बी के झा
NSK

नई दिल्ली/चेन्नई/कोयंबटूर, 20 अप्रैल
Tamil Nadu की राजनीति हमेशा से व्यक्तित्व, गठबंधन और क्षेत्रीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। इस बार विधानसभा चुनाव में Bharatiya Janata Party बहुत बड़े दावे के साथ मैदान में नहीं उतरी है, लेकिन पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जरूर रखती है।All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रही भाजपा ने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। मगर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि पार्टी का चर्चित चेहरा K. Annamalai चुनावी मैदान में नहीं हैं।यही अनुपस्थिति अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल बन गई है—
क्या भाजपा ने गठबंधन के लिए अपना सबसे प्रभावी चेहरा पीछे कर दिया?
अन्नामलाई कौन-सा फैक्टर थे?पूर्व आईपीएस अधिकारी K. Annamalai ने तमिलनाडु में भाजपा को नई ऊर्जा देने का प्रयास किया। आक्रामक शैली, तेज भाषण, संगठनात्मक सक्रियता और भ्रष्टाचार विरोधी छवि ने उन्हें राज्य में पार्टी का प्रमुख चेहरा बना दिया।विशेषकर Coimbatore और शहरी क्षेत्रों में उन्होंने भाजपा के लिए एक नई सामाजिक-राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश की।उनकी सभाओं में भीड़, सोशल मीडिया उपस्थिति और युवा समर्थकों का जुड़ाव यह संकेत देता था कि भाजपा पहली बार तमिलनाडु में अलग पहचान गढ़ने की कोशिश कर रही है।
अब मैदान से बाहर क्यों?
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, गठबंधन वार्ता के दौरान All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam ने अन्नामलाई को लेकर आपत्तियां जताई थीं। माना जाता है कि उनकी आक्रामक राजनीति केवल सत्तारूढ़ Dravida Munnetra Kazhagam तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे सहयोगी दलों पर भी खुलकर टिप्पणी करते थे।ऐसे में गठबंधन को सुचारु रखने के लिए भाजपा ने नेतृत्व परिवर्तन कर N. Nainar Nagendran को जिम्मेदारी सौंपी।हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे संगठनात्मक निर्णय बताया गया, लेकिन राजनीति में संकेत अक्सर शब्दों से ज्यादा बोलते हैं।
कोयंबटूर में क्यों बदल रहा माहौल?
Coimbatore भाजपा के लिए अपेक्षाकृत मजबूत क्षेत्र माना जाता रहा है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि अन्नामलाई की अनुपस्थिति से कार्यकर्ताओं का उत्साह कुछ कम हुआ है।विश्लेषकों के अनुसार, तीन तरह की चुनौती सामने आ सकती है:
कैडर मनोबल में कमी – जब स्थानीय चेहरा मैदान में न हो।
फ्लोटिंग वोटर की उलझन – जो भाजपा पर विचार कर रहे थे, वे नया विकल्प खोज सकते हैं।
तीसरे विकल्प का उदय – कुछ मतदाता अन्य क्षेत्रीय विकल्पों की ओर जा सकते हैं।
क्या तीसरी ताकत को फायदा?
राज्य की राजनीति में पारंपरिक रूप से Dravida Munnetra Kazhagam और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam का वर्चस्व रहा है। लेकिन अब नए राजनीतिक प्रयोगों की भी चर्चा है।कुछ विश्लेषकों का मानना है कि जो मतदाता डीएमके के खिलाफ हैं लेकिन भाजपा को लेकर आश्वस्त नहीं, वे उभरते विकल्पों की ओर देख सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
विश्लेषकों के अनुसार भाजपा के सामने यह दुविधा है:
1. गठबंधन बनाम विस्तारयदि पार्टी अकेले बढ़ना चाहती है, तो उसे अन्नामलाई जैसे आक्रामक चेहरों की जरूरत है।यदि सीट जीतना प्राथमिक लक्ष्य है, तो गठबंधन जरूरी है।
2. चेहरा बनाम समीकरणकई बार लोकप्रिय नेता और चुनावी गणित एक दिशा में नहीं चलते।
3. अल्पकालिक लाभ, दीर्घकालिक प्रश्नगठबंधन से कुछ सीटें मिल सकती हैं, लेकिन क्या इससे भाजपा की स्वतंत्र पहचान मजबूत होगी?
यही बड़ा प्रश्न है।
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
राजनीति विज्ञान के अध्येताओं का कहना है कि तमिलनाडु में केवल राष्ट्रीय मुद्दों से चुनाव नहीं जीते जाते। यहां भाषा, सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय गौरव, नेतृत्व छवि और गठबंधन संरचना निर्णायक रहती है।उनके अनुसार भाजपा को यहां दीर्घकालिक कैडर निर्माण, स्थानीय नेतृत्व और सांस्कृतिक संवाद पर निवेश करना होगा।
भाजपा के लिए आगे की राह
भाजपा के सामने अब कुछ स्पष्ट लक्ष्य हैं:गठबंधन वोट ट्रांसफर सुनिश्चित करना कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना
अन्नामलाई की लोकप्रियता को प्रचार में उपयोग करना
शहरी और युवा वोटरों को जोड़ना
दीर्घकालिक संगठन विस्तार जारी रखना यदि पार्टी यह संतुलन बना लेती है, तो नुकसान सीमित रह सकता है।
बड़ा सवाल: क्या जमीन खिसक सकती है?
जिस जमीन को अन्नामलाई ने मेहनत से तैयार किया,
क्या वह अब ढीली पड़ सकती है?
यह पूरी तरह चुनावी अभियान, स्थानीय उम्मीदवारों और गठबंधन तालमेल पर निर्भर करेगा।यदि कार्यकर्ता सक्रिय रहे और वोट ट्रांसफर सफल हुआ, तो भाजपा लाभ ले सकती है।लेकिन यदि समर्थक भ्रमित हुए, तो वही जमीन हाथ से निकल भी सकती है।
निष्कर्ष
तमिलनाडु में भाजपा के लिए इस बार असली परीक्षा सीटों की संख्या से ज्यादा रणनीति की है। अन्नामलाई जैसे नेता ने पार्टी को पहचान दी, लेकिन गठबंधन ने समीकरण बदल दिए।अब देखना यह है कि भाजपा ने जो चाल चली है, वह चुनावी मास्टरस्ट्रोक साबित होती है या अपनी ही बनाई जमीन कमजोर करने वाला फैसला।
