बी के झा
NSK



नई दिल्ली/रांची, 7 जुन
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने सत्तारूढ़ महागठबंधन के भीतर दबे असंतोष को सतह पर ला दिया है। कांग्रेस द्वारा अचानक अपने उम्मीदवार की घोषणा किए जाने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने खुलकर नाराजगी जताई है और दोनों सीटों पर अपना दावा ठोक दिया है। इस घटनाक्रम ने न केवल राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि INDIA गठबंधन की एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह विवाद केवल राज्यसभा की दो सीटों का नहीं, बल्कि झारखंड में सत्ता और राजनीतिक वर्चस्व के संतुलन का भी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली JMM यह संदेश देना चाहती है कि गठबंधन सरकार में सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उसकी राजनीतिक हैसियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस की घोषणा और JMM का असंतोष
कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने झारखंड से प्रणव झा को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया। प्रणव झा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के करीबी माने जाते हैं और वर्तमान में उनके कार्यालय में मीडिया एवं संचार की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।लेकिन कांग्रेस की इस घोषणा ने JMM को असहज कर दिया। पार्टी नेताओं का आरोप है कि मुख्यमंत्री और गठबंधन के प्रमुख नेता हेमंत सोरेन से औपचारिक चर्चा किए बिना उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। यही कारण है कि रांची में मुख्यमंत्री आवास पर JMM के मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ नेताओं की आपात बैठक बुलाई गई।
बैठक में अधिकांश नेताओं ने एक स्वर में दोनों राज्यसभा सीटों पर JMM के उम्मीदवार उतारने की मांग की। हालांकि अंतिम निर्णय का अधिकार पार्टी अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सौंप दिया गया।”
गठबंधन धर्म” बना विवाद का केंद्र
JMM नेताओं का कहना है कि उन्होंने लगातार गठबंधन धर्म निभाया है, लेकिन कांग्रेस ने सहयोगी दलों को विश्वास में लिए बिना एकतरफा निर्णय लेकर राजनीतिक मर्यादा का उल्लंघन किया है।पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने तीखे शब्दों में कहा कि उम्मीदवारों की घोषणा गठबंधन के नेता और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को करनी चाहिए थी। उनके अनुसार JMM लगातार गठबंधन धर्म निभा रहा है, जबकि कांग्रेस ने साझी राजनीति की भावना को आघात पहुंचाया है।राजद ने भी अप्रत्यक्ष रूप से JMM के पक्ष में खड़े होते हुए कहा कि राज्य की सबसे बड़ी पार्टी और सरकार का नेतृत्व करने वाली JMM से चर्चा किए बिना उम्मीदवार घोषित करना उचित नहीं था।
विधानसभा का गणित क्या कहता है?
झारखंड विधानसभा में वर्तमान संख्या बल महागठबंधन के पक्ष में मजबूती से खड़ा दिखाई देता है।
JMM – 34 विधायक
कांग्रेस – 16 विधायक
राजद – 4 विधायक
भाकपा (माले) – 2 विधायक
महागठबंधन के कुल विधायक: 56
राज्यसभा चुनाव में एक उम्मीदवार की जीत के लिए 28 प्रथम वरीयता मत आवश्यक हैं। इस प्रकार महागठबंधन के पास दो उम्मीदवारों को आसानी से जिताने के लिए पर्याप्त संख्या मौजूद है।
वहीं विपक्षी NDA के पास कुल 24 विधायक हैं, जो जीत के लिए जरूरी आंकड़े से चार वोट कम हैं।यानी गणित साफ है—यदि महागठबंधन एकजुट रहता है तो दोनों सीटें उसकी झोली में जाएंगी। लेकिन यदि भीतर की खींचतान बढ़ती है और क्रॉस वोटिंग की स्थिति बनती है, तो राजनीतिक समीकरण अप्रत्याशित मोड़ ले सकते हैं।
आखिर JMM क्यों चाहती है दोनों सीटें?
JMM का तर्क केवल संख्या बल तक सीमित नहीं है। पार्टी का मानना है कि झारखंड में उसकी राजनीतिक ताकत और जनाधार के कारण ही गठबंधन सत्ता में है। मुख्यमंत्री पद उसके पास है और विधानसभा में वह सबसे बड़ी पार्टी है।ऐसे में पार्टी नेतृत्व महसूस करता है कि राज्यसभा जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर उसका स्वाभाविक अधिकार बनता है।
JMM नेताओं का कहना है कि पिछले वर्षों में उन्होंने सहयोगी दलों को पर्याप्त राजनीतिक अवसर दिए हैं, इसलिए इस बार दोनों सीटें पार्टी के खाते में जानी चाहिए।
कांग्रेस का पक्ष भी कम मजबूत नहीं
दूसरी ओर कांग्रेस का तर्क है कि गठबंधन की सफलता में उसका भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पार्टी के 16 विधायक हैं और राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका कहीं अधिक व्यापक है।प्रदेश प्रभारी के. राजू का कहना है कि कांग्रेस और गठबंधन के सभी विधायक एकजुट हैं और दोनों सीटों पर गठबंधन उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित है। उन्होंने संकेत दिया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से बातचीत के जरिए समाधान निकाल लिया जाएगा।
क्या INDIA गठबंधन में दरार पड़ने वाली है?
फिलहाल स्थिति इतनी गंभीर नहीं दिखती कि गठबंधन टूटने की नौबत आ जाए। JMM और कांग्रेस दोनों ही भाजपा को राजनीतिक लाभ देने से बचना चाहेंगी। यही कारण है कि सार्वजनिक नाराजगी के बावजूद दोनों दल संवाद के रास्ते खुले रखने की बात कर रहे हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद दरअसल सीट बंटवारे से अधिक राजनीतिक संदेश देने की कवायद है।
JMM अपने सहयोगियों को यह बताना चाहती है कि झारखंड में अंतिम राजनीतिक केंद्र वही है। वहीं कांग्रेस अपने संगठनात्मक प्रभाव और राष्ट्रीय महत्व को कमतर आंकने देने के मूड में नहीं है।
निगाहें हेमंत सोरेन पर पूरा
घटनाक्रम अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अगले कदम पर टिका हुआ है। यदि वे समझौते का रास्ता निकालते हैं तो विवाद शांत हो सकता है। लेकिन यदि JMM दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला करती है, तो यह केवल राज्यसभा चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि महागठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि अंतिम क्षणों में समझौते की संभावना अधिक है। फिर भी इस विवाद ने एक बात साफ कर दी है—
झारखंड में सत्ता साझेदारी के बावजूद सहयोगी दलों के बीच भरोसे की दरारें पूरी तरह भरी नहीं हैं।राज्यसभा की दो सीटों का यह चुनाव अब केवल सांसद चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि झारखंड की गठबंधन राजनीति के भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण राजनीतिक मुकाबला बन चुका है।
