नीतीश ‘ज़रूरी’ या ‘मजबूरी’? NDA में नए समीकरणों की दस्तक — JDU का ट्वीट बना बवाल, फिर किया डिलीट

बी के झा

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पटना, 14 नवंबर

बिहार की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिख रही है, जहां कुछ भी स्थायी नहीं और हर राजनीतिक कदम अपने भीतर किसी न किसी बड़े संकेत को छिपाए हुए है। विधानसभा चुनाव 2025 के मतदान के बाद जारी रुझानों ने सत्ता के खेल में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं—

सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या नीतीश कुमार अब भी NDA के लिए ‘अनिवार्य’ हैं, या समीकरण इस कदर बदल चुके हैं कि उनके बिना भी सत्ता का रास्ता साफ होता दिख रहा है?JDU के डिलीट किए गए ट्वीट ने बढ़ाई हलचलसुबह-सुबह JDU के आधिकारिक एक्स हैंडल से एक पोस्ट सामने आया—“न भूतो न भविष्यति… नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री थे, हैं और रहेंगे।”

इस पोस्ट के साथ नीतीश की तस्वीर लगी थी।लेकिन चंद मिनटों में ही यह ट्वीट डिलीट कर दिया गया।यहीं से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई।क्या पार्टी जल्दबाज़ी में कोई ‘मेसेज’ देना चाहती थी?क्या BJP के भीतर अलग सोच जन्म ले चुकी है?

इसी बीच, पटना स्थित जदयू कार्यालय में लगा बड़ा पोस्टर —

टाइगर अभी ज़िंदा है”

—नीतीश की राजनीतिक जीवटता की याद दिला रहा था।मगर सवाल वही—क्या NDA नीतीश के बिना सरकार बना सकता है?रुझान संकेत दे रहे हैं—हाँ, बिल्कुल बना सकता है।NDA का नया गणित — बिना नीतीश भी बहुमत के पाररुझानों के अनुसार NDA के भीतर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती दिख रही है। सीटों का संभावित आंकड़ा:BJP – 95JDU – 82LJP(R) – 20HAM – 5RLM – 4लेकिन यदि JDU को इस सूची से बाहर कर दें, तब भी गठबंधन का नया संभावित समीकरण बनता है:BJP + LJP(R) + HAM + RLM = 124 सीटेंऔर बहुमत का आंकड़ा है 122।यानि—नीतीश के बिना भी NDA आराम से सरकार बना सकता है,और BJP पहली बार अपना मुख्यमंत्री दे सकती है।विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस के 3, वाम के 2 और बसपा के 1 विधायक BJP को समर्थन देकर यह संख्या और बढ़ा सकते हैं।

मतलब—BJP के पास रास्ते भी खुले हैं और विकल्प भी।अमित शाह के पुराने बयान ने बढ़ाई चर्चा

जून 2025 में अमित शाह ने कहा था—“बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा, वक्त तय करेगा; लेकिन हम चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ रहे हैं।”बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा

नीतीश ही मुख्यमंत्री हैं और चुनाव के बाद भी वही रहेंगे।”लेकिन आज के रुझान बताते हैं कि BJP के भीतर पहली बार यह विचार मजबूत हो रहा है कि यदि नंबर अनुमति दें, तो नेतृत्व परिवर्तन का विकल्प भी खुला है।और JDU का ट्वीट—फिर उसे डिलीट करना—

इसी अनिश्चितता और घबराहट का संकेत माना जा रहा है।दूसरा समीकरण — क्या नीतीश महागठबंधन में लौट सकते हैं?

यदि JDU NDA छोड़कर महागठबंधन में जाती है, तो स्थिति कुछ यूँ बनती है:JDU – 84RJD – 25कांग्रेस – 5वाम दल – 3अन्य – 6कुल = 117, यानी बहुमत से 5 कम।यानि नीतीश के लिए यह रास्ता भी फिलहाल सरकार नहीं देता।तो क्या होगा?

नई जोड़-तोड़?नए चेहरे?या फिर राजनीतिक गणित का नया अध्याय?राजनीति का निष्कर्ष — खेल अभी बाकी हैआज की स्थिति यह बताती है कि:नीतीश कुमार अब NDA के लिए ‘एकमात्र विकल्प’ नहीं रहे।

BJP पहली बार बिहार में अपने दम पर सत्ता नेतृत्व कर सकती है।जदयू के भीतर असमंजस गहरा रहा है—डिलीट किया गया ट्वीट इसका प्रमाण है।

महागठबंधन भी नीतीश को बहुमत नहीं देता—यानि राजनीतिक साजिशें और जोड़-तोड़ फिलहाल जारी रहेंगी।

इसी बीच, एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा कि:“हमने चुनाव से पहले ही यह बोला था और आज फिर कह रहा हूँ—नीतीश कुमार को फिलहाल मुख्यमंत्री तो बनाया जाएगा, लेकिन कितने समय के लिए, यह कहना मुश्किल है। बिहार की राजनीति ठीक उसी राह पर चल पड़ी है, जिस राह पर महाराष्ट्र में शिंदे के साथ BJP ने खेल सेट किया था।

हालांकि अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी भी जानते हैं कि एकनाथ शिंदे और नीतीश कुमार में जमीन-आसमान का फर्क है। लेकिन अगले 6 महीने या फिर बंगाल चुनाव के बाद बिहार की राजनीति में बहुत कुछ बदल सकता है, जो राज्य के भविष्य के लिए अच्छा भी हो सकता है और चुनौती भी।

”वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का दावा—

“नीतीश को फिलहाल मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन तस्वीर स्थायी नहीं”

एक अन्य वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा:“हमने चुनाव से पहले ही संकेत दिया था और आज रुझान इसे फिर पुष्टि कर रहे हैं—नीतीश कुमार को फिलहाल मुख्यमंत्री तो बनाया जाएगा, लेकिन यह व्यवस्था कितने समय तक कायम रहेगी, कहना कठिन है।

बिहार की राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ रही है, जिस दिशा में महाराष्ट्र में शिंदे के साथ BJP ने सत्ता संरचना को पुनर्गठित किया था।

हालांकि अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि शिंदे और नीतीश की राजनीतिक प्रकृति में भारी अंतर है।”उन्होंने आगे कहा:“अगले 6 महीने, या फिर बंगाल चुनाव के बाद, बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सत्ता संतुलन में होने वाली ये संभावित हलचलें राज्य के भविष्य के लिए कैसी साबित होंगी, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगा, मगर इतना तय है कि राजनीति क स्थिरता चुनौतीपूर्ण रहने वाली है।”

अंतिम पंक्ति

बिहार में सत्ता की गली हमेशा तंग रही है—लेकिन इस बार मोड़ जितना तीखा है, उतना वर्षों से नहीं देखा गया।नीतीश ‘ज़रूरी’ भी हैं और ‘मजबूरी’ भी—और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है।

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