बी के झा
NSK

कोलकाता / न ई दिल्ली, 22 अप्रैल
पश्चिम बंगाल में चुनाव हमेशा सिर्फ वोट नहीं होते—वे इतिहास, पहचान और सत्ता की जंग होते हैं।2026 का विधानसभा चुनाव भी इसी मोड़ पर खड़ा है, जहां एक तरफ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) है, और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP)।लेकिन इस बार चुनावी बहस का सबसे बड़ा शब्द है—“30% मुस्लिम बनाम 57% हिंदू एकजुटता
”सवाल है—क्या चुनाव अब पूरी तरह संख्याओं और पहचान की राजनीति में बदल चुका है?
आधा सदी का इतिहास, एक बार सत्ता परिवर्तन1977 से लेकर अब तक बंगाल ने एक अनोखा राजनीतिक दौर देखा है—34 साल वामपंथ का शासन2011 में पहली बार बड़ा बदलावऔर तब से लगातार TMC का दबदबाआज वामपंथ लगभग हाशिए पर है, और मुकाबला सीधा TMC बनाम BJP में सिमट गया है।
राजनीति का ‘DNA’: संघर्ष और हिंसा
बंगाल की राजनीति को समझना है तो उसके “DNA” को समझना होगा—नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलन राजनीतिक टकराव और हिंसा सत्ता के लिए जमीनी संघर्ष विश्लेषकों के अनुसार—“बंगाल में वही पार्टी टिकती है, जो न सिर्फ चुनाव लड़ सके, बल्कि राजनीतिक दबाव और टकराव को भी झेल सके।”
30% बनाम 57%: असली समीकरण क्या है?
TMC का आधार लगभग 30% मुस्लिम मतदाता मजबूत ग्रामीण नेटवर्क क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड BJP की रणनीति हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण लगभग 57% समर्थन का दावा राष्ट्रीय मुद्दों का स्थानीय अनुवाद लेकिन यह गणित जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है—“यह केवल प्रतिशत का खेल नहीं, बल्कि वोट ट्रांसफर, स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की छवि का भी समीकरण है।”
चुनाव आयोग की ‘सर्जिकल स्ट्राइक
’Election Commission of India ने इस बार अभूतपूर्व कदम उठाए हैं—केंद्रीय बलों की भारी तैनाती नौकरशाही में बड़े बदलाव मोटरसाइकिल पर रोक जैसे कड़े नियम इसे कई लोग स्थानीय बाहुबल और ‘फ्रेंचाइजी पॉलिटिक्स’ पर अंकुश मान रहे हैं।
कानूनी विवाद: वोटर लिस्ट पर सवाल
कुछ इलाकों में मतदाताओं के नाम हटने के आरोपों ने चुनाव को और संवेदनशील बना दिया है।कानूनविदों के अनुसार—“यदि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी साबित होती है, तो यह चुनाव की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।”
विपक्ष और सत्तापक्ष: दो अलग नैरेटिव
TMC का पक्ष
भाजपा पर बाहरी राजनीति का आरोप
सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का दावा
BJP का हमला
तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप
कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार को मुद्दा
शिक्षाविदों की चिंता: समाज में बढ़ती दरार
शिक्षाविद इस चुनाव को सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक संकट मान रहे हैं।एक विशेषज्ञ के अनुसार—“जब चुनाव पहचान के आधार पर लड़े जाते हैं, तो समाज में स्थायी विभाजन पैदा होता है।”‘
शाक दी माछ ढाका जाय ना’: असली मुद्दे छिप नहीं सकते
बंगाल का मशहूर मुहावरा—“शाक दी माछ ढाका जाय ना”(साग से मछली को नहीं छुपाया जा सकता)यह इस चुनाव पर बिल्कुल फिट बैठता है।
क्योंकि—बेरोजगारी उद्योग की कमी
आर्थिक चुनौतियां
इन मुद्दों को सिर्फ पहचान की राजनीति से लंबे समय तक नहीं छिपाया जा सकता।
बड़ी तस्वीर: नया युग या पुरानी परंपरा?
4 मई के नतीजे सिर्फ सरकार नहीं तय करेंगे—वे यह तय करेंगे कि—क्या बंगाल अपनी पुरानी राजनीतिक परंपरा जारी रखेगा या एक नए ध्रुवीकृत राजनीतिक युग में प्रवेश करेगा
निष्कर्ष:
आंकड़ों से आगे की लड़ाई 30% बनाम 57%—यह सिर्फ संख्या है।असल लड़ाई है—भरोसे की पहचान कीऔर भविष्य की दिशा की क्योंकि अंत में—“
चुनाव जीतने के लिए आंकड़े जरूरी हैं,लेकिन राज्य चलाने के लिए समाज का संतुलन।”
