सभी धड़े संतुष्ट नहीं हैं। कुछ पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं में यह भावना बताई जा रही है कि लंबे समय से संगठन खड़ा करने वाले चेहरों की अपेक्षाओं को नजरअंदाज किया गया।विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह असंतोष खुलकर सामने आया तो सरकार के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। हालांकि भाजपा नेतृत्व अब तक सार्वजनिक रूप से एकजुटता का संदेश दे रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक शराबबंदी पर विवाद के पीछे केवल नीति नहीं, बल्कि व्यापक सत्ता संतुलन का प्रश्न है।उनके अनुसार:मुख्यमंत्री अपनी प्रशासनिक पकड़ दिखाना चाहते हैं।सहयोगी दल अपनी राजनीतिक उपयोगिता बनाए रखना चाहते हैं।भाजपा के भीतर नेतृत्व परिवर्तन के बाद नई शक्ति संरचना बन रही है।

वहीं विपक्ष इस मतभेद को बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है।

शिक्षाविदों का दृष्टिकोण

शिक्षाविदों का मानना है कि शराबबंदी जैसी नीति का मूल्यांकन केवल राजनीति से नहीं, बल्कि सामाजिक प्रभाव के आधार पर होना चाहिए।उनका कहना है कि सरकार को यह देखना चाहिए:

महिलाओं की सुरक्षा पर क्या असर पड़ा?

घरेलू हिंसा में कमी आई या नहीं?

अवैध शराब का जाल कितना फैला?

गरीब परिवारों की आय पर क्या असर हुआ?

युवाओं में नशे की प्रवृत्ति घटी या बदली?

कानूनविदों की प्रतिक्रिया

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी कठोर कानून की सफलता उसके निष्पक्ष और व्यावहारिक क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।उन्होंने कहा कि यदि निर्दोष लोग फंस रहे हों, जेलों पर बोझ बढ़ रहा हो, और अवैध तंत्र मजबूत हो रहा हो, तो कानून की समीक्षा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।कानूनविदों ने सुझाव दिया कि सरकार:

छोटे अपराध और बड़े तस्करों में अंतर करे।

तेज न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करे।

पुनर्वास और नशामुक्ति कार्यक्रम बढ़ाए।

पुलिस जवाबदेही तय करे।

विपक्ष का हमला

विपक्षी दलों ने इस पूरे विवाद को सरकार की “अंदरूनी खींचतान” बताया है। विपक्ष का कहना है कि नई सरकार बनने के कुछ दिनों में ही यदि नीति पर एक राय नहीं है, तो शासन कैसे चलेगा?

विपक्ष ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष जनता के मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, महंगाई और कानून व्यवस्था—से ध्यान हटाने के लिए शराबबंदी बहस को हवा दे रहा है।

आगे क्या?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार शराबबंदी पर समीक्षा समिति बनाएगी, या मुख्यमंत्री की घोषणा अंतिम मानी जाएगी? यदि सहयोगी दल दबाव बढ़ाते हैं, तो आने वाले दिनों में नीति में संशोधन, सख्ती या नई व्यवस्था की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

बिहार में शराबबंदी पर छिड़ी बहस ने साफ कर दिया है कि नई सरकार के सामने चुनौतियां केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि भीतर से भी हैं। सम्राट चौधरी के नेतृत्व, एनडीए की एकजुटता और भाजपा के आंतरिक संतुलन की पहली परीक्षा शुरू हो चुकी है।

आने वाले दिन तय करेंगे कि यह मतभेद सिर्फ बयानबाजी है या बड़े राजनीतिक भूचाल की आहट।

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