“सत्ता परिवर्तन से पहले खून की सियासत: शुभेंदु अधिकारी के करीबी की हत्या से दहला बंगाल, CM चेहरे पर भी तेज हुई जंग”

बी के झा

NSK

कोलकाता/ न ई दिल्ली, 7 मई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की आहट के बीच हुई यह सनसनीखेज हत्या केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि राज्य की बदलती राजनीतिक धुरी, प्रशासनिक विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक वातावरण पर गंभीर प्रश्नचिह्न बनकर उभरी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता Suvendu Adhikari के करीबी सहयोगी चंद्रनाथ रथ की हत्या ने उस समय पूरे बंगाल को झकझोर दिया, जब राज्य में भाजपा ऐतिहासिक विजय के बाद सरकार गठन की तैयारी में जुटी है।उत्तरी 24 परगना के मध्यमग्राम इलाके में हुई इस घटना ने एक बार फिर बंगाल की हिंसक राजनीतिक संस्कृति को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बाइक सवार हमलावरों ने बेहद पेशेवर अंदाज में चंद्रनाथ रथ की कार को रोका और पॉइंट ब्लैंक रेंज से गोलियां बरसा दीं। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। डॉक्टरों ने पुष्टि की कि उनकी छाती और पेट में कई गोलियां लगी थीं।“यह सिर्फ हत्या नहीं, सत्ता संघर्ष का खूनी संदेश”घटना के बाद भावुक लेकिन आक्रामक तेवर में दिखे शुभेंदु अधिकारी ने इसे “पूर्व नियोजित राजनीतिक हत्या” करार दिया। उन्होंने कहा कि हमलावर कई दिनों से रेकी कर रहे थे और पूरी साजिश सुनियोजित थी।

अधिकारी ने सीधे तौर पर राज्य के पिछले शासनकाल पर निशाना साधते हुए कहा कि बंगाल “15 वर्षों के महा-जंगलराज” का शिकार रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी का यह बयान केवल शोक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि नई सत्ता व्यवस्था का राजनीतिक उद्घोष भी है। कोलकाता विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के शिक्षाविदों का कहना है कि बंगाल की राजनीति लंबे समय से “कैडर कंट्रोल” और “सड़क आधारित शक्ति प्रदर्शन” पर आधारित रही है। ऐसे में सत्ता परिवर्तन के संक्रमण काल में हिंसक घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है।

राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर अरिंदम मुखर्जी का कहना है—

“बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार के करीबी की हत्या यह संकेत देती है कि सत्ता परिवर्तन को लेकर जमीनी स्तर पर जबरदस्त असुरक्षा और प्रतिरोध मौजूद है। यह घटना आने वाली सरकार के लिए कानून-व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा होगी।

”कानूनविदों ने उठाए गंभीर सवाल

संवैधानिक मामलों के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस घटना को राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर धब्बा बताया है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी प्रमुख राजनीतिक नेता के सहयोगी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही, तो आम नागरिकों की स्थिति और अधिक चिंताजनक हो सकती है।सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता समूहों ने मांग की है कि इस हत्याकांड की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या विशेष जांच दल (SIT) को सौंपी जाए। कई कानूनविदों का यह भी मत है कि यदि राजनीतिक प्रतिशोध की पुष्टि होती है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरनाक संकेत माना जाएगा।

स्थानीय हिन्दू संगठनों में आक्रोश

घटना के बाद कई स्थानीय हिन्दू संगठनों और सामाजिक मंचों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। संगठनों का आरोप है कि बंगाल लंबे समय से राजनीतिक हिंसा और भय के वातावरण में जी रहा है। कई स्थानों पर विरोध मार्च और श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की गईं।कुछ संगठनों ने इसे “हिंदुत्व समर्थक नेतृत्व को डराने की कोशिश” बताया, जबकि अन्य समूहों ने नई सरकार से अपराध और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गिरोहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की।

विपक्ष ने भाजपा पर साधा निशाना

दूसरी ओर Mamata Banerjee की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर “राजनीतिक ध्रुवीकरण” का आरोप लगाया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि भाजपा घटना की निष्पक्ष जांच से पहले ही राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रही है।तृणमूल नेताओं ने बयान जारी कर कहा कि किसी भी हत्या को राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है और पुलिस को स्वतंत्र रूप से जांच करने देना चाहिए। वाम दलों ने भी बंगाल की राजनीति में बढ़ती आक्रामकता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि “सत्ता परिवर्तन के साथ प्रतिशोध की राजनीति लोकतंत्र को कमजोर करेगी।

”मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सस्पेंस

इसी उथल-पुथल के बीच बंगाल की राजनीति का दूसरा बड़ा केंद्रबिंदु मुख्यमंत्री पद की दौड़ बन गया है। भाजपा की प्रचंड जीत के बाद सबसे अधिक चर्चा शुभेंदु अधिकारी के नाम की है, जिन्होंने भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को हराकर राजनीतिक इतिहास रच दिया।लेकिन अचानक दिल्ली पहुंचीं भाजपा नेता Agnimitra Paul ने सियासी गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया है। आसनसोल दक्षिण से भारी मतों से जीत दर्ज करने वाली अग्निमित्रा पॉल को पार्टी की आक्रामक और लोकप्रिय महिला चेहरों में गिना जाता है। हाल ही में उन्हें भाजपा की प्रदेश इकाई का उपाध्यक्ष भी बनाया गया था।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा इस बार बंगाल में “सामाजिक संतुलन” और “नए प्रतीकवाद” की राजनीति खेल सकती है। यदि पार्टी महिला मुख्यमंत्री के विकल्प पर विचार करती है, तो अग्निमित्रा पॉल का नाम गंभीरता से लिया जा सकता है। हालांकि पार्टी के अंदरूनी सूत्र अब भी शुभेंदु अधिकारी को सबसे मजबूत दावेदार मान रहे हैं।

भाजपा की चुनौती: जीत से शासन तक

भाजपा ने 293 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है। लेकिन अब चुनौती केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि उस बंगाल को स्थिरता देने की है जो वर्षों से राजनीतिक हिंसा, वैचारिक संघर्ष और सड़क आधारित सत्ता संस्कृति से जूझता रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि नई सरकार का पहला मूल्यांकन इसी आधार पर होगा कि वह कानून-व्यवस्था, राजनीतिक प्रतिशोध और प्रशासनिक निष्पक्षता को कैसे संभालती है।

चंद्रनाथ रथ की हत्या ने भाजपा के लिए सत्ता संभालने से पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल की असली लड़ाई चुनाव जीतने से कहीं अधिक कठिन है।

अब पूरे देश की निगाहें 8 मई को होने वाली भाजपा विधायक दल की बैठक पर टिकी हैं, जहां बंगाल के अगले मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर लग सकती है।

लेकिन उससे पहले यह हत्या राज्य की राजनीति में भय, शक्ति और प्रतिशोध के उस पुराने अध्याय की याद दिला गई है, जिससे बाहर निकलना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

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