बेंगलूरु से नागपुर तक सियासत गरम:” कर्नाटक का हक गुजरात नहीं ले जाने दूंगा’: CM बनने से पहले ही डीके के तेवर, उधर पवार परिवार से रिश्तेदारी पर BJP का बड़ा दांव,

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 2 जुन

कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन का औपचारिक अध्याय अभी शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन भावी मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने अपने राजनीतिक इरादे साफ कर दिए हैं। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही उन्होंने कर्नाटक की क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा उठाते हुए गुजरात पर निशाना साधा है।

दूसरी तरफ महाराष्ट्र में भाजपा ने विधान परिषद चुनाव में ऐसा दांव चला है जिसने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। भाजपा ने उद्योगपति अरुण लखानी को उम्मीदवार बनाया है, जिनके बेटे की शादी जल्द ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद गुट) की सांसद सुप्रिया सुले की बेटी से होने वाली है।

दो राज्यों की ये अलग-अलग घटनाएं

भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र, क्षेत्रीय पहचान और व्यक्तिगत रिश्तों से परे राजनीतिक रणनीतियों की नई तस्वीर पेश कर रही हैं।

मुख्यमंत्री बनने से पहले ही डीके का शक्ति प्रदर्शन

कर्नाटक के भावी मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आईपीएल फाइनल की मेजबानी को लेकर गुजरात पर प्रभाव के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि भविष्य में कर्नाटक का अधिकार किसी दूसरे राज्य को न मिले।आरसीबी की खिताबी जीत के उत्साह के बीच दिया गया उनका बयान केवल खेल आयोजन तक सीमित नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह क्षेत्रीय स्वाभिमान और “कर्नाटक फर्स्ट” की राजनीति का शुरुआती संकेत है।

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. सुधांशु त्रिवेदी कहते हैं,”डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनने से पहले ही यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी सरकार दिल्ली या किसी अन्य शक्ति केंद्र के दबाव में नहीं चलेगी। यह बयान आने वाले समय में कर्नाटक की क्षेत्रीय राजनीति का स्वर तय कर सकता है।”

कर्नाटक बनाम गुजरात: केवल क्रिकेट नहीं, राजनीतिक संदेश भी

आईपीएल फाइनल की मेजबानी को लेकर उठे विवाद को कई विशेषज्ञ व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देख रहे हैं।शिक्षाविद और राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. रमेश कुलकर्णी का कहना है,”जब कोई मुख्यमंत्री बनने वाला नेता खेल आयोजन को क्षेत्रीय अधिकार से जोड़ता है, तो उसका संदेश केवल क्रिकेट प्रशंसकों के लिए नहीं होता। वह राज्य की जनता को यह भरोसा दिलाना चाहता है कि उनके हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।”हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि खेल आयोजनों के निर्णय पेशेवर और प्रशासनिक आधार पर लिए जाते हैं, उन्हें राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है।

दिल्ली में सरकार गठन की कवायद

डीके शिवकुमार और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धरमैया की दिल्ली यात्रा इस बात का संकेत है कि नई सरकार के गठन को लेकर पार्टी नेतृत्व बेहद सतर्क है। मंत्रिमंडल गठन, क्षेत्रीय संतुलन, जातीय प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक समीकरणों को साधना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, नई सरकार विकास, निवेश और रोजगार को प्राथमिकता देने का संदेश देना चाहती है।उधर महाराष्ट्र में BJP का ‘रिश्तेदारी कार्ड’कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता हस्तांतरण की तैयारी कर रही है तो महाराष्ट्र में भाजपा ने एक ऐसा राजनीतिक कदम उठाया है जिसने विरोधियों को भी चौंका दिया है।विधान परिषद चुनाव के लिए भाजपा ने उद्योगपति अरुण लखानी को उम्मीदवार बनाया है। खास बात यह है कि लखानी के बेटे सारंग की शादी इसी महीने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद गुट) की सांसद सुप्रिया सुले की बेटी रेवती से होने वाली है। राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा की रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।

रिश्ते अलग, राजनीति अलग

अरुण लखानी ने स्पष्ट किया है कि पारिवारिक रिश्तों और राजनीतिक विचारधाराओं को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता रखने का अधिकार है और रिश्तेदारी का राजनीतिक निर्णयों से कोई संबंध नहीं होना चाहिए।

भाजपा की प्रतिक्रिया: योग्यता के आधार पर चयन

भाजपा नेताओं का कहना है कि लखानी को उनकी सामाजिक भागीदारी, संगठनात्मक जुड़ाव और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर उम्मीदवार बनाया गया है।पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार,”भाजपा किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी योग्यता, सामाजिक योगदान और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता से करती है। पारिवारिक रिश्ते लोकतांत्रिक राजनीति का निर्धारण नहीं करते।”भाजपा का दावा है कि विदर्भ क्षेत्र में लखानी की मजबूत पकड़ और सामाजिक नेटवर्क उन्हें स्वाभाविक उम्मीदवार बनाते हैं।

विपक्ष का हमला

कांग्रेस और विपक्षी दलों ने इस फैसले को लेकर भाजपा पर निशाना साधा है।कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि भाजपा अब जमीनी कार्यकर्ताओं की बजाय उद्योगपतियों और प्रभावशाली व्यक्तियों को प्राथमिकता दे रही है।विपक्ष का तर्क है कि इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ सकता है।हालांकि शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता संजय राउत ने अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अरुण लखानी लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निकट रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी में कोई असामान्य बात नहीं है।

कानूनविदों का दृष्टिकोण

संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता अजय देशमुख का कहना है,”भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी परिवारों के बीच भी सामाजिक संबंध हो सकते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था व्यक्ति को राजनीतिक और निजी जीवन अलग रखने की स्वतंत्रता देती है।”उनके अनुसार, रिश्तेदारी को राजनीतिक निष्ठा का पैमाना मानना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं होगा।

बदलती राजनीति का नया चेहरा

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भारतीय राजनीति अब केवल दलों की लड़ाई नहीं रह गई है। क्षेत्रीय अस्मिता, व्यक्तिगत संबंध, संगठनात्मक ताकत और जनधारणा—सभी मिलकर नए समीकरण बना रहे हैं।

कर्नाटक में डीके शिवकुमार का आक्रामक क्षेत्रीय रुख और महाराष्ट्र में भाजपा का अप्रत्याशित उम्मीदवार चयन इसी बदलती राजनीति के संकेत हैं।

निष्कर्ष

एक ओर कर्नाटक में नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे डीके शिवकुमार क्षेत्रीय अधिकारों और राज्य हितों की राजनीति को धार देने की तैयारी में दिख रहे हैं। दूसरी ओर महाराष्ट्र में भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि राजनीतिक विचारधारा और पारिवारिक रिश्ते दो अलग-अलग दुनिया हैं।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कर्नाटक में डीके का आक्रामक राजनीतिक अंदाज कितना असर छोड़ता है और महाराष्ट्र में भाजपा का यह दांव चुनावी तौर पर कितना सफल साबित होता है। फिलहाल इतना तय है कि भारतीय राजनीति में घटनाएं जितनी तेजी से बदल रही हैं, उतनी ही तेजी से नए समीकरण भी जन्म ले रहे हैं।

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