लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ पर ऐतिहासिक चर्चा की तैयारी 150 वर्ष पूर्ण होने पर संसद में गूंजेगा राष्ट्रगीत का आत्मगौरव, प्रधानमंत्री मोदी भी होंगे सहभागी

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 1 दिसंबर देश की संसद इस हफ्ते एक ऐसे ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनने जा रही है, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक माना जाता है—‘वंदे मातरम्’। सूत्रों के मुताबिक लोकसभा में सप्ताह के अंत तक राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर 10 घंटे लंबी विशेष चर्चा आयोजित की जाएगी। इस महत्त्वपूर्ण विमर्श में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी शामिल होने की संभावना है, जिससे इस बहस का महत्व और बढ़ जाता है।यह चर्चा ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित की जा रही है। संसद के शीतकालीन सत्र में इसे राष्ट्रीय गौरव, सांस्कृतिक चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा के रूप में रेखांकित करने की तैयारी है।

क्यों विशेष है यह चर्चा? — 150 वर्ष की राष्ट्रीय चेतना का उत्सव बैंकिंग चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में लिखित वंदे मातरम् ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा और अपार ऊर्जा दी।यह गीत:क्रांतिकारियों की हुंकार बना सभाओं, प्रदर्शनों और आंदोलनों में राष्ट्रीय एकता का स्वर बनाअंग्रेजों के दमनकारी शासन के खिलाफ भारतीयों के मन में हौसला पैदा किया150 वर्ष पूरे होने पर संसद में होने वाला यह विमर्श केवल एक गीत की चर्चा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का राष्ट्रीय समारोह होगा।सर्वदलीय सहमति की कोशिश—क्या हुआ मीटिंग में?30 नवंबर को संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने सभी दलों की बैठक बुलाई थी।लोकसभा और राज्यसभा की बिज़नेस एडवाइजरी कमेटी (BAC) की बैठक में इस प्रस्ताव पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिशें हुईं।

सूत्रों का कहना है कि अधिकांश दल वंदे मातरम् पर चर्चा के प्रति सकारात्मक हैं। हालांकि कुछ दल इसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में सीमित रखने की इच्छा जताते दिखे, ताकि बहस राजनीतिक रंग न ले।संसद में क्या-क्या मुद्दे हो सकते हैं?वंदे मातरम् पर होने वाली इस लंबी चर्चा में निम्न प्रमुख बिंदु उठाए जा सकते हैं:

1. स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिकास्वाधीनता सेनानियों, क्रांतिकारियों और आंदोलनकारी युवाओं के बीच यह गीत ‘प्रेरणा का मंत्र’ था।

2. सांस्कृतिक और सभ्यतागत महत्वयह गीत भारतमाता को श्रद्धांजलि देकर देश की विविधता, कृषि-संपन्नता, प्रकृति-पूजन और मातृभूमि की अवधारणा का उत्सव मनाता है।

3. आधुनिक भारत में वंदे मातरम् का स्थानकैसे आज भी यह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है और युवाओं में देशभक्ति का संचार करता है।4. 150 वर्ष का स्मरण: राष्ट्रीय कार्यक्रम, दस्तावेज़ी करण और सांस्कृतिक पहलें सरकार इस अवसर पर विशेष कार्यक्रमों की घोषणा भी कर सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी—विमर्श को मिलेगा इतिहासिक आयाम संसद में किसी सांस्कृतिक मुद्दे पर होने वाली विस्तृत चर्चा में प्रधानमंत्री की उपस्थिति दुर्लभ मानी जाती है।

यदि पीएम मोदी इस चर्चा में हिस्सा लेते हैं, तो:वे वंदे मातरम् की राष्ट्रीय भावना पर संदेश दे सकते हैंआजादी की 75वीं वर्षगांठ के बाद राष्ट्रीय चेतना की नई परिभाषा पर बात कर सकते हैं150 वर्ष पूर्ण होने पर राष्ट्रीय कार्यक्रमों की रूपरेखा भी साझा कर सकते हैंउनकी मौजूदगी चर्चा को प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक महत्व देगी।वंदे मातरम्—गीत से परे एक राष्ट्रीय पहचान:यह गीत केवल संगीत और शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि:भारतीय सभ्यता का नमन मातृभूमि का गौरवऔर राष्ट्र के प्रति समर्पण की घोषणा रहा है। संसद में होने वाला यह विशेष विमर्श उस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा।

निष्कर्ष:

संसद में गूंजेगी राष्ट्रगीत की आत्मा लोकसभा में होने वाली यह भव्य और विचारपूर्ण चर्चा संभवतः आने वाले वर्षों में संसद के सांस्कृतिक इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक के रूप में दर्ज होगी।150 वर्षों से भारतीय चेतना को दिशा देने वाले इस गीत पर राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श, देश की एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का उत्सव होगा।

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