बी के झा
NSK

भागलपुर/पटना, 4 मई
भागलपुर को उत्तर बिहार से जोड़ने वाला ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण विक्रमशिला सेतु अचानक सुर्खियों में आ गया, जब इसका एक हिस्सा भरभराकर गंगा नदी में समा गया। यह घटना केवल एक संरचनात्मक विफलता नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, तकनीकी अनदेखी और प्रशासनिक सुस्ती का परिणाम मानी जा रही है।
कैसे हुआ हादसा?
प्रत्यक्षदर्शियों और अधिकारियों के अनुसार, पुल के पिलर संख्या 137 के आसपास पहले हल्का धंसाव देखा गया। धीरे-धीरे स्थिति बिगड़ती गई और देखते ही देखते लगभग 20 मीटर लंबा हिस्सा सड़क समेत नदी में गिर गया। इससे पहले ही प्रशासन ने एहतियातन आवागमन रोक दिया था, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया।ट्रैफिक डीएसपी संजय कुमार के अनुसार, शुरुआती संकेत पिलर 133-134 के बीच धंसाव के रूप में मिले थे। लेकिन कुछ ही समय में यह धंसाव विनाशकारी टूटन में बदल गया।
तकनीकी कारण: एक्सपेंशन ज्वाइंट बना
“कमजोर कड़ी”विशेषज्ञों का मानना है कि इस हादसे की जड़ में एक्सपेंशन ज्वाइंट की खराब स्थिति है।एक्सपेंशन ज्वाइंट पुल के विभिन्न हिस्सों को तापमान और दबाव के अनुसार फैलने-सिकुड़ने की सुविधा देता है। लेकिन:ज्वाइंट में गैप लगातार बढ़ता गया इससे बियरिंग पर असामान्य दबाव पड़ा पुलिस पर चलते वाहनों से “धड़ाम-धड़ाम” की आवाज आने लगी भारी वाहनों के कारण कंपन और झटके बढ़ गए इन चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज करना अंततः भारी पड़ा।
मरम्मत के बाद भी क्यों नहीं टला खतरा?
वर्ष 2016-17 में पुल की मरम्मत पर लगभग 16 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। उस दौरान:सभी एक्सपेंशन ज्वाइंट बदले गएबियरिंग सिस्टम को नया किया गया सड़क की री-लेयरिंग की गई लेकिन हैरानी की बात यह है कि महज 5-6 वर्षों में ही ज्वाइंट फिर खराब हो गए।
यह सवाल उठाता है—क्या निर्माण सामग्री में कमी थी या रखरखाव में लापरवाही?
चेतावनी के बावजूद कार्रवाई नहीं स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, एक महीने पहले ही इस पुल की खराब हालत को लेकर आगाह किया गया था।इसके बावजूद:मरम्मत प्रस्ताव फाइलों में ही अटका रहा टेंडर प्रक्रिया लंबित रही कोई ठोस कदम समय पर नहीं उठाया गया नतीजा आज सबके सामने है।
पुल की अहमियत लंबाई: 4.7 किलोमीटर
उद्घाटन: 23 जून 2001निर्माण
एजेंसी: यूपी ब्रिज कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन संरचना: टू-लेन सड़क, दोनों ओर फुटपाथ यह पुल भागलपुर और उत्तर बिहार के बीच जीवनरेखा की तरह काम करता है। इसके क्षतिग्रस्त होने से यातायात पूरी तरह बाधित हो गया है।
बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है:क्या समय पर निरीक्षण नहीं हुआ?
क्या मरम्मत कार्य सिर्फ कागजों तक सीमित रहा?
क्या भारी वाहनों के दबाव का सही आकलन नहीं किया गया?
आगे क्या?
फिलहाल प्रशासन ने तकनीकी जांच शुरू कर दी है और वैकल्पिक यातायात व्यवस्था पर काम हो रहा है। लेकिन यह हादसा एक चेतावनी है—
यदि इंफ्रास्ट्रक्चर की समय पर देखरेख नहीं की गई, तो ऐसे हादसे भविष्य में भी हो सकते हैं।
निष्कर्ष:
विक्रमशिला सेतु का यह हादसा केवल एक पुल का टूटना नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों का उजागर होना है। अब जरूरत है पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त निगरानी की—ताकि विकास के प्रतीक ऐसे ढांचे लोगों के लिए खतरा न बनें।
