बी के झा
पटना, 14 अप्रैल
राजनीति अक्सर रिश्तों को कठोर बना देती है, लेकिन बीमारी कई बार उन दीवारों को गिरा देती है जिन्हें वर्षों की नाराजगी भी नहीं तोड़ पाती। बिहार की राजनीति में मंगलवार को ऐसा ही भावुक दृश्य देखने को मिला, जब पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस की तबीयत बिगड़ने के बाद केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान अस्पताल पहुंचे और अपने चाचा का हालचाल जाना।
अचानक बिगड़ी तबीयत, अस्पताल में भर्ती
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस की तबीयत अचानक खराब हो गई। सांस लेने में तकलीफ के बाद उन्हें पटना के कंकड़बाग स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है।जैसे ही यह खबर फैली, समर्थकों और शुभचिंतकों का अस्पताल पहुंचना शुरू हो गया। राजनीतिक गलियारों में भी चिंता की लहर दौड़ गई।चिराग पहुंचे अस्पताल, रिश्तों की नई तस्वीर इसी बीच केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान भी पटना पहुंचे। चाचा की तबीयत बिगड़ने की सूचना मिलते ही वह सीधे अस्पताल पहुंचे और उनका हालचाल जाना।सूत्रों के अनुसार मुलाकात के बाद चिराग ने कहा कि:“वे मेरे पिता समान हैं। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन मैं यहां एक बेटे के नाते आया हूं।”यह बयान केवल संवेदना नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में बदलते पारिवारिक समीकरणों का संकेत माना जा रहा है।जहां से शुरू हुई थी दूरी लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक और देश के वरिष्ठ नेता रामविलास पासवान के निधन के बाद पार्टी नेतृत्व को लेकर परिवार में बड़ा विवाद खड़ा हो गया था।
एक ओर पुत्र चिराग पासवान थे, जो खुद को राजनीतिक उत्तराधिकारी मानते थे। दूसरी ओर छोटे भाई पशुपति पारस, जिन्होंने पार्टी के अधिकांश सांसदों का समर्थन हासिल कर लिया।इसके बाद:पार्टी दो हिस्सों में बंट गई चिराग अलग गुट के नेता बने पारस केंद्र सरकार में मंत्री बने चिराग एनडीए से दूर हो गए यह संघर्ष केवल संगठन का नहीं, विरासत का भी था।
दो दल, दो रास्ते
विवाद के बाद लोक जनशक्ति पार्टी से दो राजनीतिक ध्रुव उभरे:
1. लोजपा (रामविलास)चिराग पासवान के नेतृत्व में
2. राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP)पशुपति पारस के नेतृत्व मेंकुछ समय तक ऐसा लगा कि यह दूरी स्थायी हो चुकी है। लेकिन राजनीति में स्थायी कुछ नहीं होता।2024 के बाद बदले समीकरण लोकसभा चुनाव से पहले चिराग पासवान की एनडीए में वापसी हुई और उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत हुई। दूसरी ओर पारस को सत्ता से बाहर होना पड़ा।इसके बाद बिहार की राजनीति में कई नए संकेत दिखे:पारस ने चिराग की चुनावी सफलता पर बधाई दी
पारिवारिक कार्यक्रमों में मुलाकातें हुईं
खगड़िया में चिराग ने चाचा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया पारस ने कहा कि यदि चिराग मुख्यमंत्री बनें तो उन्हें खुशी होगी इन घटनाओं ने संकेत दिया कि निजी रिश्तों की डोर पूरी तरह टूटी नहीं थी।
बीमारी ने कराई नजदीकी?
भारतीय समाज और राजनीति में बीमारी, शोक और संकट ऐसे अवसर होते हैं जहां कटुता भी नरम पड़ जाती है।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अस्पताल में हुई यह मुलाकात केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक संदेश भी है—परिवार की जड़ें राजनीति से गहरी होती हैं।
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा:
“वोट और पद की लड़ाई अलग होती है, लेकिन रक्त संबंध अंततः अपना रास्ता खोज लेते हैं।”
बिहार की राजनीति पर क्या असर?
पासवान परिवार बिहार की दलित राजनीति और राष्ट्रीय गठबंधन समीकरणों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यदि चाचा-भतीजा के रिश्ते सामान्य होते हैं, तो इसका प्रभाव कई स्तरों पर दिख सकता है:
संभावित असर
पासवान वोट बैंक का पुनर्संयोजन संगठनात्मक मजबूती विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव
गठबंधन राजनीति में नई संभावना
एंहालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि राजनीतिक एकता भी होगी, लेकिन संवाद का द्वार खुलता दिख रहा है।जनता ने क्या देखा?
जनता ने इस दृश्य में केवल नेता नहीं, एक परिवार देखा—जहां मतभेद थे, मनभेद थे, लेकिन बीमारी के समय अपनापन भी था।आज के राजनीतिक दौर में यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां संवेदना ने रणनीति पर थोड़ी देर के लिए जीत हासिल की।
निष्कर्ष:
राजनीति से ऊपर रिश्ते
पशुपति पारस की बीमारी की खबर चिंता का विषय है, लेकिन उसी के साथ अस्पताल में चिराग पासवान की मौजूदगी ने एक मानवीय तस्वीर भी सामने रखी।यह घटना याद दिलाती है कि राजनीति में दरारें पड़ सकती हैं, पर रिश्तों की जमीन पूरी तरह बंजर नहीं होती।बिहार की जनता अब यह भी देखेगी कि क्या यह मुलाकात केवल बीमारी तक सीमित रहेगी, या आने वाले समय में पासवान परिवार की राजनीति को नई दिशा देगी।
कभी-कभी अस्पताल के कमरे, विधानसभा के गलियारों से ज्यादा बड़े फैसलों की शुरुआत कर देते हैं।
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