बी के झा
पटना, 6 मार्च
करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे मुख्यमंत्री Nitish Kumar के राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद राज्य की सत्ता को लेकर नई राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है। पटना से लेकर दिल्ली तक यह चर्चा जोरों पर है कि सांसद बनने के बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं।यदि ऐसा होता है तो बिहार की राजनीति में एक युग का अंत और एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत मानी जाएगी। सत्ता के गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—नीतीश के बाद बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा?
सत्ता की नई पटकथा
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार भाजपा और जदयू के बीच नेतृत्व को लेकर मंथन जारी है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस बार मुख्यमंत्री पद भाजपा के खाते में जा सकता है और जदयू गठबंधन में सहयोगी की भूमिका निभा सकती है।हालांकि जदयू के कई नेता और विधायक इस संभावना से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि बिहार में सत्ता का नेतृत्व जदयू के पास ही रहना चाहिए।
अमित शाह का ‘बड़ा आदमी’ वाला बयान फिर चर्चा में
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने दो भाजपा नेताओं के लिए चुनावी सभाओं में एक विशेष टिप्पणी की थी। उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा था कि इन नेताओं को भारी मतों से जिताइए, “हम इन्हें बड़ा आदमी बनाएंगे।”आज वही बयान फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। जिन दो नेताओं का जिक्र किया गया था, वे हैं—बिहार के उपमुख्यमंत्री Samrat Choudharyभाजपा विधायक Sunil Kumar Pintu संभावित मुख्यमंत्री के चेहरे
1. सम्राट चौधरी भाजपा के मजबूत ओबीसी चेहरे के रूप में उभरे Samrat Choudhary को सबसे मजबूत दावेदारों में माना जा रहा है। संगठन में उनकी पकड़ और पार्टी नेतृत्व के साथ उनकी नजदीकी उन्हें आगे बढ़ा सकती है।हालांकि राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि भाजपा के कुछ वरिष्ठ विधायक उनके नाम को लेकर अंदरखाने असहज भी हैं।
2. सुनील कुमार पिंटू सीतामढ़ी से विधायक Sunil Kumar Pintu को अमित शाह का करीबी माना जाता है। चुनाव प्रचार के दौरान शाह ने उन्हें अपना मित्र बताते हुए उन्हें “बड़ा आदमी” बनाने की बात कही थी।भाजपा की रणनीति को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि पार्टी अचानक किसी नए चेहरे को आगे कर सकती है।
3. जदयू का दावा जदयू नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री पद उनके दल के पास ही रहना चाहिए क्योंकि पिछले कई वर्षों से राज्य में शासन की कमान उनके हाथ में रही है।कुछ राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि भविष्य में नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को भी राजनीति में बड़ी भूमिका दी जा सकती है, हालांकि उन्होंने अभी तक सक्रिय राजनीति में कदम नहीं रखा है।
विपक्ष का हमला
नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर एनडीए सरकार पर निशाना साधा है।उन्होंने कहा कि“बिहार की जनता ने विकास के लिए वोट दिया था, न कि सत्ता के अंदरूनी समीकरणों और नेतृत्व की खींचतान के लिए।”राजद नेताओं का आरोप है कि एनडीए के भीतर ही नेतृत्व को लेकर असमंजस है और यही कारण है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर लगातार अटकलें लग रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बिहार की राजनीति फिलहाल तीन संभावित दिशाओं में आगे बढ़ सकती है—भाजपा मुख्यमंत्री बनाकर सत्ता संतुलन बदल दे या फिर
जदयू ही नया मुख्यमंत्री दे और गठबंधन का वर्तमान स्वरूप बना रहे
नेतृत्व के सवाल पर गठबंधन के भीतर तनाव बढ़े
पटना विश्वविद्यालय के एक राजनीतिक अध्येता का कहना है कि“यदि नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए दिल्ली जाते हैं, तो बिहार में सत्ता संरचना का बदलना स्वाभाविक है।
”समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों की राय
राज्य के कई समाजसेवियों और शिक्षाविदों का मानना है कि बिहार को फिलहाल राजनीतिक स्थिरता की जरूरत है।एक वरिष्ठ समाजसेवी ने कहा कि“नेतृत्व परिवर्तन लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन सरकार की नीतियों और विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहनी चाहिए।”
राजनीतिक इतिहास का अहम मोड़
करीब दो दशक तक बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाले Nitish Kumar के बाद नेतृत्व परिवर्तन की संभावना को राजनीतिक इतिहास का बड़ा मोड़ माना जा रहा है।यदि मुख्यमंत्री बदलता है तो यह केवल व्यक्ति परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि बिहार की राजनीति के शक्ति संतुलन और रणनीति में भी बड़ा बदलाव ला सकता है।
अब सबकी नजर अगले फैसले परबिहार की राजनीति इस समय कयासों और संभावनाओं के दौर से गुजर रही है।
क्या मुख्यमंत्री बनेंगे Samrat Choudhary?
क्या भाजपा कोई नया चेहरा सामने लाएगी?
या जदयू ही नेतृत्व बनाए रखेगी? इन सभी सवालों का जवाब आने वाले दिनों में मिल सकता है।फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ी है।
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