बी के झा
NSK

दरभंगा/पटना, 11 अप्रैल
दरभंगा में सामने आए लगभग दो करोड़ रुपये के बैंक लोन घोटाले ने अब केवल एक बैंक शाखा या कुछ अधिकारियों की भूमिका तक सीमित सवाल नहीं छोड़ा है, बल्कि बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी योजनाओं के संचालन और राजनीतिक संरक्षण की संस्कृति पर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए हैं।इंडियन ओवरसीज बैंक शाखा में हुए इस कथित फर्जीवाड़े में बैंक अधिकारी, विभागीय कर्मी और बिचौलियों की मिलीभगत की बात सामने आने के बाद स्थानीय बुद्धिजीवी वर्ग का कहना है कि यह “बर्फ की चोटी” भर है। असली तस्वीर इससे कहीं बड़ी हो सकती है।
घोटाले का तरीका: गरीब के नाम पर लोन, पैसा किसी और के पास
जांच में खुलासा हुआ कि आम नागरिकों और मजदूरों के दस्तावेजों का उपयोग कर फर्जी उद्योग, दुकानों और व्यवसायों के नाम पर ऋण स्वीकृत किए गए। प्रधानमंत्री खाद्य प्रसंस्करण योजना जैसी योजनाओं का लाभ दिखाकर अनुदान राशि भी निकाली गई।रकम पहले निजी खातों में भेजी गई और फिर वहां से अन्य कंपनियों में ट्रांसफर कर दी गई। जिन लोगों के नाम पर ऋण लिया गया, उनमें से कई को इसकी जानकारी तक नहीं थी।
शिक्षाविदों का विस्तृत बयान: “यह अकेली घटना नहीं, व्यवस्था की बीमारी है”
दरभंगा के एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि यह घटना अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। यदि इस मामले की ईमानदारी से जांच की जाए तो बिहार के कई जिलों से ऐसे ही अनेक मामले सामने आ सकते हैं।उन्होंने कहा:“यह मान लेना भूल होगी कि केवल एक बैंक शाखा में यह सब हुआ। यदि निष्पक्ष जांच हो जाए तो दरभंगा, मधुबनी और उत्तर बिहार के कई बाढ़ प्रभावित जिलों से बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े उजागर होंगे।”उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के मामलों में केवल बैंक कर्मी ही शामिल नहीं होते, बल्कि प्रखंड स्तर से लेकर जिला मुख्यालय तक कुछ अधिकारी, प्रभावशाली बिचौलिये और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोग भी भूमिका निभाते हैं।“जहां गरीब को लाभ मिलना चाहिए, वहां फाइल पहले दलाल के पास जाती है।
बिना चढ़ावे, बिना सिफारिश और बिना हिस्सेदारी गरीब आदमी को योजना का लाभ मिलना बेहद कठिन बना दिया गया है।
”इंदिरा आवास से किसान योजना तक उठे सवाल
शिक्षाविद ने कहा कि समस्या सिर्फ बैंक लोन तक सीमित नहीं है। कई सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता की भारी कमी है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आवास योजना, किसान सहायता योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, राशन कार्ड, स्वरोजगार योजना और छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं में भी शिकायतें लगातार आती रही हैं।“जिन योजनाओं का उद्देश्य गरीब को राहत देना था, वे कई जगहों पर कमीशन और सिफारिश का माध्यम बन गई हैं।
पात्र व्यक्ति चक्कर लगाता है, जबकि अपात्र लाभ ले जाता है।
”बाढ़ प्रभावित जिलों पर विशेष टिप्पणी
उन्होंने खास तौर पर दरभंगा और मधुबनी जैसे बाढ़ प्रभावित जिलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां हर साल राहत, पुनर्वास और विकास योजनाओं के नाम पर बड़ी राशि आती है। यदि इन जिलों में स्वतंत्र एजेंसी से जांच हो जाए तो प्रशासनिक लापरवाही और वित्तीय अनियमितताओं की कई परतें खुल सकती हैं।“जहां जनता हर साल बाढ़ से जूझती है, वहां योजनाओं का पैसा यदि सही जगह लगे तो तस्वीर बदल सकती है। लेकिन जब धन बीच रास्ते में रुक जाए तो जनता तक केवल घोषणाएं पहुंचती हैं, समाधान नहीं।”
राजनीतिक विश्लेषकों की राय: “योजना बनाम ज़मीन की सच्चाई
”राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में योजनाओं की घोषणा और धरातल पर परिणाम के बीच बड़ा अंतर है।एक विश्लेषक ने कहा:“जब निगरानी कमजोर होती है और जवाबदेही तय नहीं होती, तब सरकारी योजना गरीब के अधिकार से हटकर नेटवर्क की कमाई का जरिया बन जाती है।”
कानूनविदों की राय:- सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, संपत्ति जांच भी हो
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दस्तावेजों का दुरुपयोग कर फर्जी ऋण निकाले गए हैं, तो यह साधारण धोखाधड़ी नहीं बल्कि आपराधिक षड्यंत्र, जालसाजी और भ्रष्टाचार का गंभीर मामला है।उन्होंने कहा कि इस मामले में शामिल लोगों की चल-अचल संपत्ति, बैंक खातों और पिछले कार्यकाल की भी जांच होनी चाहिए।
विपक्ष का हमला: “जनता का पैसा, तंत्र की कमाई
”विपक्षी दलों ने इस मामले को राज्य सरकार की विफलता बताया है। उनका कहना है कि यदि गरीबों के नाम पर पैसा निकाला जा रहा है, तो यह प्रशासनिक नियंत्रण की असफलता है। विपक्ष ने मांग की है कि राज्यभर में ऐसी योजनाओं का विशेष ऑडिट कराया जाए।
समाजसेवियों की चेतावनी: “गरीब अब कागज पर जिंदा है”
स्थानीय समाजसेवियों ने कहा कि आज सबसे बड़ा संकट यह है कि गरीब आदमी वास्तविक जीवन में संघर्ष कर रहा है, लेकिन सरकारी कागजों में उसके नाम पर योजनाएं चल रही हैं।
एक समाजसेवी ने कहा:“कई गरीबों को पता ही नहीं चलता कि उनके नाम पर क्या-क्या हो गया। जब नोटिस आता है या वसूली शुरू होती है, तब सच सामने आता है।
”जनता के सामने खड़े बड़े सवाल
क्या यह सिर्फ एक शाखा का मामला है या राज्यव्यापी नेटवर्क?
लाभार्थी सत्यापन की व्यवस्था क्यों विफल हुई?
सरकारी अनुदान राशि किस आधार पर जारी हुई?
क्या अन्य जिलों में भी ऐसे मामले दबे पड़े हैं?
क्या निष्पक्ष एजेंसी से जांच होगी?
निष्कर्ष
दरभंगा का यह मामला केवल दो करोड़ रुपये का घोटाला नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां गरीब के नाम पर योजनाएं बनती हैं, लेकिन लाभ बीच रास्ते में खो जाता है।यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता चाहती है तो उसे इस मामले को उदाहरण बनाकर राज्यव्यापी जांच, डिजिटल सत्यापन, सामाजिक ऑडिट और दोषियों पर कठोर कार्रवाई करनी होगी।
वरना जनता का विश्वास टूटता जाएगा और योजनाएं सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रह जाएंगी।
