“फलता में ‘ममता मॉडल’ ध्वस्त! हार से बौखलाई TMC, अभिषेक के आरोपों पर शुभेंदु का पलटवार; अब काकोली के इस्तीफे से बढ़ी सियासी हलचल”

बी के झा

NSK

कोलकाता/ नई दिल्ली, 25 मई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में फलता चुनाव परिणाम ने ऐसा भूचाल ला दिया है, जिसने तृणमूल कांग्रेस की अंदरूनी बेचैनी को खुलकर सामने ला दिया है। जिस सीट को कभी टीएमसी का अभेद्य किला माना जाता था, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सत्ता पक्ष की राजनीतिक जमीन खिसका दी।फलता सीट पर बीजेपी उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने माकपा प्रत्याशी शंभु नाथ कुर्मी को एक लाख से अधिक वोटों के विशाल अंतर से हराकर राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैला दी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान चौथे स्थान पर खिसक गए। यह परिणाम केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक मानसिकता का संकेत माना जा रहा है।

हार के बाद ‘फायर मोड’ में अभिषेक बनर्जी

डायमंड हार्बर से टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूरे चुनावी प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि मतगणना की गति असामान्य रही और टीएमसी कार्यकर्ताओं को बूथों से बाहर कर दिया गया।अभिषेक ने कहा कि“फलता में लोकतंत्र को कुचल दिया गया। पार्टी कार्यालयों पर हमले हुए, पोलिंग एजेंट्स को भगाया गया और चुनाव आयोग आंख मूंदकर सब देखता रहा।”उनके इस बयान के बाद बंगाल की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज हो गया है।

शुभेंदु अधिकारी का करारा जवाब

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने अभिषेक के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि“15 साल बाद बंगाल की जनता को स्वतंत्र होकर वोट डालने का मौका मिला है, इसलिए सच्चाई सामने आ गई। टीएमसी लोकतांत्रिक दल नहीं, बल्कि माफिया कंपनी बन चुकी थी।”उन्होंने कहा कि “डायमंड हार्बर मॉडल”, जिसे टीएमसी अपनी राजनीतिक ताकत का प्रतीक बताती थी, अब उसी की हार का मॉडल बन गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: ‘यह सिर्फ हार नहीं, संकेत है

’राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फलता का परिणाम केवल एक सीट की हार नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी माहौल का शुरुआती संकेत हो सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार,“अगर टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में इस स्तर की गिरावट दिखाई दे रही है, तो यह ममता बनर्जी के लिए चेतावनी है। बंगाल में भ्रष्टाचार, स्थानीय गुटबाजी और संगठनात्मक थकान अब खुलकर सामने आने लगी है।”विश्लेषकों का यह भी कहना है कि टीएमसी की सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि बनती जा रही है।

काकोली घोष के इस्तीफे से बढ़ी बेचैनी

इसी बीच काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे की खबरों ने तृणमूल की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पार्टी की वरिष्ठ सांसद और ममता बनर्जी की करीबी मानी जाने वाली काकोली ने जिला संगठन पद छोड़ दिया है। उनके बेटे वैद्यनाथ घोष ने खुलकर कहा कि लगातार सामने आ रहे घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों ने परिवार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।उन्होंने पार्थ चटर्जी भर्ती घोटाला, राशन घोटाला और आरजी कर अस्पताल विवाद जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि“एक सम्मानित परिवार आखिर कब तक भ्रष्टाचार के आरोपों का बोझ ढोए?

”हालांकि भाजपा में शामिल होने के सवाल पर उन्होंने सीधे तौर पर इनकार किया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे टीएमसी के भीतर बढ़ते असंतोष का बड़ा संकेत माना जा रहा है।

कानूनविदों की टिप्पणी: ‘चुनाव आयोग पर आरोप गंभीर’

संवैधानिक मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि किसी दल को चुनाव प्रक्रिया पर आपत्ति है, तो उसके लिए कानूनी रास्ते खुले हैं। लेकिन केवल राजनीतिक बयानबाजी से लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।एक वरिष्ठ कानूनविद ने कहा,“अगर बूथ कैप्चरिंग, पोलिंग एजेंट्स को हटाने या प्रशासनिक पक्षपात के आरोप हैं, तो चुनाव आयोग और अदालतों में ठोस साक्ष्य पेश किए जाने चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।”

शिक्षाविदों की चिंता: ‘बंगाल की राजनीति में संवाद खत्म’

शिक्षाविदों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि बंगाल की राजनीति लगातार अधिक आक्रामक और ध्रुवीकृत होती जा रही है। चुनाव अब विचारधारा से अधिक टकराव और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हैं।एक प्रोफेसर ने टिप्पणी की,“बंगाल कभी वैचारिक राजनीति की भूमि माना जाता था, लेकिन अब वहां राजनीतिक हिंसा, आरोप और संस्थाओं पर अविश्वास सामान्य होते जा रहे हैं।

बीजेपी कार्यकर्ताओं में उत्साह

फलता में मिली जीत के बाद स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा गया। पार्टी समर्थकों ने इसे “जनता की चुप क्रांति” बताया। कई कार्यकर्ताओं का कहना था कि पहली बार लोगों ने बिना भय के मतदान किया।स्थानीय बीजेपी नेताओं ने दावा किया कि“यह सिर्फ शुरुआत है। बंगाल की जनता अब बदलाव चाहती है और टीएमसी के खिलाफ माहौल तेजी से बन रहा है।

ममता सरकार के लिए खतरे की घंटी?

फलता की हार, अभिषेक बनर्जी के तीखे आरोप, काकोली घोष के इस्तीफे की अटकलें और भ्रष्टाचार पर उठते सवाल—इन सबने मिलकर बंगाल की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर टीएमसी ने संगठनात्मक असंतोष और भ्रष्टाचार के आरोपों पर जल्द नियंत्रण नहीं किया, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है।

फलता का जनादेश केवल एक सीट का परिणाम नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलती हवा का संकेत माना जा रहा है—जहां अब जनता सत्ता से जवाब मांगने लगी है।

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