बंगाल की सियासत का खूनी आईना: ‘सेनबाड़ी कांड’ से चंद्रनाथ रथ हत्याकांड तक, क्या हिंसा फिर बन रही है राजनीति की भाषा?

बी के झा

NSK

कोलकाता/ न ई दिल्ली, 7 मई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में विचारधारा का संघर्ष नया नहीं है। लेकिन जब यह संघर्ष लोकतांत्रिक बहस से निकलकर खून, गोलियों और भय के गलियारों में पहुंच जाता है, तब इतिहास सिर्फ घटनाएं नहीं लिखता—वह समाज की आत्मा पर घाव दर्ज करता है।

मध्यमग्राम में भाजपा नेता और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के करीबी चंद्रनाथ रथ की हत्या ने बंगाल की राजनीति में एक बार फिर वही बेचैनी पैदा कर दी है, जिसकी जड़ें 56 वर्ष पुराने उस भयावह “सेनबाड़ी कांड” तक जाती हैं, जिसे आज भी बंगाल की सबसे निर्मम राजनीतिक हिंसाओं में गिना जाता है।

राजनीतिक गलियारों में अब सवाल उठ रहा है—क्या बंगाल फिर उसी दौर की ओर लौट रहा है, जहां विरोधी विचारधारा को लोकतांत्रिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि दुश्मन माना जाता था?

मध्यमग्राम की रात: गोलियों से दहला राजनीतिक माहौल

बुधवार रात उत्तर 24 परगना के मध्यमग्राम इलाके में मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने भाजपा नेता चंद्रनाथ रथ की कार को घेर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पहले एक चारपहिया वाहन ने उनकी गाड़ी को रोका, फिर बेहद नजदीक से गोलियां चलाई गईं। हमलावर मौके से फरार हो गए।इस वारदात के कुछ घंटों बाद ही पनिहाटी इलाके में भाजपा विधायक रत्ना देबनाथ के घर के समीप बम विस्फोट हुआ, जिसमें भाजपा के पांच कार्यकर्ता घायल हो गए।

भाजपा ने इन घटनाओं को “सुनियोजित राजनीतिक हिंसा” करार देते हुए सीधे सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाए हैं। वहीं तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को “राजनीतिक नौटंकी” बताते हुए खारिज किया है।लेकिन इन ताजा घटनाओं ने बंगाल के राजनीतिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक—“सेनबाड़ी कांड”—की भयावह स्मृतियों को फिर जीवित कर दिया है।

17 मार्च 1970: जब राजनीति ने इंसानियत की सारी सीमाएं तोड़ दीं

बर्धमान की प्रतापेश्वर शिबतला लेन स्थित सेन परिवार का घर उस दिन खुशियों से भरा था। परिवार में नवजात शिशु का नामकरण संस्कार होना था। रिश्तेदार जुटे थे, घर में उत्सव की तैयारी थी।लेकिन उसी सुबह पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक ऐसा रक्तरंजित अध्याय लिखा गया, जिसे सुनकर आज भी रूह कांप उठती है।

वरिष्ठ पत्रकार अत्रि मित्र के अनुसार, यूनाइटेड फ्रंट सरकार गिरने के बाद सीपीएम समर्थित हड़ताल के बीच एक विशाल जुलूस सेनबाड़ी पहुंचा। आरोप है कि भीड़ जबरन घर में घुस गई। घर में आग लगा दी गई।फिर शुरू हुआ वह नृशंस तांडव, जिसने बंगाल की राजनीति को हमेशा के लिए शर्मसार कर दिया।परिवार के दो बेटों—मलय सेन और प्रणब सेन—की हत्या कर दी गई।

निजी शिक्षक जितेंद्रनाथ राय को भी मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन क्रूरता यहीं नहीं रुकी।चश्मदीदों और परिवार के सदस्यों के अनुसार, हमलावरों ने दोनों बेटों के खून को चावल में मिलाया और उनकी मां मृगनयनी देवी को जबरन खिलाया।यह घटना सिर्फ हत्या नहीं थी; यह विरोधी विचारधारा को मानसिक और सामाजिक रूप से कुचलने का वीभत्स प्रदर्शन था।“

घर नहीं, नरक बन गया था”: आंखोंदेखी ने दहला दिया था देश

परिवार की सदस्य रेखारानी सेन ने बाद के वर्षों में दिए इंटरव्यू में बताया था कि हमलावर आग लगे तीरों से घर को निशाना बना रहे थे। घर में घुसने के बाद पुरुषों को बेरहमी से पीटा गया।उन्होंने कहा था—“मेरे जेठ प्रणब पर पीछे से कुल्हाड़ी से हमला किया गया। मलय को दौड़ाकर पड़ोसी के घर में मार डाला गया। मेरे पति की आंखों में तेजाब डाल दिया गया।

