बी के झा
कोलकाता / नई दिल्ली , 9 जनवरी
प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राजनीतिक परामर्श फर्म I-PAC से जुड़ा विवाद अब केवल कलकत्ता हाई कोर्ट तक सीमित नहीं रहने वाला। सूत्रों के अनुसार, ED इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। एजेंसी की लीगल टीम सभी संवैधानिक और कानूनी विकल्पों की समीक्षा कर रही है और अंतिम निर्णय शीघ्र लिया जा सकता है।यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब एक दिन पहले ही कलकत्ता हाई कोर्ट में भारी भीड़ और हंगामे के चलते सुनवाई नहीं हो सकी थी और अदालत ने मामला 14 जनवरी तक के लिए टाल दिया था। इसने पूरे विवाद को और अधिक संवेदनशील तथा बहुस्तरीय बना दिया है—जहां कानून, राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं आमने-सामने खड़ी दिख रही हैं।
ED का पक्ष: “यह राजनीतिक नहीं, कॉर्पोरेट जांच है”ED ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया है कि तलाशी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के खिलाफ नहीं, बल्कि इंडिया पैसिफिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड के संदर्भ में की गई थी। एजेंसी के अनुसार, यह एक कॉर्पोरेट इकाई से जुड़ा मामला है और इसे राजनीतिक कार्रवाई बताना भ्रामक है।ED का यह भी तर्क है कि जांच के दौरान वैधानिक अधिकारों में बाधा उत्पन्न हुई और कुछ डिजिटल व इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की कस्टडी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। यही कारण है कि अब एजेंसी शीर्ष अदालत तक जाने की संभावनाएं तलाश रही है।
I-PAC का बयान: “यह हमारे लिए दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक दिन”दूसरी ओर, I-PAC ने एक लंबा और भावनात्मक बयान जारी करते हुए खुद को गैर-राजनीतिक, पेशेवर संगठन बताया है। संस्था ने कहा कि उसकी स्थापना इस विश्वास के साथ हुई थी कि भारतीय लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब युवा पेशेवर निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ सार्वजनिक जीवन से जुड़ेंगे।
I-PAC ने यह भी रेखांकित किया कि उसने बीते वर्षों में भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, वाईएसआर कांग्रेस, जेडीयू, शिवसेना सहित विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ काम किया है, लेकिन न तो वह चुनाव लड़ती है और न ही कोई राजनीतिक पद रखती है।संस्था के अनुसार, कोलकाता कार्यालय और निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर हुई तलाशी ने एक “चिंताजनक मिसाल” कायम की है, जो पेशेवर राजनीतिक परामर्श की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं:
सत्ता बनाम संस्थाएं विपक्ष का हमला कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी नेताओं ने इसे केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का ताजा उदाहरण बताया है। विपक्ष का कहना है कि जिस संस्था ने लगभग सभी प्रमुख दलों के साथ काम किया है, उसे अचानक निशाने पर लेना यह दर्शाता है कि राजनीतिक रणनीति और जांच एजेंसियों के बीच की रेखा धुंधली हो रही है।
भाजपा का जवाब
भाजपा नेताओं ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कानून सबके लिए समान है। पार्टी के अनुसार, यदि मामला किसी निजी कंपनी से जुड़ा है, तो उसे राजनीतिक रंग देना अनुचित है। भाजपा का दावा है कि अदालतें ही तय करेंगी कि सच्चाई क्या है।
विशेषज्ञों की राय
कानूनविद वरिष्ठ नेता कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ED सुप्रीम कोर्ट जाती है, तो यह मामला संघीय ढांचे और जांच एजेंसियों की शक्तियों पर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। खासकर डिजिटल सबूतों की जब्ती, सीलिंग और फोरेंसिक जांच से जुड़े प्रश्नों पर शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देश दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद केवल एक जांच नहीं, बल्कि भारत में राजनीतिक परामर्श उद्योग की भूमिका पर भी बहस छेड़ता है। क्या ऐसे संगठन लोकतंत्र को मजबूत करते हैं या सत्ता संघर्षों में फंस जाते हैं—यह सवाल अब सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।
शिक्षाविद
शिक्षाविदों का कहना है कि यह मामला लोकतंत्र में नागरिक पेशेवरता और राज्य शक्ति के बीच संतुलन की परीक्षा है। यदि पेशेवर संगठनों को राजनीतिक संदेह के आधार पर निशाना बनाया गया, तो इससे सार्वजनिक जीवन में युवाओं की भागीदारी प्रभावित हो सकती है।
आगे की राह
अब सबकी निगाहें दो मोर्चों पर टिकी हैं—कलकत्ता हाई कोर्ट की 14 जनवरी की सुनवाई,और ED का संभावित सुप्रीम कोर्ट कदम।यह स्पष्ट है कि I-PAC–ED मामला अब केवल कानूनी विवाद नहीं रहा।
यह लोकतंत्र, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वास की उस कसौटी में बदल चुका है, जिसका असर आने वाले समय में राजनीति और न्याय—दोनों पर गहराई से पड़ेगा।
NSK

