बी के झा
NSK

कोलकाता/ न ई दिल्ली, 6 मई
कोलकाता की सियासत में इन दिनों भावनाओं, आरोपों और रणनीति का अनोखा संगम दिख रहा है। चुनावी हार के बाद भी ममता बनर्जी ने जिस तेवर के साथ मैदान संभाला है, उसने साफ कर दिया है कि यह लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि नैरेटिव और नैतिकता की भी है।
हार के बाद हुंकार: इस्तीफे से इनकार
टीएमसी विधायकों की बैठक में ममता बनर्जी का बयान—“मैं इस्तीफा नहीं दूंगी, वे मुझे बर्खास्त कर दें”—राजनीतिक परंपराओं को चुनौती देने जैसा है। आम तौर पर चुनावी हार के बाद इस्तीफा एक स्थापित परिपाटी रही है, लेकिन ममता ने इसे “राजनीतिक संघर्ष” का रूप दे दिया है।उनका आरोप है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं था—पुलिस, अर्धसैनिक बल और चुनाव आयोग तक पर सवाल उठाते हुए उन्होंने इसे “अत्याचार” करार दिया। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय अदालत जाने की बात भी कही गई—जो भारतीय संघीय ढांचे के संदर्भ में एक असामान्य और विवादास्पद संकेत है।
संवैधानिक नजरिया: क्या संभव है ‘बर्खास्तगी’?
कानूनविदों के अनुसार, भारतीय संविधान में मुख्यमंत्री को “बर्खास्त” करने का प्रावधान सीधे तौर पर नहीं है।अगर कोई सरकार बहुमत खो देती है, तो उसे इस्तीफा देना होता है राज्यपाल वैकल्पिक सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू करते हैं ऐसे में ममता का “मुझे बर्खास्त कर दें” वाला बयान अधिक राजनीतिक है, कानूनी नहीं।
यह समर्थकों को एकजुट करने और विपक्षी राजनीति को धार देने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
टीएमसी के भीतर दरार?
10 विधायक गायब
सबसे चौंकाने वाला पहलू वह बैठक रही, जिसमें 80 में से करीब 10 विधायक अनुपस्थित रहे।यह महज संयोग है या असंतोष का संकेत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हार के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या नेतृत्व में बदलाव की मांग उठेगी?
क्या नए विपक्ष के नेता को लेकर सहमति बन पाएगी?
ये सवाल अब टीएमसी के सामने खड़े हैं।
विपक्षी राजनीति: ममता की नई भूमिका
ममता बनर्जी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अब उनकी राजनीति बंगाल से आगे बढ़ेगी।INDIA गठबंधन को मजबूत करने की बात करते हुए उन्होंने खुद को राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय करने का ऐलान किया है।यह वही ममता हैं, जिन्होंने पहले “एकला चलो” का रास्ता अपनाया था। अब उनका यह बदलाव बताता है कि भाजपा के खिलाफ व्यापक एकजुटता की जरूरत को वे भी स्वीकार कर रही हैं।
विपक्ष और शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया
एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने तीखा तंज कसते हुए कहा,“लोकतंत्र में हार को स्वीकार करना ही सबसे बड़ी नैतिक जीत होती है। अगर हर हार को साजिश बताया जाएगा, तो संस्थाओं पर विश्वास कमजोर होगा।”
वहीं विपक्षी दलों का रुख भी मिश्रित है—कुछ नेता ममता के संघर्ष को “लोकतांत्रिक अधिकार” बता रहे हैं तो कुछ इसे “हार से बचने की राजनीतिक रणनीति” मानते हैं
भाजपा का नजरिया: आक्रामक बनाम रक्षात्मक
भाजपा के लिए यह स्थिति राजनीतिक अवसर भी है और चुनौती भी।अगर ममता का आक्रामक अभियान राष्ट्रीय स्तर पर गति पकड़ता है, तो यह भाजपा के खिलाफ एक बड़ा नैरेटिव तैयार कर सकता है।लेकिन अगर टीएमसी के भीतर ही असंतोष बढ़ता है, तो भाजपा इसे “नेतृत्व संकट” के रूप में पेश करेगी।
निष्कर्ष:
संघर्ष का नया अध्याय
ममता बनर्जी का यह रुख साफ करता है कि उनकी राजनीति अब “सत्ता” से आगे बढ़कर “संघर्ष” की राजनीति बन चुकी है।लेकिन असली परीक्षा दो मोर्चों पर होगी:
पार्टी के भीतर एकता बनाए रखना राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय विपक्षी चेहरा बनना
अंततः सवाल यही है:
क्या ममता बनर्जी इस संघर्ष को एक व्यापक विपक्षी आंदोलन में बदल पाएंगी,
या फिर यह तेवर केवल बंगाल की सीमाओं तक सिमट कर रह जाएगा?**
