कौन हैं अजीत भारती? सीजेआई बी.आर. गवई पर टिप्पणी से मचा बवाल — सोशल मीडिया पोस्ट से भड़का तूफान, नोएडा पुलिस ने की घंटों पूछताछ — राजनीतिक और धार्मिक संगठनों में बढ़ा तनाव

बी के झा

NSK News

नोएडा / नई दिल्ली, 8 अक्टूबर

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने वाले यूट्यूबर और स्वतंत्र पत्रकार अजीत भारती एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई पर जूता फेंकने की कोशिश के बाद अजीत भारती द्वारा किए गए व्यंग्यात्मक पोस्ट और बयान ने देशभर में राजनीतिक और धार्मिक हलचल मचा दी है।मंगलवार को नोएडा पुलिस ने भारती को पूछताछ के लिए बुलाया। तीन घंटे तक चली पूछताछ के बाद उन्हें शाम करीब 4:30 बजे रिहा कर दिया गया। पुलिस ने स्पष्ट किया कि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया था।एडीसीपी सुमित शुक्ला ने कहा —अजीत भारती से केवल पूछताछ की गई है। किसी तरह की गिरफ्तारी नहीं हुई है।”पूछताछ के बाद भारती ने भी एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट किया —मैं ठीक हूं। न तो गिरफ्तारी हुई है, न हिरासत में हूं।”कौन हैं अजीत भारती?बिहार के बेगूसराय जिले के रहने वाले अजीत भारती एक स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर हैं।वे अपने राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक मुद्दों पर तीखे और व्यंग्यपूर्ण वीडियो के लिए जाने जाते हैं।मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों में काम करने के बाद उन्होंने ‘AB4K मीडिया’ नाम से अपना स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म शुरू किया।उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक्स (X) पर उनके लगभग 5 लाख फॉलोअर्स हैं, जबकि यूट्यूब पर 7 लाख से अधिक सब्सक्राइबर हैं।वे खुद को “निडर और वैकल्पिक मीडिया की आवाज़” बताते हैं।अजीत भारती ने कई किताबें भी लिखी हैं, जिनमें —बकर पुराणघर वापसीदेयर विल बी नो लवजो भी कहूंगा सच कहूंगाशामिल हैं।उनकी न्यायपालिका और राजनीतिक व्यवस्था पर की गई टिप्पणियां अक्सर विवादों में रहती हैं। दो बार उन्हें अवमानना की कार्रवाई का सामना भी करना पड़ा, लेकिन वे अपने बयानों पर कायम रहे।क्या कहा था सीजेआई गवई पर?सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब एक वकील राकेश किशोर ने सुनवाई के दौरान सीजेआई बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की।कुछ ही घंटों बाद अजीत भारती ने इस घटना को लेकर एक वीडियो और पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने सीजेआई का मज़ाक उड़ाते हुए लिखा —गवई एक घटिया और अयोग्य जज हैं। उन्हें अदालत की अवमानना का सामना करना चाहिए।”उन्होंने अपने वीडियो में कहा —हाल ही में उनकी जूतों वाली फोटो देखकर ‘जूते और चीफ जस्टिस’ पर वीडियो बनाना चाहता था, लेकिन अब लगता है जूते तो उनसे चिपक ही गए।”उनका यह बयान कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद विवाद और गहराता चला गया। मामले की पृष्ठभूमि — विवादित टिप्पणी पर बवालयह पूरा विवाद 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई से जुड़ा है।सीजेआई गवई की बेंच ने मध्य प्रदेश के खजुराहो में भगवान विष्णु की क्षत-विक्षत मूर्ति को बहाल करने की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि —यह साइट पुरातात्विक स्मारक है और इसमें बदलाव के लिए एएसआई की मंजूरी आवश्यक है।”इस टिप्पणी के बाद कुछ संगठनों ने इसे “सनातन धर्म का अपमान” बताया था।उसी पृष्ठभूमि में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने की घटना और भारती का वीडियो सामने आया।विरोध और समर्थन की दो धाराएंअजीत भारती के समर्थन और विरोध में सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है।एक ओर हिन्दू संगठन, धर्मगुरु और कुछ वकील संगठन भारती और एडवोकेट राकेश किशोर के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। उनका कहना है किजब धार्मिक भावनाओं पर चोट पहुंचेगी, तो स्वाभाविक है कि प्रतिक्रिया होगी।”वहीं दूसरी ओर कांग्रेस, ‘इंडिया’ गठबंधन और मुस्लिम संगठन सीजेआई के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं।वे इस घटना को संविधान और न्यायपालिका की गरिमा पर हमला करार दे रहे हैं।मिशन अंबेडकर’ की शिकायत और कानूनी पहल‘मिशन अंबेडकर’ के संस्थापक सूरज कुमार बौद्ध ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर अजीत भारती और एक धार्मिक वक्ता के खिलाफ आपराधिक अवमानना की अनुमति मांगी है।उनका आरोप है किइनके बयानों का मकसद मुख्य न्यायाधीश और अन्य जजों के खिलाफ हिंसा भड़काना है। ऐसी टिप्पणियाँ बेहद खतरनाक हैं और सामाजिक तनाव को बढ़ा रही हैं।” राजनीतिक और कानूनी हलचलराजनीतिक विश्लेषकों और कानून विशेषज्ञों ने इस पूरे विवाद पर चिंता जताई है।वरिष्ठ विश्लेषक डॉ. मनोज दीक्षित का कहना है —सीजेआई जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों पर बेहद संयम बरतना चाहिए। वहीं, सोशल मीडिया पर किसी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना भी न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन है।”कई वरिष्ठ वकीलों ने कहा कि यह घटना न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की महीन रेखा को उजागर करती है।अंत में…यह विवाद अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक टकराव का रूप ले चुका है।एक ओर सीजेआई गवई के सम्मान और न्यायपालिका की गरिमा का सवाल है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक भावनाओं और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस छिड़ी हुई है।स्थिति चाहे जो हो, देश इस समय एक बार फिर उसी सवाल पर खड़ा दिख रहा है —संविधान की गरिमा और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन कौन और कैसे बनाए रखेगा?”

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