“सम्पादकीय” शराबबंदी: नेक नीयत से ‘कमाऊ पूत’ तक—मोतिहारी की मौतें और व्यवस्था पर कठोर प्रश्न

बी के झा

NSK

पटना, 3 अप्रैल

बिहार के मोतिहारी में जहरीली शराब से हुई मौतों ने एक बार फिर उस कड़वे सच को सामने ला दिया है, जिसे सत्ता और व्यवस्था अक्सर आंकड़ों और दावों के पीछे छिपाने की कोशिश करती रही है। चार लोगों की मौत और कई लोगों की बिगड़ती हालत कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी नीति की विफलता का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य कभी सामाजिक सुधार था।इस त्रासदी ने राजनीतिक गलियारों में भी तीखी हलचल पैदा कर दी है। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए शराबबंदी कानून को “कमाऊ पूत” करार दिया है—एक ऐसा तंज, जो केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि एक गहरी व्यवस्था संबंधी विडंबना को उजागर करता है।

नीति बनाम नतीजे: कहां टूट रही है कड़ी?

बिहार में शराबबंदी को नीतीश कुमार सरकार ने सामाजिक सुधार और पारिवारिक स्थिरता के उद्देश्य से लागू किया था। प्रारंभिक दौर में इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले—घरेलू हिंसा में कमी, सामाजिक संतुलन में सुधार जैसे संकेत सामने आए।लेकिन समय के साथ यह नीतिअवैध शराब कारोबार का जाल प्रशासनिक भ्रष्टाचारऔर जहरीली शराब से मौतों की बढ़ती घटनाओं के रूप में नई समस्याओं को जन्म देती नजर आ रही है।

विपक्ष का आक्रामक रुख: आंकड़े और आरोप

तेजस्वी यादव का आरोप है कि शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक 1300 से अधिक लोग जहरीली शराब से जान गंवा चुके हैं।उनका कहना है:“यह कानून अब गरीबों को जेल भेजने और रसूखदारों की जेब भरने का जरिया बन गया है।”विपक्ष का यह भी दावा है कि पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत से शराब की “होम डिलीवरी” हो रही हैऔर सत्ता संरक्षित नेटवर्क इस अवैध कारोबार को बढ़ावा दे रहे हैं

राजनीतिक विश्लेषण: नैतिकता बनाम व्यावहारिकता

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शराबबंदी जैसे कठोर कानून तभी सफल हो सकते हैं, जब समाज का व्यापक समर्थन हो प्रशासन पूरी तरह निष्पक्ष और सख्त होऔर वैकल्पिक व्यवस्था (रोजगार, जागरूकता) मजबूत होअन्यथा, ऐसी नीतियां अक्सर नैतिक आदर्शों से निकलकर व्यावहारिक विफलता में बदल जाती हैं।

शिक्षाविदों की चिंता: सामाजिक सुधार या सामाजिक संकट?

शिक्षा जगत के विशेषज्ञ इस मुद्दे को केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नीति निर्माण का विषय मानते हैं।एक वरिष्ठ शिक्षाविद का कहना है:“जब किसी कानून का उद्देश्य समाज सुधार हो, लेकिन परिणाम मौत और भ्रष्टाचार के रूप में सामने आए, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैचारिक विफलता भी है।

”कानूनविदों का दृष्टिकोण: जिम्मेदारी किसकी?

कानून विशेषज्ञों के अनुसार, जहरीली शराब से होने वाली मौतें केवल दुर्घटना नहीं, बल्कि संगठित अपराध और प्रशासनिक लापरवाही का संयुक्त परिणाम हैं।

क्या जिम्मेदारी केवल शराब माफिया की है?

या उन अधिकारियों की भी, जिनकी निगरानी में यह सब होता है?

यह प्रश्न अब न्यायिक और संवैधानिक बहस का विषय बन सकता है।

आम नागरिकों की आवाज: डर, गुस्सा और बेबसी

सबसे महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया आम लोगों की है—वे जो हर दिन इस व्यवस्था के बीच जीते हैंऔर अक्सर सबसे ज्यादा इसकी कीमत चुकाते हैं मोतिहारी के स्थानीय लोगों में डर है कि कहीं अगला शिकार उनका अपना न हो गुस्सा है कि अवैध शराब खुलेआम बिक रही हैऔर बेबसी है कि शिकायत करने पर कार्रवाई का भरोसा नहीं सवाल जो जवाब मांगते हैं यह घटना कई असहज सवाल खड़े करती है:

क्या शराबबंदी वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल है?

क्या यह कानून समान रूप से लागू हो रहा है?

क्या भ्रष्टाचार ने इसकी आत्मा को खत्म कर दिया है?

निष्कर्ष:

पुनर्विचार का समय

शराबबंदी एक नेक इरादे से लागू की गई नीति थी, लेकिन आज वह अपने ही उद्देश्यों से भटकती नजर आ रही है।यदि कोई कानून समाज को सुरक्षित बनाने के बजाय असुरक्षित कर देऔर सुधार के बजाय संकट पैदा करे तो उस पर पुनर्विचार, सुधार और पारदर्शिता अनिवार्य हो जाती है।मोतिहारी की ये मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं—

ये उस व्यवस्था की चेतावनी हैं, जिसे अब अनसुना करना संभव नहीं।

(सम्पादकीय: राष्ट्रीय दृष्टि)

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