बी के झा
NSK

कोलकाता/ न ई दिल्ली, 18 मई
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब सामाजिक और धार्मिक विमर्श भी नए मोड़ लेते दिखाई दे रहे हैं। कोलकाता की ऐतिहासिक Nakhoda Mosque के इमाम Maulana Mohammad Shafique Qasmi का हालिया बयान पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।इमाम ने खुले मंच से मुस्लिम समाज से अपील करते हुए कहा कि भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक और विविधताओं वाले देश में मुसलमानों को गाय की कुर्बानी से बचना चाहिए और दूसरे धर्मों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि गाय की जगह बकरे की कुर्बानी दी जा सकती है।उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल सरकार ने पशु वध को लेकर नए और सख्त नियम लागू किए हैं। यही कारण है कि इस बयान को केवल धार्मिक अपील नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
सरकारी सख्ती के बाद बदली बहस की दिशा
दरअसल, हाल ही में राज्य सरकार ने पशु वध संबंधी नियमों को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। इसके तहत बिना फिटनेस सर्टिफिकेट किसी भी पशु का वध नहीं किया जा सकेगा।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल उन्हीं पशुओं के वध की अनुमति दी जाएगी जो 14 वर्ष से अधिक आयु के हों या बीमारी, चोट अथवा अत्यधिक वृद्धावस्था के कारण उपयोग योग्य न रह गए हों। इसके लिए पशु चिकित्सक की जांच और प्रमाणपत्र अनिवार्य किया गया है।सरकारी स्तर पर इसे पशु संरक्षण और कानून व्यवस्था से जुड़ा कदम बताया जा रहा है,
लेकिन जमीनी स्तर पर इस नियम के क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल भी उठने लगे हैं।
“भावनाओं का सम्मान जरूरी”
मौलाना शफीक कासमी ने कहा कि भारत में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं, इसलिए हर समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह दूसरे समुदाय की भावनाओं का ख्याल रखे।उन्होंने कहा कि धार्मिक परंपराओं का पालन करते समय सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को प्राथमिकता देनी चाहिए।उनका यह बयान ऐसे दौर में आया है जब देश में धार्मिक मुद्दों को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण लगातार बढ़ता रहा है। ऐसे में कई लोग इसे सामाजिक सद्भाव की दिशा में सकारात्मक संदेश मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे बदलते राजनीतिक माहौल का असर भी बता रहे हैं।
सरकार को भी दी सलाह
इमाम ने केवल मुस्लिम समाज से अपील नहीं की, बल्कि सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इतने सख्त नियम लागू कर रही है, तो उसे पहले पर्याप्त स्लॉटर हाउस, पशु चिकित्सक और प्रशासनिक ढांचा तैयार करना चाहिए।उन्होंने यहां तक सुझाव दिया कि यदि सरकार वास्तव में गाय संरक्षण को लेकर गंभीर है, तो उसे गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर पूरे देश में गोवध और बीफ निर्यात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का साहसिक फैसला लेना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि गोवध संबंधी कानून लंबे समय से मौजूद हैं, लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने उन्हें प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया।
लाउडस्पीकर विवाद पर भी रखी राय
इसी दौरान इमाम ने मस्जिदों में लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर चल रही बहस पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि Supreme Court of India और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ध्वनि सीमा को लेकर पहले से स्पष्ट नियम तय हैं।उनका कहना था कि कुछ जगहों पर पुलिस द्वारा लाउडस्पीकर हटाने की खबरों को गलत तरीके से पेश किया गया। नियमों का उद्देश्य केवल ध्वनि नियंत्रण है, न कि धार्मिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध।
उन्होंने मस्जिद कमेटियों से प्रशासन के साथ सहयोग करने और कानून के दायरे में रहकर धार्मिक गतिविधियां संचालित करने की अपील की।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में बड़ा संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल धार्मिक अपील नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का संकेत भी हो सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार, सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य में प्रशासनिक और सामाजिक प्राथमिकताओं में बदलाव दिखाई दे रहा है। ऐसे में धार्मिक नेतृत्व भी अधिक संतुलित और संवेदनशील सार्वजनिक भाषा अपनाने की कोशिश कर रहा है।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की रणनीति हो सकता है, जबकि अन्य इसे बदलती राजनीतिक मजबूरियों का परिणाम मान रहे हैं।
समाज में मिली मिश्रित प्रतिक्रिया
इमाम के बयान पर समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कई लोगों ने इसे धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश बताया है। वहीं कुछ संगठनों का कहना है कि धार्मिक परंपराओं को राजनीतिक दबाव से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।हालांकि अधिकांश सामाजिक संगठनों ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में आपसी सम्मान और संवेदनशीलता ही सामाजिक शांति की सबसे बड़ी कुंजी है।
बदलते समय की नई तस्वीर
पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक और सांस्कृतिक बहसों का केंद्र रहा है। लेकिन अब धार्मिक नेतृत्व के सुरों में आया यह बदलाव इस बात का संकेत माना जा रहा है कि बदलती राजनीति का असर सामाजिक विमर्श पर भी पड़ने लगा है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इमाम का यह बयान केवल एक अपील बनकर रह जाता है या आने वाले समय में धार्मिक और सामाजिक संवाद की नई दिशा तय करता है।
