हादी के बाद एक और गोलीकांड: बांग्लादेश में थमती नहीं राजनीतिक हिंसा, क्षेत्रीय संतुलन पर मंडराया खतरा

बी के झा

ढाका/खुलना/नई दिल्ली, 22 दिसंबर

बांग्लादेश एक बार फिर राजनीतिक हिंसा की आग में झुलसता दिखाई दे रहा है। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बने अस्थिर राजनीतिक माहौल में नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) के एक और युवा नेता पर जानलेवा हमला हुआ है। खुलना शहर में पार्टी के केंद्रीय श्रमिक संगठन के नेता मोहम्मद मोतालेब सिकदर को अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी। यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब देश पहले ही सांसद पद के उम्मीदवार शरीफ उस्मान हादी की हत्या से उबर नहीं पाया है।

सोमवार को गाजी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पास हुए इस हमले में गोली मोतालेब सिकदर के कान के पास से होकर निकल गई। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया,

हालांकि डॉक्टरों के अनुसार वे फिलहाल खतरे से बाहर हैं।लगातार हमले, बढ़ती बेचैनी खुलना पुलिस के अनुसार, बदमाशों ने सुबह करीब 11:45 बजे सिर को निशाना बनाकर गोली चलाई। यह हमला किसी व्यक्तिगत रंजिश से अधिक संगठितराजनीतिक हिंसा की ओर इशारा करता है।

पार्टी नेताओं का कहना है कि मोतालेब सिकदर आने वाले दिनों में प्रस्तावित संभागीय श्रमिक रैली की तैयारियों में जुटे थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक अराजकता की कड़ी है, जो हादी की हत्या के बाद और गहरी हो गई है। हादी की हत्या: जिसने देश को झकझोर दिया12 दिसंबर को ढाका-8 से सांसद पद के उम्मीदवार शरीफ उस्मान हादी को ढाका के पलटन इलाके में गोली मारी गई थी। इलाज के लिए सिंगापुर ले जाए जाने के बाद 18 दिसंबर को उनकी मौत हो गई। इसके बाद देश के कई हिस्सों में हिंसा भड़क उठी, राजनीतिक रैलियों और संगठनों के बीच तनाव बढ़ गया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,“हादी की हत्या ने यह स्पष्ट कर दिया कि बांग्लादेश की राजनीति अब वैचारिक संघर्ष से आगे बढ़कर सीधे हिंसक टकराव की ओर जा रही है।”

राजनीतिक विश्लेषण:

सत्ता शून्य और बंदूक की राजनीति शेख हसीना के बाद बने सत्ता शून्य में नई पार्टियां, छात्र संगठन और श्रमिक मंच तेजी से उभर रहे हैं। लेकिन उनके बीच संवैधानिक प्रतिस्पर्धा के बजाय सड़कों की राजनीति हावी होती दिख रही है।

वरिष्ठ दक्षिण एशिया मामलों के विश्लेषक कहते हैं,“जब राज्य की कानून-व्यवस्था कमजोर होती है, तो राजनीति बंदूक से दिशा तय करने लगती है। यही आज बांग्लादेश में हो रहा है।”भारत की चिंता: सीमाओं के पार अस्थिरता

नई दिल्ली इस घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से देख रही है। भारत के लिए बांग्लादेश—पूर्वी सीमा की सुरक्षाउत्तर-पूर्वी राज्यों की स्थिरताऔर क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के लिहाज से बेहद अहम है।

कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, भारत को चिंता है कि—राजनीतिक हिंसा बढ़ी तो शरणार्थी दबाव सीमा पार कट्टर तत्वों की आवाजाहीऔर आतंकी नेटवर्कों को जगह मिल सकती है।

चीन और पाकिस्तान की बढ़ती दिलचस्पी

विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश की अस्थिरता ने चीन और पाकिस्तान को रणनीतिक अवसर भी दिए हैं।चीन पहले से ही बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और कर्ज परियोजनाओं के जरिए ढाका में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।पाकिस्तान, सुरक्षा और वैचारिक स्तर पर, इस्लामी संगठनों और एंटी-इंडिया नैरेटिव के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश में है।

एक रणनीतिक विशेषज्ञ के अनुसार,“यदि बांग्लादेश कमजोर हुआ, तो वह भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक भू-राजनीतिक फ्लैशप्वाइंट बन सकता है।

”भारत–बांग्लादेश संबंधों पर असरलगातार हिंसा और भारत-विरोधी बयानबाज़ी से दोनों देशों के रिश्तों में पहले से मौजूद भरोसे पर असर पड़ा है।

व्यापार, ट्रांजिट और सुरक्षा सहयोग—तीनों पर अनिश्चितता बढ़ रही है।भारतीय नीति-निर्माताओं का मानना है कि ढाका को यह समझना होगा कि“अस्थिरता किसी भी बाहरी ताकत को मजबूत करती है, जबकि स्थिर लोकतंत्र ही क्षेत्रीय सम्मान दिलाता है।”

निष्कर्ष:

एक देश, कई जोखिम मोहम्मद मोतालेब सिकदर पर हमला और शरीफ उस्मान हादी की हत्या यह संकेत दे रहे हैं कि बांग्लादेश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है।यह केवल आंतरिक राजनीति का संकट नहीं, बल्कि—

क्षेत्रीय संतुलन भारत की सुरक्षा और दक्षिण एशिया की स्थिरता से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या बांग्लादेश समय रहते हिंसा की इस राजनीति को रोकेगा, या फिर यह आग पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेगी?

NSK

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