बी के झा
NSK


पटना, 4 मई
बिहार की सम्राट सरकार शहरी प्रशासन को डिजिटल रूप देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। नगर विकास विभाग द्वारा तैयार किए जा रहे एकीकृत पोर्टल के जरिए अब प्रॉपर्टी टैक्स से लेकर जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, व्यापार लाइसेंस, नक्शा पास कराने जैसी करीब 15 सेवाएं “एक क्लिक” पर उपलब्ध कराने की योजना है। सरकार इसे “जीवन आसान” बनाने की दिशा में क्रांतिकारी पहल बता रही है, लेकिन राजनीतिक गलियारों से लेकर शिक्षाविदों और समाजसेवियों तक—इस पर बहस तेज हो गई है।
डिजिटल बिहार: सुविधा या केंद्रीकरण?
सरकार का दावा है कि इस पोर्टल से राज्य के 264 शहरी निकाय एक ही प्लेटफॉर्म से जुड़ जाएंगे। इससे न सिर्फ नागरिकों को दफ्तरों के चक्कर से मुक्ति मिलेगी, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह कदम “डिजिटल गवर्नेंस” के राष्ट्रीय ट्रेंड के अनुरूप है। उनका कहना है:“यह मॉडल अगर सही तरीके से लागू हुआ, तो बिहार के शहरी प्रशासन में भ्रष्टाचार और देरी की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। लेकिन असली चुनौती इसका जमीनी क्रियान्वयन है।
”120 करोड़ की योजना, लेकिन क्या सिस्टम तैयार है?
सरकार अगले पांच वर्षों में इस परियोजना पर करीब 120 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है। अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, ताकि सिस्टम प्रभावी रूप से लागू हो सके।
कानूनविदों का मानना है कि:“ई-गवर्नेंस से पारदर्शिता जरूर बढ़ेगी, लेकिन डेटा सुरक्षा, शिकायत निवारण की समयसीमा और जवाबदेही तय करना उतना ही जरूरी है। वरना डिजिटल प्लेटफॉर्म भी ‘नया लालफीताशाही तंत्र’ बन सकता है।”
ग्रामीण क्षेत्रों में नया नियम: विकास या नियंत्रण?
दूसरी ओर, सरकार ग्रामीण इलाकों में भी निर्माण को नियंत्रित करने के लिए नया नियम लाने की तैयारी में है। प्रस्ताव है कि अब गांवों में भी बहुमंजिली इमारत बनाने से पहले नक्शा पास कराना अनिवार्य होगा, और इसके लिए RERA की तर्ज पर एक प्राधिकरण बनाया जाएगा।इस प्रावधान के तहत:500 वर्गमीटर से बड़े प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन जरूरी होगा
खरीदारों की 70% राशि अलग खाते में रखनी होगी
समय पर कब्जा नहीं देने पर ब्याज सहित हर्जाना देना होगा
विपक्ष का हमला: “सुविधा नहीं, नियंत्रण का जाल”
विपक्षी दलों ने इस कदम को “ग्रामीण स्वतंत्रता पर अंकुश” बताया है। उनका कहना है कि:“सरकार गांवों में भी शहर जैसा टैक्स और नियंत्रण थोपना चाहती है। नक्शा पास कराने के नाम पर आम लोगों से ‘एंट्री फीस’ वसूली जाएगी।”
एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:“यह व्यवस्था गरीब और मध्यम वर्ग के लिए नया बोझ बन सकती है। गांवों की पारंपरिक स्वतंत्रता को खत्म कर दिया जाएगा।
”समाजसेवियों की राय: जरूरत और डर दोनों
स्थानीय समाजसेवियों का दृष्टिकोण थोड़ा संतुलित है। उनका कहना है:“आज गांवों में भी अव्यवस्थित निर्माण बढ़ रहा है। सुरक्षा और प्लानिंग के लिए नियम जरूरी हैं, लेकिन प्रक्रिया सरल और सस्ती होनी चाहिए।”वे चेतावनी भी देते हैं कि अगर प्रक्रिया जटिल हुई, तो इससे भ्रष्टाचार बढ़ सकता है।
राजनीतिक असर: चुनावी मुद्दा बनने की संभावना
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा विषय बन सकता है।शहरी मतदाता डिजिटल सुविधा से खुश हो सकते हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसे “सरकारी हस्तक्षेप” के रूप में देखा जा सकता है
निष्कर्ष:
बदलाव की राह, लेकिन संतुलन जरूरी
बिहार सरकार का यह कदम प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा प्रयास है। लेकिन हर सुधार की तरह इसकी सफलता भी इस बात पर निर्भर करेगी कि:क्या यह आम जनता के लिए सच में आसान बनता है या सिर्फ एक नया नियंत्रण तंत्र बनकर रह जाता है“
एक क्लिक की सुविधा” और “नियमन की सख्ती”—इन दोनों के बीच संतुलन ही तय करेगा कि यह योजना जनता के लिए वरदान साबित होगी या विवाद का कारण बनेगी।
