बी के झा
NSK

नई दिल्ली/पटना , 25 अक्टूबर
त्योहारों का मौसम यानी घर लौटने की उमंग, अपनों से मिलने की खुशी, और मिट्टी की खुशबू में घुला अपनापन। लेकिन इस बार बिहार लौटने की राह यात्रियों के लिए एक कष्ट यात्रा बन चुकी है। दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद और कोलकाता जैसे महानगरों से निकलने वाली ट्रेनों में हालात ऐसे हैं कि दरवाजों और छतों तक लोग लटके हुए हैं। टिकट मिलना मुश्किल ही नहीं, असंभव हो गया है। इसी मुद्दे पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार को तीखे सवालों के घेरे में लिया है।
“त्योहार की नहीं, संघर्ष की यात्रा बन चुकी है बिहार की रेल!”राहुल गांधी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर कुछ वीडियो साझा किए, जिनमें ट्रेनें यात्रियों से ओवरलोड नजर आ रही हैं।
उन्होंने लिखा –त्योहारों का महीना है — दिवाली, भाईदूज, छठ। बिहार में इन त्योहारों का मतलब सिर्फ आस्था नहीं, घर लौटने की लालसा है — मिट्टी की खुशबू, परिवार का स्नेह, गांव का अपनापन। लेकिन यह लालसा अब एक संघर्ष बन चुकी है।उन्होंने कहा कि बिहार जाने वाली ट्रेनें ठसाठस भरी हैं, टिकट मिलना नामुमकिन हो गया है, और कई गाड़ियां अपनी क्षमता से 200% तक यात्रियों से भरी हैं। सफर अब अमानवीय हो चुका है।
“कहां हैं 12,000 स्पेशल ट्रेनें?”कांग्रेस नेता ने केन्द्र सरकार पर हमला बोलते हुए पूछा —रेल मंत्रालय ने दावा किया था कि 1 अक्टूबर से 30 नवंबर तक 12,011 विशेष रेल यात्राएं चलाई जाएंगी।
फिर सवाल उठता है — ये ट्रेनें आखिर गई कहां? क्यों हर साल हालात और बदतर होते जा रहे हैं?”राहुल गांधी ने कहा कि यह सिर्फ रेलवे की नाकामी नहीं है, बल्कि बिहार के मजदूरों, छात्रों और प्रवासी परिवारों के प्रति सरकार की संवेदनहीनता का प्रमाण है।अगर बिहार में रोजगार और सम्मानजनक जीवन होता, तो लोगों को हजारों किलोमीटर दूर भटकना नहीं पड़ता।”उन्होंने मोदी सरकार को “फेल डबल इंजन सरकार” कहते हुए कहा कि यह भीड़ सिर्फ यात्रियों की नहीं, बल्कि राजग की धोखेबाज नीतियों का जीता-जागता सबूत है।
प्रशांत किशोर भी पहले जता चुके थे नाराजगी दिलचस्प बात यह है कि इससे दो दिन पहले जनसुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर ने भी यही मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार सिर्फ कागजी दावे कर रही है कि दिवाली और छठ पूजा को देखते हुए 12 हज़ार विशेष ट्रेनें चलाई गई हैं, लेकिन धरातल पर यह “सफेद झूठ” साबित हो रहा है।किशोर ने कहा था कि बाहर से लौटने वाले प्रवासी मजदूर इस बार नीतीश सरकार के भ्रष्टाचार और केंद्र की नाकामी के खिलाफ वोट करेंगे।सरकार जानती है, अगर सभी बिहारवासी चुनाव के दौरान अपने गांव लौटे तो वोट मोदी के खिलाफ जाएगा — इसलिए कागज पर ट्रेनें दिखा दी गईं, पर असल में बिहार के लोग अब भी प्लेटफॉर्म पर ठिठके खड़े हैं।”
राहुल गांधी का सीधा हमला — “कागजी शेर को भीड़ दिखाई नहीं देती”राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा प्रहार करते हुए कहा —मोदी को डर है कि अगर बिहार के सभी लोग चुनाव के समय घर लौटे, तो उनके खिलाफ वोट करेंगे। इसलिए कागजी शेर को यह भीड़ दिखाई नहीं देती। लेकिन बिहार के लोग साहसी और स्वाभिमानी हैं, वे हर मुश्किल का सामना कर छठ महापर्व मनाने और बिहार की किस्मत बदलने ज़रूर लौटेंगे।”
राजनीतिक विश्लेषकों की चेतावनी
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि त्योहारों के दौरान इस तरह का अव्यवस्थित रेल संचालन और बिहारियों के साथ उपेक्षा भरा व्यवहार, भाजपा गठबंधन के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।मगध और शाहाबाद जैसे क्षेत्रों में पहले से ही महागठबंधन का दबदबा रहा है, और अब भावनात्मक मुद्दे अगर जुड़ गए, तो चुनावी समीकरण और बिगड़ सकते हैं।
“यह हक है, एहसान नहीं”राहुल गांधी ने अपने पोस्ट के अंत में लिखा —सुरक्षित और सम्मानजनक यात्रा कोई एहसान नहीं, यह अधिकार है। भारत के हर नागरिक को अपने घर लौटने का अधिकार सम्मान के साथ मिलना चाहिए।
निष्कर्षतः,
बिहार लौटने की इस जद्दोजहद ने एक बार फिर सिस्टम की सच्चाई को बेनकाब कर दिया है। सरकार कहती है कि हजारों स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं, लेकिन प्लेटफॉर्म पर लोगों की हालत देखकर लगता है कि कागज़ की ट्रेनें जनता की उम्मीदों की तरह फंसी हुई हैं — भीड़ में, बदहवासी में, और अनदेखी में।
