बी के झा
NSK

पटना ( सुपौल ) 7 मई
बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के दावों के बीच सुपौल के जिला अवर निबंधक अमरेंद्र कुमार पर हुई आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) की छापेमारी ने सरकारी तंत्र की सड़ चुकी व्यवस्था को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है। जिस अधिकारी का काम जमीन रजिस्ट्री और सरकारी दस्तावेजों को वैधानिक रूप देना था, उसी पर आरोप है कि उसने सरकारी कुर्सी को “कमाई का साम्राज्य” बना दिया।
पटना, सुपौल और सारण समेत पांच ठिकानों पर हुई छापेमारी में 10 करोड़ रुपये से अधिक की चल-अचल संपत्ति, महंगी गाड़ियां, सोने के बिस्किट, करोड़ों की जमीन और आलीशान फ्लैट का खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह संपत्ति उनकी घोषित आय से कहीं अधिक है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कथित काली कमाई को छिपाने के लिए पत्नी, सास, बच्चों और यहां तक कि ड्राइवर के नाम का भी इस्तेमाल किया गया।
“सरकारी बाबू या करोड़ों का कारोबारी?
”ईओयू की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि अमरेंद्र कुमार ने पश्चिम बंगाल के Siliguri में अपनी गृहिणी पत्नी नीता कुमारी के नाम पर करीब 25 कट्ठा जमीन खरीदी। कागजों में इसकी कीमत चार करोड़ रुपये दिखाई गई, जबकि बाजार मूल्य छह करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है। जांच एजेंसियों का दावा है कि इस जमीन की घेराबंदी पर ही लगभग एक करोड़ रुपये खर्च किए गए।इसके अलावा Patna के आशियाना-दीघा रोड स्थित एक प्रीमियम अपार्टमेंट में 65 लाख रुपये का फ्लैट खरीदा गया, जिसकी साज-सज्जा पर करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
सवाल यह उठ रहा है कि एक सरकारी अधिकारी की वैध आय आखिर इतनी ऐश्वर्यपूर्ण जीवनशैली की अनुमति कैसे देती है?
ड्राइवर के नाम पर स्कॉर्पियो, घर में सोने के बिस्किटईओयू की जांच में यह भी सामने आया है कि दो महंगी स्कॉर्पियो गाड़ियां कथित रूप से ड्राइवर के नाम पर खरीदी गईं।
सूत्रों का कहना है कि यह काली कमाई को सफेद दिखाने का एक तरीका हो सकता है। जांच एजेंसियां अब ड्राइवर से भी पूछताछ की तैयारी में हैं।छापेमारी के दौरान दो गोल्ड बिस्किट, भारी मात्रा में सोने-चांदी के गहने और निवेश से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए हैं। म्यूचुअल फंड, बीमा पॉलिसी और पीपीएफ खातों में लाखों रुपये जमा पाए गए हैं।
अधिकारियों के अनुसार यह केवल “दिखाई देने वाली संपत्ति” है; वास्तविक नेटवर्क और बड़ा हो सकता है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
इस कार्रवाई के बाद बिहार की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे “व्यवस्थित भ्रष्टाचार” का उदाहरण बताते हुए सरकार पर हमला बोला है।Rashtriya Janata Dal नेताओं ने कहा कि—“
बिहार में बिना राजनीतिक संरक्षण के कोई अधिकारी इतने बड़े स्तर पर संपत्ति नहीं बना सकता। यह अकेले एक अफसर का मामला नहीं, बल्कि पूरे भ्रष्ट तंत्र की कहानी है।”कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य में भ्रष्टाचार “संगठित उद्योग” का रूप ले चुका है, जहां सरकारी पदों का इस्तेमाल जनता की सेवा नहीं बल्कि निजी संपत्ति खड़ी करने के लिए हो रहा है।
वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि यही प्रमाण है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति पर काम कर रही है और किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
कानूनविदों ने उठाए गंभीर प्रश्न
वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में आय से अधिक संपत्ति साबित होती है, तो आरोपी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कठोर कार्रवाई हो सकती है। साथ ही बेनामी संपत्ति, टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की भी जांच संभव है।
पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता अजय कुमार झा कहते हैं—“जब सरकारी अधिकारी रिश्तेदारों और कर्मचारियों के नाम पर संपत्ति खरीदने लगें, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि संगठित आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में संपत्ति जब्ती की कार्रवाई भी जरूरी है।”
शिक्षाविदों की चिंता—
“युवाओं को क्या संदेश?”शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों का कहना है कि ऐसे मामले समाज में बेहद खतरनाक संदेश देते हैं। जब ईमानदार नौकरी से ज्यादा भ्रष्टाचार को “सफलता” का रास्ता माना जाने लगे, तो युवाओं का नैतिक विश्वास टूटता है।पटना विश्वविद्यालय के
समाजशास्त्री प्रो. अरुणेश पाठक कहते हैं—
“आज का युवा मेहनत और योग्यता से नौकरी पाता है, लेकिन जब वह देखता है कि कुछ अधिकारी कुछ वर्षों में करोड़पति बन जाते हैं, तो व्यवस्था पर उसका भरोसा कमजोर होता है। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
”रजिस्ट्री विभाग पर फिर सवाल
बिहार में रजिस्ट्री विभाग लंबे समय से भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा रहा है। जमीन खरीद-बिक्री, दाखिल-खारिज और दस्तावेज सत्यापन में रिश्वतखोरी की शिकायतें आम रही हैं। कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब तक रजिस्ट्री प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी नहीं होगी, तब तक ऐसे मामलों पर रोक लगाना मुश्किल होगा।
जनता पूछ रही— “अकेला अमरेंद्र या पूरी चेन?”
इस कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या अमरेंद्र कुमार अकेले इस नेटवर्क का हिस्सा थे या फिर इसके पीछे अधिकारियों, दलालों और राजनीतिक संरक्षण की लंबी श्रृंखला काम कर रही थी?
बिहार की जनता अब केवल गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस पूरे भ्रष्ट तंत्र की सच्चाई जानना चाहती है, जिसने सरकारी दफ्तरों को सेवा केंद्र के बजाय “कमाई के अड्डे” में बदल दिया।
यह मामला केवल एक अधिकारी की अवैध संपत्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां कुर्सी, सत्ता और पैसा मिलकर ईमानदारी का गला घोंटते दिखाई दे रहे हैं।
