रामलला के चढ़ावे पर सवाल: नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा, क्या केवल कर्मचारियों की करतूत या व्यवस्था की बड़ी विफलता?

बी के झा

NSK News

अयोध्या, यूपी/ न ई दिल्ली, 26 जुन

40 दिनों में 70 संदिग्ध घटनाओं के दावे के बाद बढ़ी जांच की आंच, ट्रस्ट की जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस

देश की करोड़ों हिंदू आस्थाओं के केंद्र श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के मामले ने अब नया और महत्वपूर्ण मोड़ ले लिया है। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय तथा ट्रस्ट सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा ने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। यद्यपि दोनों के विरुद्ध इस समय तक कोई औपचारिक एफआईआर दर्ज नहीं है और न ही जांच एजेंसियों ने उन्हें दोषी घोषित किया है, लेकिन उनके इस्तीफे ने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है।

विशेष जांच दल (SIT) की प्रारंभिक रिपोर्ट में चढ़ावा प्रबंधन प्रणाली, नकदी की गिनती, आंतरिक निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था में कई गंभीर कमियों का उल्लेख किए जाने के बाद अब पूरे देश में यह चर्चा का विषय बन गया है कि इतनी संवेदनशील व्यवस्था में कथित अनियमितताएं आखिर संभव कैसे हुईं।

सबसे पहले चंपत राय से हुई पूछताछ

सूत्रों के अनुसार जब SIT ने मंदिर परिसर में जांच शुरू की तो सबसे पहले महासचिव चंपत राय से विस्तृत पूछताछ की गई। अभी तक की जांच में उन्हें प्रत्यक्ष रूप से दोषी नहीं ठहराया गया है, लेकिन जांच एजेंसी ने किसी को भी क्लीन चिट नहीं दी है।जांच का फोकस इस बात पर है कि यदि चढ़ावे के संग्रहण और गिनती की संपूर्ण व्यवस्था ट्रस्ट के शीर्ष अधिकारियों की निगरानी में थी, तो कथित चोरी और गबन लंबे समय तक कैसे चलता रहा।

राम मंदिर निर्माण के सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहे चंपत राय

साल 1946 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर में जन्मे चंपत राय बंसल लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े रहे। पेशे से रसायन विज्ञान के शिक्षक रहे चंपत राय ने बाद में पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक चले राम जन्मभूमि मुकदमे के दौरान दस्तावेजों के संकलन और समन्वय में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती रही।

2020 के भूमि पूजन से लेकर 2024 की प्राण प्रतिष्ठा तक

मंदिर निर्माण से जुड़े लगभग सभी प्रमुख निर्णयों और आयोजनों में वे केंद्रीय भूमिका निभाते रहे।

जांच के घेरे में आई चढ़ावा प्रबंधन व्यवस्था

जांच एजेंसियों के अनुसार मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे के संग्रहण, गिनती और बैंक में जमा कराने की प्रक्रिया पर शीर्ष स्तर की निगरानी थी।आरोप है कि चढ़ावा गिनने के कार्य में कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति सिफारिश के आधार पर हुई। जांच में यह भी सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपियों में शामिल रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव मंदिर व्यवस्था में अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभा रहा था।पुलिस के अनुसार टिन्नू यादव के पास दान पात्रों, कैश कलेक्शन सेंटर और नोट गिनने वाले कक्ष की चाबियों की जिम्मेदारी थी। यही नहीं, बैंक तक नकदी पहुंचाने की प्रक्रिया में भी उसकी भूमिका बताई जा रही है।

डॉ. अनिल मिश्रा भी जांच के दायरे में

ट्रस्ट सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा, जो पेशे से होम्योपैथ चिकित्सक हैं, मंदिर के चढ़ावा कलेक्शन सेंटर की निगरानी से जुड़े बताए जाते हैं।जांच में यह भी देखा जा रहा है कि कलेक्शन सेंटर के प्रभारी रहे सुभाष श्रीवास्तव की नियुक्ति किन परिस्थितियों में हुई तथा वित्तीय नियंत्रण प्रणाली में किस स्तर तक निगरानी बरती गई।हालांकि डॉ. अनिल मिश्रा ने भी नैतिक आधार पर इस्तीफा दिया है, लेकिन उनके विरुद्ध अभी तक कोई आपराधिक आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है।

