दुनिया संघ की कार्यशैली से सीखना चाहती है’: मोहन भागवत बोले— हम किसी संगठन को नियंत्रित नहीं करते, हमारा लक्ष्य व्यक्तित्व और राष्ट्र निर्माण

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली , 5 जुलाई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को संघ की कार्यप्रणाली, उसके उद्देश्य और वैश्विक स्वीकार्यता पर विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि आज दुनिया के अनेक देशों के लोग संघ के कार्यों को समझने और उसकी प्रशिक्षण पद्धति को सीखने भारत आ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पांचों महाद्वीपों से आने वाले प्रतिनिधि एक ही प्रश्न पूछते हैं—क्या संघ उनके देशों के युवाओं को भी इसी प्रकार संस्कारित और प्रशिक्षित करने की पद्धति सिखा सकता है?

भागवत ने साथ ही उस धारणा को भी स्पष्ट रूप से खारिज किया कि संघ विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक या अन्य संगठनों को पर्दे के पीछे से संचालित करता है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक भ्रम है। संघ किसी संस्था को नियंत्रित नहीं करता, बल्कि ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण करता है जो अपने विवेक, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में सेवा करते हैं।

डॉ. हेडगेवार पर आधारित कार्यक्रम में रखा दृष्टिकोण

भागवत एक विशेष कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, जिसका आयोजन ‘डॉ. हेडगेवार: आधुनिक युग के शालिवाहन’ शीर्षक यूट्यूब वीडियो के सार्वजनिक प्रसारण के अवसर पर किया गया था। इस मौके पर संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आरएसएस के प्रचारकों के जीवन, त्याग और सेवा पर आधारित 100 विशेष वीडियो भी जारी किए गए।अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संघ का मूल उद्देश्य किसी राजनीतिक या प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित होकर कार्य करें।

दुनिया में ऐसी प्रशिक्षण पद्धति कहीं नहीं ‘

‘भागवत ने कहा कि संघ का सबसे बड़ा कार्य चरित्रवान, अनुशासित और समाजनिष्ठ व्यक्तित्वों का निर्माण करना है। उनके अनुसार संघ की शाखा केवल शारीरिक गतिविधियों का केंद्र नहीं है, बल्कि वह जीवन मूल्यों को व्यवहार में उतारने का माध्यम है।उन्होंने कहा कि पहले वे स्वयं संघ की इस विशेषता का उल्लेख किया करते थे, लेकिन अब इसकी चर्चा स्वयं दुनिया के लोग कर रहे हैं। विदेशों से आने वाले प्रतिनिधि संघ की कार्यशैली देखकर प्रभावित होते हैं और चाहते हैं कि उनके देशों के युवाओं को भी इसी प्रकार का प्रशिक्षण मिले।

भागवत ने कहा कि संघ की शक्ति उसकी शाखाओं, कार्यक्रमों या आयोजनों में नहीं, बल्कि उन स्वयंसेवकों में है जो समाज के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन का प्रयास करते हैं।

संघ किसी को नियंत्रित नहीं करता’

आरएसएस प्रमुख ने उन आरोपों और धारणाओं पर भी प्रतिक्रिया दी, जिनमें कहा जाता है कि संघ अनेक संगठनों को पर्दे के पीछे से संचालित करता है।उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ किसी संस्था, संगठन या मंच को नियंत्रित नहीं करता। संघ केवल ऐसे स्वयंसेवक तैयार करता है जो अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। यदि विभिन्न संस्थाओं में संघ के स्वयंसेवक सक्रिय दिखाई देते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उन संस्थाओं का संचालन संघ कर रहा है।उन्होंने कहा कि संघ का कार्य आदेश देना नहीं, बल्कि संस्कार देना है। स्वयंसेवक जहां भी जाते हैं, वहां अपने आचरण, अनुशासन और सेवा-भाव से समाज में योगदान देते हैं।

प्रचारक कौन होते हैं?

भागवत ने अपने संबोधन में प्रचारकों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रचारक वे पूर्णकालिक स्वयंसेवक होते हैं जो अपना संपूर्ण जीवन संगठन और समाज की सेवा के लिए समर्पित कर देते हैं। उनका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और सामाजिक संगठन को मजबूत करना होता है।उन्होंने कहा कि प्रचारकों का जीवन त्याग, अनुशासन और सेवा का उदाहरण है तथा यही संघ की सबसे बड़ी पूंजी है।

धर्म की रक्षा और राष्ट्र का वैभव हमारा उद्देश्य

‘सर संघचालक ने कहा कि संघ का मिशन केवल व्यक्तित्व निर्माण तक सीमित नहीं है। उसका व्यापक उद्देश्य ऐसा राष्ट्र निर्माण करना है जो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, नैतिक रूप से सशक्त और विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सके।उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा का अर्थ केवल बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा नहीं, बल्कि उसके मूल सिद्धांतों का पालन और संरक्षण भी है। जब समाज स्वयं अपने जीवन में धर्म के मूल्यों को अपनाता है, तभी राष्ट्र वास्तविक अर्थों में मजबूत बनता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग हिंदू राष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं, उनका दायित्व है कि वे धर्म का पालन करें और उसके संरक्षण में अपनी भूमिका निभाएं।

भारत से दुनिया को है सही दिशा की उम्मीद

‘भागवत ने कहा कि आज विश्व अनेक प्रकार के संकटों और वैचारिक अस्थिरता से जूझ रहा है। ऐसे समय में दुनिया की निगाहें भारत की ओर हैं। वैश्विक समुदाय भारत से नैतिक नेतृत्व और सही दिशा की अपेक्षा कर रहा है।उन्होंने कहा कि यह दायित्व तभी निभाया जा सकता है जब भारत आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि से सशक्त बने। एक गौरवशाली और आत्मविश्वासी भारत ही विश्व को संतुलन, शांति और मानवीय मूल्यों का संदेश दे सकता है।

बदल रही है समाज की सोच’

अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में भागवत ने कहा कि संघ के प्रति समाज का दृष्टिकोण समय के साथ बदला है। उन्होंने कहा कि संगठन के शुरुआती वर्षों में उसे उपेक्षा और गलतफहमियों का सामना करना पड़ा, लेकिन जैसे-जैसे संघ का सेवा कार्य समाज के सामने आया, लोगों का विश्वास और सम्मान भी बढ़ता गया।

उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में संघ का कार्यक्षेत्र और व्यापक होगा तथा समाज के अधिकाधिक लोग राष्ट्र निर्माण की इस प्रक्रिया में सहभागी बनेंगे।

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