ब्राह्मणों की नाराज़गी या सामाजिक मंथन? भाजपा के 52 विधायकों के सहभोज के मायने, सियासत से समाज तक

बी के झा

NSK

लखनऊ, 24 दिसंबर

उत्तर प्रदेश विधानसभा सत्र के दौरान भाजपा के 52 ब्राह्मण विधायकों का एक साथ जुटना और उसके बाद हुआ सहभोज—सिर्फ एक सामाजिक मुलाकात थी या सत्ता के भीतर उभरते असंतोष का संकेत? यही सवाल इन दिनों लखनऊ से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है। सत्ता पक्ष इसे सामान्य सामाजिक संवाद बता रहा है, जबकि विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ तलाश रहे हैं।

“नाराज़गी नहीं, संवाद था”—आयोजक विधायकों की सफाई सहभोज के आयोजक भाजपा विधायक पीएन पाठक ने साफ कहा—“इस बैठक का कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं था। न कोई मांगपत्र, न कोई दबाव। मीडिया में यह चलाया जा रहा है कि ब्राह्मण नाराज़ हैं, जबकि सच्चाई यह है कि समाज के विकास और कल्याण पर चर्चा हुई।”बैठक में शामिल रत्नाकर मिश्रा ने भी यही दोहराया—“

ठाकुर, कुर्मी विधायकों की बैठकें पहले भी हुई हैं। यदि ब्राह्मण विधायक समाज से जुड़े मुद्दों पर बात करते हैं, तो इसमें असामान्य क्या है?”उनके अनुसार, बैठक में परिवार टूटने, बुजुर्गों की उपेक्षा, पश्चिमी प्रभाव और सामाजिक एकजुटता जैसे विषयों पर गहन विमर्श हुआ।लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते…

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजनीति में संयोग नहीं, संकेत होते हैं।विशेषज्ञ कहते हैं—“

अगर सब कुछ सामान्य है, तो एक ही समुदाय के 52 विधायकों का एक साथ जुटना सिर्फ ‘संयोग’ नहीं कहा जा सकता।”खासकर तब, जब—2027 के विधानसभा चुनाव दूर नहीं संगठन और सरकार में सामाजिक संतुलन पर अंदरूनी चर्चा चल रही है

ब्राह्मण नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष की फुसफुसाहट पहले से मौजूद है भाजपा नेतृत्व की प्रतिक्रिया: ‘इसे जाति के चश्मे से न देखें’भाजपा नेतृत्व की ओर से संदेश स्पष्ट है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है—“

विधायक मिलते हैं, बात करते हैं, इसमें कुछ भी असामान्य नहीं। इसे जातिगत चश्मे से देखना गलत है।”एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—“ब्राह्मण समाज भाजपा की रीढ़ रहा है। किसी भी तरह की उपेक्षा का सवाल ही नहीं उठता।”

विपक्ष का हमला: ‘उपेक्षा का नतीजा है यह जुटान’विपक्ष ने इस सहभोज को सत्ता के भीतर असंतोष का संकेत बताया है।सपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा—“अगर सब कुछ ठीक है, तो बार-बार अलग-अलग वर्गों की बैठकें क्यों हो रही हैं?

यह साफ दिखाता है कि विधायक खुद को अनसुना महसूस कर रहे हैं।”कांग्रेस नेताओं ने भी इसे भाजपा की “सामाजिक इंजीनियरिंग में दरार” करार दिया।ब्राह्मण समाज के बुद्धिजीवी क्या कहते हैं वरिष्ठ ब्राह्मण समाज के बुद्धिजीवियों का नजरिया अपेक्षाकृत संतुलित है।एक प्रसिद्ध शिक्षाविद का कहना है—

“ब्राह्मण समाज सत्ता से नहीं, सम्मान और सहभागिता से जुड़ा रहता है। यदि विधायकों को लगता है कि समाज के सांस्कृतिक प्रश्न पीछे छूट रहे हैं, तो चर्चा स्वाभाविक है।”एक अन्य वरिष्ठ चिंतक कहते हैं—

“यह नाराज़गी नहीं, चेतावनी है—कि समाज को केवल चुनावी गणित तक सीमित न किया जाए।

”धर्म गुरु और हिन्दू संगठनों की राय कुछ हिन्दू संगठनों और धर्म गुरुओं ने बैठक को सकारात्मक सामाजिक पहल बताया।एक वरिष्ठ धर्माचार्य ने कहा—“आज परिवार टूट रहे हैं, बुजुर्ग अकेले हैं। यदि जनप्रतिनिधि इन विषयों पर चिंतन करें, तो यह स्वागत योग्य है। इसे राजनीति से जोड़ना ठीक नहीं।

”कानूनविदों का दृष्टिकोण कानूनविदों के अनुसार—“संविधान किसी भी नागरिक या जनप्रतिनिधि को सामाजिक विषयों पर बैठक करने से नहीं रोकता। सवाल तब उठता है, जब यह सत्ता पर दबाव का माध्यम बने।”

निष्कर्ष:

सामाजिक संवाद या राजनीतिक संकेत?भाजपा के ब्राह्मण विधायकों का यह जुटान न खुली नाराज़गी है, न खुला विद्रोह—लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि पार्टी के भीतर सामाजिक पहचान, सम्मान और भूमिका को लेकर मंथन चल रहा है।यह सहभोज शायद—

पार्टी के लिए आंतरिक फीडबैक नेतृत्व के लिए सामाजिक संदेश और विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर तीनों है।साफ है कि इसे सिर्फ “सामान्य मुलाकात” कहकर नजरअंदाज करना भी उतना ही गलत होगा, जितना इसे तुरंत “बगावत” बता देना।

राजनीति में मौन भी कभी-कभी सबसे ऊंची आवाज़ होता है।

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