बी के झा
NSK


दरभंगा, 15 मई
बिहार के दरभंगा जिले से इंसानियत को झकझोर देने वाली एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसने पूरे शहर को दहशत, गुस्से और मातम में डुबो दिया है। बहादुरपुर थाना क्षेत्र के शास्त्री नगर गली नंबर-2 में गुरुवार की दोपहर आवारा कुत्तों के झुंड ने 10 वर्षीय मासूम बच्ची को इस कदर नोच डाला कि उसकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई।
मासूम की चीखें गली में गूंजती रहीं, लेकिन खूंखार कुत्तों का झुंड उस पर तब तक हमला करता रहा, जब तक उसकी सांसें थम नहीं गईं।घटना ने सिर्फ एक परिवार की खुशियां नहीं छीनीं, बल्कि नगर निगम और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इलाके में लंबे समय से आवारा कुत्तों का आतंक है, लेकिन शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने कभी ठोस कार्रवाई नहीं की।
अब एक मासूम की जान चली गई, तब अधिकारियों की नींद टूटी है।जानकारी के मुताबिक, गुरुवार दोपहर करीब एक बजे 10 वर्षीय अन्नू कुमारी गली से गुजर रही थी। तभी अचानक आधा दर्जन आवारा कुत्तों ने उस पर हमला बोल दिया। बच्ची खुद को बचाने के लिए चीखती रही, लेकिन खूंखार कुत्तों ने उसे जमीन पर गिराकर बुरी तरह नोचना शुरू कर दिया।
आसपास के लोग जब तक दौड़कर पहुंचे, तब तक मासूम गंभीर रूप से घायल हो चुकी थी। लोगों ने किसी तरह कुत्तों को भगाया और तुरंत पुलिस को सूचना दी। डायल-112 की टीम बच्ची को खून से लथपथ हालत में डीएमसीएच लेकर पहुंची, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
मृतका की पहचान बहेड़ी थाना क्षेत्र के जोरजा-चक्का निवासी भारत सहनी की पुत्री अन्नू कुमारी के रूप में हुई है। अन्नू अपनी मां अंबिका देवी के साथ एकमीघाट स्थित ननिहाल में रहकर पढ़ाई कर रही थी। वह छठी कक्षा की छात्रा थी और तीन बहनों व एक भाई में सबसे बड़ी थी। पिता परदेस में मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं। बेटी की मौत की खबर सुनते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मां बेसुध हो गई, जबकि पूरे मोहल्ले में मातम पसर गया।
घटना के बाद स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। लोगों ने आरोप लगाया कि शहर में आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। स्कूल जाने वाले बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं रोज डर के साए में जी रहे हैं। कई बार शिकायत करने के बावजूद नगर निगम ने न तो कुत्तों को पकड़ने की व्यवस्था की और न ही नसबंदी अभियान को गंभीरता से चलाया।
स्थानीय समाजसेवियों ने इस घटना को “प्रशासनिक लापरवाही से हुई मौत” बताया है। सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि नगर निगम सिर्फ कागजों में अभियान चलाता है, जबकि जमीन पर हालात भयावह हैं। उनका कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई होती तो आज एक मासूम जिंदा होती।
शिक्षाविदों ने भी इस घटना पर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा अब सबसे बड़ा सवाल बन गई है। दरभंगा के शिक्षकों और अभिभावकों का कहना है कि बच्चे अब अकेले घर से निकलने में डर महसूस करेंगे। यह घटना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल सकती है।
कानूनविदों का मानना है कि यदि प्रशासन को पहले से खतरे की जानकारी थी और फिर भी कार्रवाई नहीं हुई, तो इसे गंभीर प्रशासनिक विफलता माना जा सकता है। कई कानूनी विशेषज्ञों ने पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग उठाई है। उनका कहना है कि शहरी निकायों की जिम्मेदारी सिर्फ टैक्स वसूली तक सीमित नहीं हो सकती, नागरिकों की सुरक्षा भी उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
राजनीतिक गलियारों में भी इस घटना ने हलचल पैदा कर दी है। विपक्षी दलों ने बिहार सरकार और नगर प्रशासन पर हमला बोलते हुए कहा कि राज्य में आम आदमी की सुरक्षा भगवान भरोसे है। राजद नेताओं ने कहा कि “जब राजधानी जैसे शहरों में बच्चे आवारा कुत्तों से सुरक्षित नहीं हैं, तो सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे कैसे कर सकती है?
” कांग्रेस नेताओं ने भी नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की है।वहीं प्रशासन अब हरकत में आया है। पुलिस ने पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी कर शव परिजनों को सौंप दिया है।
बहादुरपुर थानाध्यक्ष प्रसूनजय कुमार ने बताया कि परिवार की ओर से आवेदन दिया गया है और मामले की कागजी कार्रवाई की जा रही है। नगर निगम अधिकारियों ने इलाके में आवारा कुत्तों को पकड़ने और विशेष अभियान चलाने की बात कही है।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—
क्या हर बार किसी मासूम की मौत के बाद ही व्यवस्था जागेगी? क्या शहर की गलियां अब बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं रहीं? दरभंगा की यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस लापरवाह शहरी व्यवस्था का आईना है, जहां इंसानी जिंदगी की कीमत अक्सर हादसों के बाद समझी जाती है।