40 दिनों में 70 संदिग्ध गतिविधियों का दावा

SIT ने 27 अप्रैल से 5 जून तक की सीसीटीवी फुटेज का परीक्षण किया। जांच एजेंसी के अनुसार लगभग 70 संदिग्ध घटनाएं सामने आई हैं, जिनकी विस्तृत जांच जारी है।पुलिस ने अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया है। उनके पास से लगभग 79.84 लाख रुपये बरामद करने का दावा किया गया है। इन दावों का अंतिम परीक्षण न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर होगा।

चंपत राय पर क्यों उठ रहे सवाल?

जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार कुछ प्रमुख प्रश्नों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है—यदि पूरी व्यवस्था शीर्ष स्तर की निगरानी में थी तो कथित चोरी लंबे समय तक क्यों नहीं पकड़ी गई?

आंतरिक ऑडिट और निरीक्षण व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं रही?

नियुक्तियों और जिम्मेदारियों का निर्धारण किस प्रक्रिया से हुआ?चढ़ावा प्रबंधन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पूरी तरह पालन क्यों नहीं हुआ? इन प्रश्नों के उत्तर जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे।

मुख्यमंत्री योगी की सख्त चेतावनी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि “जनआस्था के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। जिसने भी अपराध किया है, उसके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई होगी। दूध का दूध और पानी का पानी करके रहेंगे।”मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी और दोषी चाहे किसी भी स्तर का व्यक्ति क्यों न हो, कानून अपना काम करेगा।

विपक्ष ने सरकार से मांगी जवाबदेही

विपक्षी दलों ने इस पूरे प्रकरण को केवल कर्मचारियों की कथित करतूत मानने के बजाय ट्रस्ट की प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बताया है। विपक्ष का कहना है कि जब देशभर से करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है तो उसकी निगरानी और लेखा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। विपक्ष ने मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला धार्मिक आस्था से अधिक सुशासन और संस्थागत जवाबदेही की कसौटी बन गया है। उनके अनुसार यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से पूरी होती है तो इससे सार्वजनिक संस्थानों में विश्वास मजबूत होगा। वहीं यदि किसी स्तर पर लीपापोती की आशंका बनी तो इसका राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक हो सकता है।

कानूनविद क्या कहते हैं?

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जांच में वित्तीय गबन, आपराधिक विश्वासघात, दस्तावेजों में हेराफेरी या आपराधिक षड्यंत्र के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो संबंधित व्यक्तियों पर भारतीय दंड संहिता और अन्य लागू कानूनों के तहत कठोर कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी का निर्धारण केवल न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए।

शिक्षाविदों और प्रशासनिक विशेषज्ञों की राय

शिक्षाविदों और प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े संस्थानों में केवल धार्मिक अनुशासन ही नहीं, बल्कि आधुनिक वित्तीय प्रबंधन, डिजिटल ऑडिट, स्वतंत्र लेखा परीक्षण, बायोमेट्रिक निगरानी और बहुस्तरीय जवाबदेही प्रणाली भी अनिवार्य होनी चाहिए। इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की संभावना काफी कम हो सकती है।

निष्कर्ष

राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला केवल धन के दुरुपयोग का आरोप नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास और देश की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता की परीक्षा भी है। चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के नैतिक आधार पर दिए गए इस्तीफों ने जांच को नया आयाम दिया है, लेकिन किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण केवल निष्पक्ष जांच और न्यायालय के निर्णय से ही होगा।

पूरे देश की निगाहें अब SIT की अंतिम रिपोर्ट और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं।

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