सत्ता, संपत्ति और सामाजिक संदेश: बिहार मंत्रिमंडल में 32 करोड़पति, 10 मंत्री मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से भी अधिक धनी

बी के झा

NSK

पटना, 10 मई

बिहार की राजनीति एक बार फिर संपत्ति और सत्ता के रिश्ते को लेकर चर्चा के केंद्र में है। राज्य सरकार के मंत्रियों की घोषित संपत्ति का आंकड़ा सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर गांव-गांव की चौपालों तक बहस छिड़ गई है।मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई वाली सरकार में शामिल 35 मंत्रियों में से 32 करोड़पति हैं, जबकि केवल तीन मंत्री ही ऐसे हैं जिनकी संपत्ति लाखों में है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार के 10 मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री से भी अधिक संपत्ति के मालिक हैं।यह आंकड़े केवल व्यक्तिगत संपन्नता की कहानी नहीं कहते, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक संस्कृति, चुनावी व्यवस्था और सत्ता के आर्थिक चरित्र की भी झलक पेश करते हैं।

मुख्यमंत्री से भी अधिक धनी मंत्री

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी घोषित संपत्ति लगभग 6.38 करोड़ रुपये बताई है। लेकिन उनकी ही कैबिनेट में कई ऐसे मंत्री हैं जिनकी संपत्ति उनसे कहीं अधिक है।सबसे अधिक संपत्ति वाली मंत्री भाजपा कोटे से आने वाली पिछड़ा वर्ग एवं अतिपिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री रमा निषाद हैं। उनकी कुल घोषित संपत्ति लगभग 31.86 करोड़ रुपये है।दूसरे स्थान पर डॉ. श्वेता गुप्ता हैं, जिनकी संपत्ति 29.24 करोड़ रुपये बताई गई है।तीसरे स्थान पर वरिष्ठ नेता अशोक चौधरी हैं, जिनके पास 22.39 करोड़ रुपये की संपत्ति है।

इसके अलावा:शीला कुमारी — 9.50 करोड़डॉ. दिलीप जायसवाल — 9.33 करोड़शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल — 9.25 करोड़विजय कुमार सिन्हा — 8.81 करोड़श्रेयसी सिंह — 7.62 करोड़दामोदर रावत — 6.70 करोड़ कुमार शैलेन्द्र — 6.68 करोड़ रुपये की संपत्ति के मालिक हैं।वहीं सबसे कम संपत्ति वाले मंत्री लोजपा (रामविलास) कोटे से आने वाले गन्ना उद्योग मंत्री संजय कुमार हैं, जिनकी संपत्ति लाखों में बताई गई है।

महिला मंत्री पुरुषों से तीन गुना अधिक संपन्न

इस रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प पहलू महिला मंत्रियों की औसत संपत्ति को लेकर सामने आया है।बिहार सरकार में शामिल पांच महिला मंत्रियों की औसत संपत्ति 16 करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि पुरुष मंत्रियों की औसत संपत्ति लगभग 4.68 करोड़ रुपये बताई गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंकड़ा बिहार की राजनीति में महिलाओं की बदलती सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को दर्शाता है। अब राजनीति में केवल पारंपरिक जनाधार ही नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति भी एक बड़ा कारक बन चुकी है।

पांच मंत्रियों के पास कुल संपत्ति का 46 प्रतिशत

मंत्रिमंडल की कुल घोषित संपत्ति लगभग 220.89 करोड़ रुपये बताई गई है।इसमें केवल पांच शीर्ष मंत्रियों के पास 102 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है, जो पूरी कैबिनेट की कुल संपत्ति का लगभग 46 प्रतिशत है।इसके उलट पांच सबसे कम संपत्ति वाले मंत्रियों के पास कुल मिलाकर मात्र 3 करोड़ 63 लाख रुपये की संपत्ति है।यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति संतुलन का भी संकेत मानी जा रही है।

राजनीति में बढ़ती आर्थिक ताकत का संकेत

विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार समेत पूरे देश में राजनीति अब तेजी से “हाई-इन्वेस्टमेंट प्रोफेशन” में बदलती जा रही है। चुनाव लड़ने का खर्च, संगठन निर्माण, प्रचार-प्रसार और जनसंपर्क की बढ़ती लागत ने आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को राजनीति में अधिक प्रभावशाली बना दिया है।पटना विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय कुमार कहते हैं—“आज राजनीति में वैचारिक संघर्ष से ज्यादा संसाधनों की भूमिका बढ़ गई है।

करोड़पति नेताओं की संख्या बढ़ना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के बदलते आर्थिक ढांचे का संकेत है।”

विपक्ष का हमला: “जनता गरीब, मंत्री मालामाल

”विपक्षी दलों ने इन आंकड़ों को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का कहना है कि जिस राज्य में बड़ी आबादी आज भी बेरोजगारी, पलायन और गरीबी से जूझ रही हो, वहां मंत्रियों की इतनी विशाल संपत्ति कई सवाल खड़े करती है।एक विपक्षी नेता ने तंज कसते हुए कहा—“बिहार में जनता रोजगार ढूंढ रही है और सत्ता के गलियारों में करोड़ों की राजनीति चल रही है। यही आज की सच्चाई है।

”हालांकि सत्तापक्ष का कहना है कि नेताओं की संपत्ति वैधानिक रूप से घोषित है और लोकतंत्र में हर व्यक्ति को व्यवसाय और संपत्ति रखने का अधिकार है।

सामाजिक विमर्श भी तेज

ग्रामीण इलाकों में भी इन आंकड़ों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या राजनीति अब केवल संपन्न वर्ग तक सीमित होती जा रही है?

समाजशास्त्री डॉ. ममता झा कहती हैं—“जब आम युवाओं के सामने बेरोजगारी और आर्थिक संकट हो, तब नेताओं की संपत्ति का इतना बड़ा अंतर सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकता है। लोकतंत्र में आर्थिक पारदर्शिता के साथ सामाजिक संवेदनशीलता भी जरूरी है।

”राजनीति का बदलता चेहरा

एक समय बिहार की राजनीति सामाजिक न्याय, जातीय समीकरण और जनसंघर्ष की राजनीति के लिए जानी जाती थी। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है।आज का नेता केवल जनाधार वाला चेहरा नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद मजबूत होता जा रहा है। राजनीतिक दल भी ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने लगे हैं जो चुनावी लड़ाई में आर्थिक रूप से सक्षम हों।विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में राजनीति और पूंजी का यह गठजोड़ और गहरा हो सकता है।

बड़ा सवाल:

क्या लोकतंत्र महंगा होता जा रहा है?

बिहार मंत्रिमंडल की संपत्ति का यह आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय रिपोर्ट नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ा बड़ा प्रश्न भी है।क्या राजनीति अब आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है?

क्या चुनाव लड़ना और सत्ता तक पहुंचना अब आर्थिक ताकत पर ज्यादा निर्भर हो गया है?

और क्या करोड़पति नेताओं के बीच गरीब और मध्यम वर्ग की आवाज उतनी ही मजबूती से उठ पाती है?

इन सवालों के जवाब भले राजनीति के पास हों या न हों, लेकिन बिहार की जनता अब इन्हें खुलकर पूछने लगी है।

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