बी के झा
NSK


नई दिल्ली, 4 जुन
दुनिया की भू-राजनीति इन दिनों दो अलग-अलग क्षेत्रों में तेजी से बदलते घटनाक्रमों की गवाह बन रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच शक्ति संतुलन को लेकर नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं, जबकि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान और चीन की बढ़ती सक्रियता ने सामरिक प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया है।हाल की घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि वैश्विक राजनीति केवल युद्धक्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि बंदरगाहों, कूटनीतिक वार्ताओं और राजनीतिक बयानों के माध्यम से भी आकार ले रही है।
ट्रंप का बड़ा दावा: “मैं नहीं होता तो इजरायल नहीं होता”
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने विशिष्ट अंदाज में दावा किया है कि यदि उनके कार्यकाल में लिए गए फैसले नहीं होते तो आज इजरायल का अस्तित्व गंभीर खतरे में पड़ सकता था।ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान लिए गए तीन प्रमुख निर्णयों को इजरायल की सुरक्षा का आधार बताया—यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता, अमेरिकी दूतावास का तेल अवीव से यरुशलम स्थानांतरण तथा अरब देशों और इजरायल के बीच हुए ऐतिहासिक अब्राहम समझौते।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन कदमों ने निश्चित रूप से पश्चिम एशिया की राजनीति को नई दिशा दी, लेकिन यह कहना कि केवल इन्हीं निर्णयों ने इजरायल के अस्तित्व को बचाया, एक राजनीतिक दावा अधिक और ऐतिहासिक निष्कर्ष कम प्रतीत होता है।
जब ट्रंप ने नेतन्याहू को कहा “पागल”
सबसे अधिक चर्चा उस समय हुई जब ट्रंप ने खुलासा किया कि उन्होंने फोन पर बातचीत के दौरान इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को “पागल” कहा था।हालांकि यह टिप्पणी व्यक्तिगत संबंधों में दरार का संकेत नहीं मानी जा रही। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उन्हें नेतन्याहू पसंद हैं और दोनों नेताओं ने कठिन समय में साथ काम किया है।दरअसल असली चिंता लेबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ इजरायली सैन्य कार्रवाई को लेकर है। ट्रंप का मानना है कि यह संघर्ष ईरान के साथ संभावित वार्ताओं और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रयासों को प्रभावित कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार यह घटना अमेरिका और इजरायल के बीच किसी बड़े मतभेद का संकेत नहीं बल्कि रणनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर का उदाहरण है। वाशिंगटन जहां क्षेत्रीय संतुलन और वार्ता पर जोर दे रहा है, वहीं तेल अवीव अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मान रहा है।
कोलंबो बंदरगाह पर बढ़ी हलचल
इधर हजारों किलोमीटर दूर हिंद महासागर में भी सामरिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह पर पाकिस्तान नौसेना के तीन युद्धपोतों और भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस ऐरावत की लगभग समान समय पर मौजूदगी ने रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है।औपचारिक रूप से दोनों देशों के जहाज अलग-अलग उद्देश्यों से श्रीलंका पहुंचे हैं। पाकिस्तान ने इसे सद्भावना यात्रा और रसद आपूर्ति मिशन बताया है, जबकि भारत ने इसे नियमित परिचालन गतिविधि कहा है।लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर घटनाओं का महत्व उनके आधिकारिक स्पष्टीकरण से कहीं अधिक होता है।
चीन की छाया और भारत की सतर्कता पाकिस्तानी नौसेना के साथ पहुंची पनडुब्बी ‘हांगोर’
विशेष रूप से चर्चा में है क्योंकि यह चीनी तकनीक से निर्मित है।हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति को भारत लंबे समय से अपनी सामरिक चुनौती के रूप में देखता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के नौसैनिक प्लेटफॉर्म और चीनी रक्षा तकनीक का श्रीलंका में दिखाई देना स्वाभाविक रूप से नई दिल्ली की रणनीतिक निगरानी का विषय बन गया है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आईएनएस ऐरावत की उपस्थिति केवल संयोग नहीं बल्कि यह संकेत भी है कि भारत अपने समुद्री पड़ोस में होने वाली गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए है।
श्रीलंका का संतुलन साधने का प्रयास
इन घटनाओं के बीच सबसे दिलचस्प स्थिति श्रीलंका की है।एक ओर वह भारत के साथ अपने आर्थिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा संबंधों को मजबूत रखना चाहता है। दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ भी अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए रखना चाहता है।विशेषज्ञ इसे श्रीलंका की “बैलेंसिंग डिप्लोमेसी” बताते हैं, जिसमें वह किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर हुए बिना सभी प्रमुख खिलाड़ियों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
बदलती दुनिया का संकेत
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच उभरे मतभेद हों या कोलंबो बंदरगाह पर भारत-पाकिस्तान की समानांतर मौजूदगी—दोनों घटनाएं एक बड़े वैश्विक बदलाव की ओर इशारा करती हैं।आज की दुनिया में शक्ति का प्रदर्शन केवल युद्ध जीतने से नहीं होता, बल्कि कूटनीतिक प्रभाव, समुद्री उपस्थिति, आर्थिक साझेदारी और रणनीतिक साझेदारियों से भी तय होता है।
पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती खींचतान तथा हिंद महासागर में भारत, पाकिस्तान और चीन की सक्रियता यह स्पष्ट कर रही है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का केंद्र केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि समुद्री मार्गों, बंदरगाहों औरू रणनीतिक गठबंधनों पर भी केंद्रित रहेगा।
दुनिया फिलहाल युद्ध और शांति के बीच खड़ी है, लेकिन इतना निश्चित है कि आने वाले समय में लिए जाने वाले फैसले अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नई दिशा तय करेंगे।
