बुर्के में कांवड़: आस्था, पहचान और राजनीति के चौराहे पर तमन्ना मलिक की यात्रा

बी के झा

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नई दिल्ली/संभल/हरिद्वार, 14 फरवरी

उत्तर प्रदेश के संभल जिले की तमन्ना मलिक इन दिनों राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं। बुर्का पहनकर हरिद्वार से कांवड़ लाने का उनका वीडियो वायरल हुआ तो सवाल भी उठे और समर्थन भी मिला। ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों के बीच तमन्ना ने कहा—“भगवान से मांगी मन्नत पूरी हुई, इसलिए संकल्प निभाने निकली हूं।” उनका कहना है कि अमन त्यागी से विवाह की मन्नत पूरी होने के बाद उन्होंने कांवड़ लाने का प्रण लिया और अब महाशिवरात्रि पर संभल के छैमनाथ तीर्थ में जलाभिषेक करेंगी। पूरी यात्रा में पति अमन उनके साथ हैं।

संभल में प्रवेश करते ही माहौल असाधारण रहा—सेल्फी, पुष्पवर्षा, सुरक्षा घेरा और ‘सेलिब्रिटी’ जैसा स्वागत। पुलिस व पीएसी की निगरानी में यात्रा आगे बढ़ी। सीओ कुलदीप सिंह के मुताबिक, “महाशिवरात्रि पर सभी शिवभक्त अपने गंतव्य की ओर जा रहे हैं, तमन्ना की सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं।”

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर: प्रतीक और संदेश

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना केवल व्यक्तिगत आस्था की कहानी नहीं, बल्कि पहचान-राजनीति के संवेदनशील दौर में एक शक्तिशाली प्रतीक भी है।कुछ विश्लेषक इसे ‘निजी स्वतंत्रता बनाम सामुदायिक अपेक्षाओं’ के रूप में देखते हैं—जहां व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान के साथ दूसरे धर्म की आस्था-परंपरा में भागीदारी कर रहा है।वहीं अन्य इसे ध्रुवीकरण की पृष्ठभूमि में उभरती ‘नैरेटिव पॉलिटिक्स’ बताते हैं, जहां सोशल मीडिया के जरिए घटनाएं तुरंत वैचारिक खेमों में बांट दी जाती हैं।एक वरिष्ठ शिक्षाविद का कहना है, “भारतीय समाज की बहुलतावादी परंपरा में ऐसे प्रसंग असामान्य नहीं हैं; फर्क इतना है कि आज कैमरे हर क्षण को ‘राष्ट्रीय विमर्श’ बना देते हैं।”

कानूनविदों की राय: संविधान की चौखट में आस्था

कानून विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है—बशर्ते सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य प्रभावित न हों।एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है, “यदि कोई वयस्क महिला स्वेच्छा से कांवड़ यात्रा करती है, तो यह उसकी मौलिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। राज्य का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

”हिन्दू संगठनों व धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया

कुछ हिन्दू संगठनों ने तमन्ना के कदम को ‘सनातन की समावेशी परंपरा’ का उदाहरण बताया। एक प्रमुख संत ने कहा, “भगवान शिव ‘आशुतोष’ हैं—वे भेद नहीं करते। आस्था का मार्ग सबके लिए खुला है।”हालांकि, कुछ कट्टर स्वर यह भी कहते दिखे कि धार्मिक अनुष्ठान परंपरागत मर्यादाओं में ही हों। मगर मुख्यधारा के संतों ने संयमित भाषा में स्वागत और शांति की अपील की।

इस्लामी स्कॉलर व मौलाना की राय

स्थानीय इस्लामी विद्वानों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही। एक मौलाना ने कहा, “इस्लाम में धार्मिक पहचान और आचरण स्पष्ट हैं; समुदाय को शांति और सद्भाव बनाए रखना चाहिए।”दूसरे इस्लामी स्कॉलर ने जोड़ा, “किसी भी निर्णय को व्यक्तिगत स्तर पर देखना चाहिए, उसे सामुदायिक टकराव का कारण नहीं बनाना चाहिए।” उन्होंने युवाओं से उकसावे से दूर रहने की अपील की।

विपक्षी दलों का रुख

विपक्षी दलों के नेताओं ने घटना को ‘सामाजिक ताने-बाने की परीक्षा’ बताया। कुछ ने आरोप लगाया कि ऐसे प्रसंगों को राजनीतिक लाभ के लिए उछाला जाता है, जबकि अन्य ने कहा कि “यदि प्रशासन निष्पक्ष है और कानून-व्यवस्था दुरुस्त है, तो इसे व्यक्तिगत आस्था का मामला मानकर आगे बढ़ना चाहिए।”

स्थानीय प्रशासन: सुरक्षा सर्वोपरि

संभल में 85% मुस्लिम आबादी होने और पूर्व में मिले विरोध/धमकियों की पृष्ठभूमि में प्रशासन ने अतिरिक्त सतर्कता बरती है। पुलिस के अनुसार, यात्रा मार्ग पर पर्याप्त बल तैनात है, ट्रैफिक डायवर्जन लागू है और किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए निगरानी बढ़ाई गई है।सीओ कुलदीप सिंह ने कहा, “हर कांवड़िये की तरह तमन्ना की सुरक्षा भी हमारी जिम्मेदारी है। कानून-व्यवस्था से समझौता नहीं होगा।”

सामाजिक परिप्रेक्ष्य: भीड़, कैमरा और कथाएंतमन्ना के संभल पहुंचते ही महिलाओं द्वारा पैर छूना, भेंट देना, और मुस्लिम युवकों का साथ फोटो खिंचवाना—ये दृश्य भारतीय समाज की जटिलता को एक फ्रेम में समेट देते हैं। यह घटना बताती है कि आस्था की यात्राएं कभी-कभी सामाजिक संवाद का माध्यम भी बन जाती हैं—जहां समर्थन, असहमति, जिज्ञासा और राजनीति सब साथ चलते हैं।

निष्कर्ष:

आस्था की राह, संवैधानिक मर्यादा

तमन्ना मलिक की कांवड़ यात्रा आस्था, पहचान, सुरक्षा और राजनीति के बीच संतुलन का उदाहरण बन गई है। एक ओर यह व्यक्तिगत संकल्प की कहानी है; दूसरी ओर यह याद दिलाती है कि भारत जैसे बहुधर्मी समाज में संविधान की छत्रछाया और प्रशासन की निष्पक्षता ही सामाजिक शांति की आधारशिला हैं।महाशिवरात्रि पर छैमनाथ मंदिर में होने वाला जलाभिषेक केवल एक अनुष्ठान नहीं रहेगा—

यह उस बहस का प्रतीक होगा जो आज के भारत में व्यक्ति की स्वतंत्रता, समुदाय की भावना और राज्य की जिम्मेदारी के बीच निरंतर चल रही है।

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