”स्वर्णलता जश, जो इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी थीं, ने बताया था कि हत्या के बाद जुलूस भी निकाला गया।इतिहासकारों के अनुसार, उस दौर में बंगाल वैचारिक उन्माद, नक्सली हिंसा और राजनीतिक ध्रुवीकरण के चरम दौर से गुजर रहा था।

“सेनबाड़ी कांड” उसी हिंसक राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक बन गया।कानून के कटघरे में राजनीति हार गई इस मामले में 83 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। इनमें उस दौर के कई प्रभावशाली वामपंथी नेताओं के नाम भी शामिल थे।लेकिन 1978 में अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

कानूनविदों का मानना है कि यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने राजनीतिक हिंसा से जुड़े मामलों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था।

कोलकाता हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है—“

जब राजनीतिक दबाव, भय और सामाजिक ध्रुवीकरण जांच को प्रभावित करते हैं, तब सच अदालत तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ जाता है। सेनबाड़ी केस इसका उदाहरण माना जाता है।

”शिक्षाविदों की चिंता: “बंगाल में वैचारिक असहमति अब असुरक्षा में बदल रही

”राजनीतिक समाजशास्त्र के विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल लंबे समय तक वैचारिक राजनीति का केंद्र रहा, लेकिन धीरे-धीरे यहां “कैडर आधारित हिंसा” ने लोकतांत्रिक संवाद की जगह ले ली।कोलकाता विश्वविद्यालय से जुड़े एक शिक्षाविद के अनुसार—“बंगाल में राजनीतिक पहचान अब सामाजिक पहचान बन चुकी है। गांव, मोहल्ला और स्थानीय सत्ता संरचनाएं पार्टी आधारित हो गई हैं। ऐसे में विरोध सिर्फ राजनीतिक मतभेद नहीं रहता, वह व्यक्तिगत शत्रुता का रूप ले लेता है।”

विशेषज्ञों का मानना है कि चंद्रनाथ रथ की हत्या और उसके बाद हुए विस्फोट इस बात का संकेत हैं कि चुनावी जीत-हार के बाद भी राजनीतिक प्रतिशोध का दौर खत्म नहीं हुआ है।

हिंदू संगठनों का आरोप: “टारगेटेड हिंसा हो रही

”कई हिंदू संगठनों ने चंद्रनाथ रथ हत्याकांड और पनिहाटी विस्फोट को “राजनीतिक आतंक” बताया है।उनका आरोप है कि बंगाल में राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। संगठनों ने केंद्रीय एजेंसियों से स्वतंत्र जांच की मांग की है।कुछ संगठनों ने सेनबाड़ी कांड का जिक्र करते हुए कहा कि बंगाल में दशकों से “विचारधारा आधारित हिंसा” की संस्कृति पनपती रही है, जिसे कभी पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया।

भाजपा का हमला: “बंगाल में लोकतंत्र नहीं, डर का राज”

भाजपा नेताओं ने चंद्रनाथ रथ की हत्या को “राजनीतिक हत्या” बताते हुए राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है।शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि बंगाल में विपक्षी कार्यकर्ताओं की सुरक्षा खत्म हो चुकी है। भाजपा का कहना है कि पंचायत चुनावों से लेकर विधानसभा चुनाव तक पार्टी कार्यकर्ताओं पर हमले लगातार बढ़े हैं।भाजपा ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य में पुलिस निष्पक्षता खो चुकी है और राजनीतिक दबाव में काम कर रही है।

तृणमूल कांग्रेस का पलटवार

तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा हर आपराधिक घटना को राजनीतिक रंग देकर राज्य को बदनाम करने की कोशिश करती है।टीएमसी का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।पार्टी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा चुनावी ध्रुवीकरण के लिए बंगाल के पुराने जख्मों को बार-बार उभारती है।

स्थानीय लोगों में भय और बेचैनी

उत्तर 24 परगना और मध्यमग्राम के स्थानीय लोगों का कहना है कि राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है।कई लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि बंगाल में आम नागरिक अब राजनीतिक संघर्षों के बीच खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं।स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि हर बड़ी राजनीतिक घटना के बाद इलाके में तनाव, जुलूस और टकराव का माहौल बन जाता है, जिससे सामान्य जीवन प्रभावित होता है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या बंगाल इतिहास से सबक ले पाएगा?“

सेनबाड़ी कांड” सिर्फ अतीत की घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि जब राजनीति से सहिष्णुता खत्म हो जाती है, तब लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदलने लगता है।आज चंद्रनाथ रथ की हत्या और उसके बाद की घटनाओं ने फिर वही प्रश्न खड़ा कर दिया है—

क्या बंगाल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक प्रतिशोध के बीच की रेखा खोता जा रहा है?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि सभी दल हिंसा की राजनीति से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति नहीं अपनाते, तो बंगाल का इतिहास बार-बार अपने सबसे खूनी अध्याय दोहराता रहेगा।

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