दिल्ली ब्लास्ट: डॉक्टरों का दिमाग, 26 लाख की फंडिंग और 26 क्विंटल खाद — साजिश के भीतर की साजिश , पैसों पर झगड़ा, खाद की थोक खरीद और नया CCTV फुटेज — जांच में खुलते जा रहे हैं राज

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली, 13 नवंबर

दिल्ली के लाल किले के पास 10 नवंबर को हुए धमाके ने पूरे देश को हिला दिया। अब इस केस की जांच में जो बातें सामने आ रही हैं, वो आतंक की एक नई और खतरनाक तस्वीर पेश करती हैं —साजिश रचने वाले वही लोग थे जो सफेद कोट पहनकर मरीजों का इलाज करते थे।

“व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल”राष्ट्रीय जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस ब्लास्ट के पीछे कोई साधारण गिरोह नहीं, बल्कि एक “व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल” था। इसमें डॉक्टर शामिल थे — पढ़े-लिखे, सम्मानित और समाज में भरोसेमंद चेहरे।इनमें डॉ. उमर मोहम्मद, डॉ. मुजम्मिल गनई, डॉ. अदील अहमद राथर और डॉ. शाहीन सईद के नाम प्रमुख हैं।इन्होंने धमाके के लिए 26 लाख रुपये का फंड जुटाया था। यह रकम आपसी संपर्कों, चंदे और संदिग्ध स्रोतों से इकट्ठी की गई थी। पैसा बाद में डॉ. उमर को सौंपा गया, जो फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर था — वही विश्वविद्यालय जो अब दिल्ली ब्लास्ट के तारों के बाद जांच के घेरे में है।

26 क्विंटल खाद से बना बारूदइन आतंकियों ने इस पैसे का इस्तेमाल विस्फोटक तैयार करने के लिए किया।जांच में खुलासा हुआ कि इन्होंने 26 क्विंटल NPK खाद खरीदी — जो आमतौर पर खेती में इस्तेमाल होती है, लेकिन इसमें मौजूद नाइट्रोजन और अमोनियम नाइट्रेट इसे बारूद का कच्चा माल बना देते हैं।अधिकारियों के मुताबिक, इस ग्रुप ने गुरुग्राम, नूंह और आसपास के सप्लायर्स से करीब 3 लाख रुपये की खाद खरीदी।ये खरीद इतनी बड़ी मात्रा में की गई कि एजेंसियों के सिस्टम में अलार्म बज गया — और यही उनकी गिरफ्तारी की एक बड़ी वजह बनी।NPK खाद में मौजूद अमोनियम नाइट्रेट और अन्य केमिकल मिलाकर “ANFO” (Ammonium Nitrate Fuel Oil) नाम का विस्फोटक तैयार किया गया था — जो खदानों में इस्तेमाल होने वाले बम जैसा होता है।

पैसे पर झगड़ा बना गिरफ्तारी की वजह?जांचकर्ताओं के अनुसार, 26 लाख रुपये की रकम पर डॉ. उमर और डॉ. मुजम्मिल के बीच विवाद हो गया था।कहा जाता है कि उमर पर बाकी तीनों को भरोसा नहीं रहा — उसने पैसे का कुछ हिस्सा छुपा लिया था, और यही अंदरूनी झगड़ा बाद में उनकी प्लानिंग को डगमगा गया।एजेंसियों को शक है कि इसी विवाद के दौरान उनके संपर्कों और गतिविधियों के बारे में कुछ सुराग लीक हुए, जिसने इस मॉड्यूल को पकड़वाने में अहम भूमिका निभाई।

धमाके के दिन क्या हुआ — CCTV में दर्ज हर हरकतअब एक नया CCTV फुटेज भी सामने आया है, जिसने इस साजिश को और स्पष्ट कर दिया है।वीडियो में डॉ. उमर को 10 नवंबर की सुबह 8:02 बजे बदरपुर बॉर्डर टोल प्लाजा से गुजरते हुए देखा गया।वह सफेद रंग की i20 कार चला रहा था — वही कार जिसमें बाद में विस्फोट हुआ।फुटेज में उमर टोल पर रुकता है, नकद भुगतान करता है और आगे बढ़ता है। उसके चेहरे पर मास्क है, लेकिन कैमरे की ओर उसकी बार-बार नजरें एजेंसियों को हैरान करती हैं।

अधिकारी कहते हैं —उसे पता था कि एजेंसियां उसके पीछे हैं। वह हर कैमरे को पहचान रहा था, पर डर नहीं था — मानो आखिरी मिशन पर जा रहा हो।इसके बाद एक और वीडियो में वह रामलीला मैदान के पास की गली में चलता दिखा —उसका चेहरा कुछ क्षणों के लिए कैमरे में साफ दिखा, और कुछ घंटे बाद उसी कार में धमाका हो गया।विस्फोट में उसका शरीर बुरी तरह क्षतिग्रस्त मिला — पहचान केवल DNA से संभव हो पाई।

अब जांच फंडिंग और ट्रांजेक्शन पर केंद्रितअब पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसियां वित्तीय लेन-देन, खाद सप्लायर्स, और ऑनलाइन भुगतान रिकॉर्ड की गहराई से जांच कर रही हैं।एजेंसियों को शक है कि इस 26 लाख की रकम में से कुछ हिस्सा विदेश से आया —

संभवतः

तुर्की या मध्य-पूर्व के हैंडलर्स के जरिए।इसके साथ ही दिल्ली पुलिस ने सभी रासायनिक दुकानों और खाद एजेंसियों को निर्देश दिया है कि वे बड़ी मात्रा में NPK या अमोनियम नाइट्रेट खरीदने वालों की जानकारी अनिवार्य रूप से साझा करें।🩺 डॉक्टर जो मरीज नहीं, मौत लिखते थेआतंक की यह कहानी इसलिए भी डराती है क्योंकि इसमें बंदूक नहीं, ब्रेन इस्तेमाल हुआ।जो डॉक्टर कभी लोगों की जान बचाने की कसम खाते हैं, उन्होंने उसी ज्ञान का इस्तेमाल लोगों की जान लेने में किया।

डॉ. उमर का पुलवामा से, डॉ. मुजम्मिल का श्रीनगर से, और बाकी सदस्यों का नूह-फरीदाबाद से संबंध था।इनका मकसद सिर्फ दिल्ली नहीं, बल्कि कई बड़े शहरों में सीरिज़ ब्लास्ट करना था — लाल किला उनका पहला टारगेट था।

जांच का अगला पड़ावअब एजेंसियां इस बात की तह में जा रही हैं किइन डॉक्टरों को इतनी तकनीकी जानकारी किसने दी?क्या फंडिंग के पीछे कोई विदेशी संगठन था?और क्या अल फलाह यूनिवर्सिटी की कोई आंतरिक भूमिका रही?फोरेंसिक ऑडिट और मोबाइल डेटा एनालिसिस से उम्मीद है कि जल्द ही इस मॉड्यूल के पीछे बैठे असली “मास्टरमाइंड्स” तक पहुंच बन जाएगी

।निष्कर्ष

26 लाख रुपये, 26 क्विंटल खाद और चार डॉक्टर —यह कहानी बताती है कि आतंकवाद अब बंदूक से नहीं, दिमाग से रचा जा रहा है।दिल्ली ब्लास्ट ने भारत को सिर्फ सुरक्षा की नहीं, सामाजिक चेतना की चुनौती भी दी ।

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