बी के झा
NSK



इस्लामाबाद/ नई दिल्ली, 12 अप्रैल
पाकिस्तान की राजधानी Islamabad में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे तक चली हाई-वोल्टेज वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। यह बैठक केवल दो देशों के बीच संवाद नहीं थी, बल्कि पश्चिम एशिया की स्थिरता, वैश्विक ऊर्जा बाजार, परमाणु संतुलन और क्षेत्रीय शक्ति समीकरणों का निर्णायक परीक्षण थी। लेकिन अंततः बातचीत वहीं अटक गई जहाँ पिछले कई दशकों से अटकी रही है—ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अविश्वास और अमेरिकी दबाव की राजनीति।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति J. D. Vance ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अमेरिका “खुले दिल” से वार्ता के लिए आया था, लेकिन ईरान ने अमेरिकी शर्तें स्वीकार नहीं कीं, इसलिए प्रतिनिधिमंडल बिना डील लौट रहा है। वेंस का यह बयान केवल निराशा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी था—या तो अमेरिकी ढांचे में समझौता करो, या अलग-थलग पड़ो।
1 दूसरी ओर ईरान की सरकारी एजेंसी तसनीम ने आरोप लगाया कि समझौते की राह अमेरिका की “अत्यधिक मांगों” ने रोकी। तेहरान का तर्क है कि संप्रभु राष्ट्र होने के नाते वह अपनी सुरक्षा नीति और वैज्ञानिक क्षमता पर बाहरी नियंत्रण स्वीकार नहीं करेगा। यही वह टकराव है जहाँ वार्ता की मेज पर शब्द खत्म हो जाते हैं और शक्ति राजनीति शुरू हो जाती है।
क्यों टूटी बात? पाँच बड़े कारण
1. परमाणु कार्यक्रम सबसे बड़ी दीवार
अमेरिका चाहता है कि ईरान स्पष्ट और स्थायी गारंटी दे कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। ईरान इसके बदले अपने शांतिपूर्ण परमाणु अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहता है। दोनों पक्षों की यह मांगें एक-दूसरे के विपरीत हैं।
2. प्रतिबंध बनाम सम्मान
ईरान कहता है कि जब तक आर्थिक प्रतिबंध हटाने का भरोसा नहीं मिलता, वह कोई बड़ा कदम क्यों उठाए? अमेरिका पहले प्रतिबद्धता चाहता है, ईरान पहले राहत। यही क्लासिक गतिरोध है।
3. सैन्य प्रभाव का प्रश्न
वाशिंगटन केवल परमाणु मुद्दा नहीं देख रहा, बल्कि ईरान के मिसाइल नेटवर्क और क्षेत्रीय प्रभाव को भी सीमित करना चाहता है। तेहरान इसे अपनी सुरक्षा कवच मानता है।
4. घरेलू राजनीति का दबाव
अमेरिका में नरमी दिखाना राजनीतिक जोखिम है। ईरान में झुकना सत्ता प्रतिष्ठान की कमजोरी माना जाएगा। इसलिए वार्ता कक्ष के बाहर की राजनीति, भीतर की बातचीत पर भारी पड़ गई।
5. भरोसे का संकट
1979 से चले आ रहे अविश्वास ने हर प्रस्ताव को संदेह में बदल दिया। कूटनीति तब सफल होती है जब न्यूनतम विश्वास हो—यहाँ वही अनुपस्थित है।
रक्षा विशेषज्ञों की नजर से
स्थिति सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह असफलता केवल कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि संभावित सैन्य अस्थिरता का संकेत है। यदि वार्ता लंबी खिंचती है या पूरी तरह टूटती है तो निम्न खतरे बढ़ सकते हैं:
पश्चिम एशिया में प्रॉक्सी संघर्ष तेज होना
तेल आपूर्ति मार्गों पर दबाव
समुद्री सुरक्षा संकट
मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा
वैश्विक बाजारों में अस्थिरता
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका की “रेड लाइन” और ईरान की “रणनीतिक स्वायत्तता” के बीच टकराव जारी रहा तो अगला चरण आर्थिक दबाव या सीमित सैन्य शक्ति प्रदर्शन भी हो सकता है।
पाकिस्तान की भूमिका: मेजबान या अवसरवादी मध्यस्थ?
इस वार्ता ने पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अस्थायी कूटनीतिक महत्व दिया है। इस्लामाबाद ने अमेरिका और ईरान को एक टेबल पर बैठाकर अपनी उपयोगिता साबित करने की कोशिश की। हालांकि समझौता न होने से पाकिस्तान को पूर्ण सफलता नहीं मिली, पर यह संदेश जरूर गया कि संकट की घड़ी में वह संवाद मंच उपलब्ध करा सकता है।
The Guardian +1भारत के लिए इसका क्या अर्थ?
India के लिए यह घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के हित तीन स्तरों पर जुड़े हैं:
1. ऊर्जा सुरक्षापश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने का सीधा असर तेल और गैस कीमतों पर पड़ता है। भारत जैसे आयातक देश पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
2. प्रवासी भारतीयों की सुरक्षाखाड़ी क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं। किसी भी संघर्ष की स्थिति में उनकी सुरक्षा प्राथमिक चिंता होगी।
3. सामरिक संतुलनभारत अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी रखता है, वहीं ईरान से चाबहार जैसे परियोजनात्मक हित जुड़े हैं। इसलिए नई दिल्ली संतुलित नीति अपनाएगी।
भारतीय विदेश मंत्रालय की संभावित प्रतिक्रिया
Ministry of External Affairs की पारंपरिक नीति के अनुरूप भारत संवाद, संयम और कूटनीतिक समाधान पर जोर देगा। आधिकारिक रुख कुछ इस प्रकार माना जा सकता है:भारत सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने और संवाद के माध्यम से स्थायी समाधान निकालने का आग्रह करता है। क्षेत्रीय शांति, ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा हम सबके साझा हित हैं।यह भारत की वही नीति है जिसमें युद्ध नहीं, वार्ता; टकराव नहीं, संतुलन; और दबाव नहीं, समाधान को प्राथमिकता दी जाती है।
राजनीतिक निष्कर्ष
इस्लामाबाद वार्ता भले बेनतीजा रही हो, लेकिन यह अंत नहीं है। दोनों देशों ने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। सवाल यह है कि अगली मुलाकात में कौन अपनी अधिकतम मांग छोड़कर न्यूनतम सहमति पर आएगा।
फिलहाल तस्वीर साफ है:
अमेरिका दबाव की मुद्रा में है
ईरान प्रतिरोध की मुद्रा में हैं-
पाकिस्तान अवसर की मुद्रा में है
और भारत संतुलन की मुद्रा में है
विश्व राजनीति के इस शतरंज बोर्ड पर अगली चाल बहुत महंगी पड़ सकती है।
