ईंधन संकट के दौर में बिहार की नई पहल: सम्राट सरकार का सादगी और बचत का संदेश

बी के झा

NSK

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पटना, 13 मई

वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, विशेषकर ईरान-अमेरिका युद्ध की आशंकाओं के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतों में संभावित उछाल ने दुनिया भर की सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा देशवासियों से ईंधन बचत की अपील के बाद बिहार सरकार ने जिस गंभीरता और तत्परता के साथ कदम उठाए हैं, वह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक संदेश बनकर उभरा है।

मुख्यमंत्री Samrat Choudhary ने राज्य में सरकारी संसाधनों के संयमित उपयोग और ऊर्जा संरक्षण की दिशा में कई महत्वपूर्ण फैसलों की घोषणा कर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाला समय केवल विकास का नहीं, बल्कि जिम्मेदार विकास का होगा।

मुख्यमंत्री ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल के माध्यम से राज्य सरकार की नई नीति की जानकारी साझा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की अपील को धरातल पर उतारने के लिए बिहार सरकार ने कई व्यावहारिक निर्णय लिए हैं।सबसे पहले मुख्यमंत्री के काफिले में वाहनों की संख्या घटाने का फैसला लिया गया है। भारतीय राजनीति में अक्सर वीआईपी संस्कृति और बड़े-बड़े कारकेड चर्चा का विषय बनते रहे हैं। ऐसे माहौल में मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं अपने काफिले को छोटा करने का निर्णय एक प्रतीकात्मक संदेश भी है और प्रशासनिक अनुशासन का उदाहरण भी।

इसके साथ ही मंत्रियों, निगम-बोर्ड के अध्यक्षों, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में अतिरिक्त वाहनों के उपयोग से बचने की अपील की गई है।राज्य सरकार ने आम जनता से भी मेट्रो, बस, ऑटो तथा अन्य सार्वजनिक परिवहन के अधिकाधिक उपयोग का आग्रह किया है। यह पहल केवल ईंधन बचत तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ट्रैफिक दबाव कम होगा, प्रदूषण में कमी आएगी और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।

बिहार जैसे तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ते राज्य में यह संदेश दूरगामी प्रभाव छोड़ सकता है।सरकार ने सभी विभागों को निर्देश दिया है कि जहां संभव हो, सरकारी बैठकों और कॉन्फ्रेंस को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित किया जाए। कोरोना काल के दौरान शुरू हुई डिजिटल कार्यसंस्कृति को अब ऊर्जा संरक्षण और प्रशासनिक दक्षता के साथ जोड़ा जा रहा है। इससे समय, संसाधन और ईंधन—तीनों की बचत होगी।इतना ही नहीं, सरकारी कैंटीनों में पाम ऑयल के न्यूनतम उपयोग का निर्देश देकर सरकार ने खाद्य आयात पर निर्भरता और स्वास्थ्य दोनों मुद्दों को साथ जोड़ने का प्रयास किया है।

निजी एवं सरकारी दफ्तरों में ‘वर्क फ्रॉम होम’ संस्कृति को प्रोत्साहित करने की सलाह भी इसी सोच का हिस्सा है। सप्ताह में एक दिन ‘नो व्हीकल डे’ मनाने की अपील इस अभियान को जनांदोलन का स्वरूप देने की कोशिश मानी जा रही है।इधर औरंगाबाद से सामने आई एक तस्वीर ने इस सरकारी पहल को और अधिक जीवंत बना दिया।

औरंगाबाद के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश Rajeev Ranjan Kumar बुधवार सुबह साइकिल से अदालत पहुंचे। दानी बिगहा स्थित सरकारी आवास से लगभग दो किलोमीटर की दूरी तय कर वे व्यवहार न्यायालय पहुंचे। खास बात यह रही कि उनके अंगरक्षक भी साइकिल से उनके साथ चले।प्रधान जिला जज की यह पहल केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि समाज के लिए एक नैतिक संदेश के रूप में देखी जा रही है। जिस दौर में सरकारी पदों के साथ सुविधा और वैभव को जोड़ा जाता है, उस समय एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी का साइकिल से अदालत पहुंचना यह बताता है कि जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों की नहीं, बल्कि व्यवस्था के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की भी है।

शहर में न्यायाधीश की इस पहल की व्यापक सराहना हो रही है। लोगों का कहना है कि यदि देश और राज्य के उच्च पदस्थ लोग स्वयं सादगी और बचत का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे, तो आम नागरिकों में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में हैदराबाद दौरे के दौरान देशवासियों से पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ सोने की खपत कम करने की अपील की थी। उन्होंने वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया था। जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री ने स्वयं भी अपने आधिकारिक काफिले को छोटा करने का निर्णय लिया है और एसपीजी को कारों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत तक कटौती करने का निर्देश दिया गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल आर्थिक संकट से निपटने की रणनीति नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में सादगी और जवाबदेही का नया मॉडल भी हो सकता है।

बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच यदि सरकारें संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का संदेश देती हैं और स्वयं उसका पालन करती हैं, तो उसका सामाजिक प्रभाव कहीं अधिक गहरा होता है।बिहार सरकार की यह पहल अब केवल प्रशासनिक आदेश नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ऐसी सोच के रूप में सामने आ रही है जिसमें ऊर्जा संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा, आर्थिक अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी—

चारों को एक साथ जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।

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