“बंगाल में कैसे पार होगी कांग्रेस की नैया? उम्मीदवार हैं, पर कई सीटों पर संगठन गायब, तीस साल बाद सभी सीटों पर दांव, लेकिन जमीनी हकीकत ने बढ़ाई मुश्किलें”

बी के झा

NSK

कोलकाता / नई दिल्ली, 11 अप्रैल

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक दिलचस्प मोड़ सामने आया है। दशकों बाद कांग्रेस ने राज्य की लगभग सभी सीटों पर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। पार्टी इसे खोई जमीन वापस पाने और खुद को तीसरे विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश बता रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या केवल उम्मीदवार उतार देने से चुनाव जीते जाते हैं, जब कई इलाकों में कार्यकर्ता तक मौजूद नहीं हैं? कांग्रेस का यह अभियान उम्मीद और हकीकत के बीच फंसा दिखाई दे रहा है। एक तरफ घोषणापत्र, बड़े वादे और शीर्ष नेतृत्व की सभाओं की तैयारी है, तो दूसरी ओर कई सीटों पर बूथ स्तर का ढांचा तक कमजोर है।

उम्मीदवार तो हैं, लेकिन चुनाव कौन लड़ेगा?

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि चुनाव केवल टिकट देने से नहीं जीता जाता, बल्कि उसे बूथ स्तर तक लड़ना पड़ता है।कई क्षेत्रों में कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, लेकिन वहां न मजबूत स्थानीय इकाई है, न सक्रिय प्रचार तंत्र, न ही प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का नेटवर्क। खासकर वे सीटें, जहां वर्षों से मुकाबला केवल तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों या भाजपा के बीच रहा है, वहां कांग्रेस की उपस्थिति प्रतीकात्मक अधिक दिख रही है।

एक स्थानीय विश्लेषक ने कहा:“

चुनाव में पोस्टर से ज्यादा जरूरी है पोलिंग एजेंट, बूथ कमेटी, घर-घर पहुंच और मतदाता से व्यक्तिगत संपर्क। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी कमी है।”कमजोर प्रदर्शन का बोझ 2021 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस करीब 3 प्रतिशत वोट पर सिमट गई थी और खाता तक नहीं खोल सकी थी। ऐसे में पार्टी इस बार बहुत सावधानी से कदम बढ़ा रही है।कांग्रेस जानती है कि बंगाल में उसकी लड़ाई केवल भाजपा और तृणमूल से नहीं, बल्कि अपनी खो चुकी विश्वसनीयता को वापस पाने की भी है।

पुराने गढ़ों पर भरोसा

पार्टी का मुख्य फोकस उन इलाकों पर है जहां उसका कभी मजबूत जनाधार रहा है—मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर।बहरामपुर से वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी को उतारना और मालदा क्षेत्र में अनुभवी चेहरों पर भरोसा जताना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस को उम्मीद है कि यदि वह अपने पारंपरिक क्षेत्रों में कुछ सीटें निकाल लेती है, तो पुनर्गठन की शुरुआत हो सकती है।

रणनीति का दूसरा पक्ष: लड़ना भी है, नुकसान भी नहीं करना

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की रणनीति दोहरी है।एक ओर वह अपनी स्वतंत्र पहचान दिखाना चाहती है, दूसरी ओर वह नहीं चाहती कि उसकी मौजूदगी से विपक्षी वोट बंटें और तृणमूल कांग्रेस को सीधा नुकसान पहुंचे। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर तृणमूल कांग्रेस INDIA गठबंधन का हिस्सा है।एक विश्लेषक ने कहा:“बंगाल में कांग्रेस की लड़ाई सीट जीतने से ज्यादा राजनीतिक संदेश देने की है—कि वह अभी खत्म नहीं हुई है।”

क्या स्टार प्रचारक बदलेंगे तस्वीर?

कांग्रेस नेतृत्व अब राज्य में बड़े प्रचार अभियान की तैयारी कर रहा है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के कार्यक्रमों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।यह उल्लेखनीय है कि पिछले प्रमुख चुनावों में राहुल गांधी का बंगाल प्रचार सीमित रहा था। इस बार यदि शीर्ष नेतृत्व सक्रिय होता है तो पार्टी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा आ सकती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे जमीनी ढांचे की कमी पूरी हो पाएगी?

इतिहास की परछाई

एक समय था जब बंगाल कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। 1972 में पार्टी ने 200 से अधिक सीटें जीती थीं। लेकिन 1977 के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदल गया। पहले वाम मोर्चा और फिर तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की राजनीति पर कब्जा जमा लिया।2011 और 2016 में कांग्रेस ने कुछ वापसी के संकेत दिए थे, लेकिन वह स्थायी पुनरुत्थान में नहीं बदल सका।

सबसे बड़ी चुनौतियां

1. संगठन की कमीकई सीटों पर उम्मीदवार हैं, लेकिन सक्रिय कैडर नहीं।

2. संसाधनों का अभावतृणमूल और भाजपा की तुलना में प्रचार मशीनरी कमजोर।

3. स्पष्ट संदेश की जरूरतमतदाता जानना चाहता है कि कांग्रेस सत्ता में आए तो क्या अलग करेगी।

4. गठबंधन की दुविधाराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग, राज्य स्तर पर मुकाबला—यह संतुलन कठिन है।

5. नई पीढ़ी से दूसरी युवा मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ कमजोर मानी जाती है।क्या फिर उठ सकती है कांग्रेस?राजनीतिक रणनीतिकार मानते हैं कि यदि कांग्रेस 5-10 सीटें भी प्रभावशाली तरीके से निकालती है, तो यह उसके लिए मनोवैज्ञानिक जीत होगी। इससे संगठन को नया जीवन मिल सकता है।लेकिन यदि उम्मीदवार तो खड़े हों और वोट न बढ़े, तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी अभी भी जमीन से दूर है।

निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस इस बार चुनाव नहीं, अपनी प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ रही है। तीस साल बाद सभी सीटों पर उतरना साहसिक फैसला जरूर है, पर चुनावी नैया केवल उम्मीदवारों से नहीं, कार्यकर्ताओं, संगठन और भरोसे से पार होती है।

अब देखना यह है कि कांग्रेस का यह दांव पुनर्जन्म साबित होगा या केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति बनकर रह जाएगा।

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