बी के झा
NSK

नई दिल्ली/पटना, 27 नवंबर
बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक और अप्रत्याशित रूप से विशाल जीत के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार भाजपा के नेताओं को जो सख़्त नसीहत दी है, उसने पटना से लेकर दिल्ली के सत्ता गलियारों तक हलचल मचा दी है। शाह ने साफ कहा—“कोई नेता यह न सोचे कि जीत उसकी वजह से मिली है… ऐसा सोचना घमंड पैदा करता है।’उनका यह कथन सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि सत्ता की सीढ़ियों पर तेजी से चढ़ते कुछ चेहरों के लिए एक कड़ा संकेत माना जा रहा है।
नड्डा आवास की बैठक — और शाह का ‘चेतावनी स्वर’मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार गठन के बाद दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के आवास पर हुई रणनीतिक बैठक में बिहार भाजपा के शीर्ष नेता मौजूद थे। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी, केंद्रीय मंत्रियों से लेकर संगठन महामंत्री तक—सभी उस समय मौजूद थे जब शाह ने तीखे किन्तु संयमित शब्दों में नेताओं को विजय के मद से बचने की सीख दी।
सूत्र बताते हैं कि शाह ने लगभग दृढ़ स्वर में कहा—“चुनाव में एक प्रतिशत योगदान भी अहम होता है। लेकिन यह भ्रम मत पालिए कि जीत सिर्फ आपकी वजह से आई है। यह सामूहिक परिश्रम का फल है, न कि किसी एक का पराक्रम।”
‘जहां कम, वहां हम’ — चुनावी मोर्चों पर नई तैयारी बैठक में शाह ने यह भी संकेत दिया कि अब बिहार के नेताओं को राज्य की सीमाओं से बाहर भी जिम्मेदारियाँ मिल सकती हैं।उन्होंने कहा—“जहां संगठन कमजोर है, वहां जाकर ताकत देना ही हमारा कर्तव्य है।”यह स्पष्ट करता है कि भाजपा अब बिहार कैडर को पूर्वी भारत के अन्य राज्यों—खासकर पश्चिम बंगाल—में भी इस्तेमाल करने की तैयारी में है।
बिहार में BJP का अभूतपूर्व प्रदर्शन
भाजपा ने 101 सीटों पर लड़कर 89 सीट जीतीं—यह उसका अब तक का सर्वोच्च प्रदर्शन है।जेडीयू ने 85 सीटें जीतीं।कुल मिलाकर एनडीए ने 202 सीटें लेकर दो-तिहाई बहुमत से भी आगे निकलने का रिकॉर्ड बनाया।
उधर महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया।आरजेडी 25 सीटों के साथ किसी तरह नेता प्रतिपक्ष का दर्जा बचा सकी।किस नेता पर निशाना?—
बिहार में चल रही फुसफुसाहट
अमित शाह के इस कथन ने सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है:अंततः शाह का इशारा किस नेता की तरफ था?राजनीतिक हलकों में चार तरह की चर्चाएँ तैर रही हैं—
1. क्या शाह का निशाना उन नेताओं पर था जो जीत का श्रेय अपने सोशल मीडिया अभियानों या जातीय प्रभाव को दिखाकर ले रहे हैं?
2. क्या यह संदेश सम्राट चौधरी की तेज होती राजनीतिक हैसियत को संतुलित करने का प्रयास है?
3. या यह गठबंधन के भीतर चल रहे सूक्ष्म तनावों पर एक कूटनीतिक प्रहार?
4. या फिर नीतीश कुमार—जो अपनी ‘राजनीतिक जिजीविषा’ और बार-बार पाला बदलने के इतिहास के लिए प्रसिद्ध हैं?
विश्लेषक बोले—“बयान सिर्फ नसीहत नहीं, अंदरूनी हलचल का संकेत”एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने शाह के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा—“यह सिर्फ मर्यादा की सीख नहीं है, बल्कि ये संकेत है कि बिहार एनडीए में सबकुछ उतना सुगम नहीं जितना बाहर दिखाया जा रहा है। खासकर तब से, जब गृहमंत्रालय जैसा मुख्य विभाग भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सम्राट चौधरी को सौंप दिया—जिससे गठबंधन के भीतर नए समीकरण बनते दिख रहे हैं।
”विश्लेषक का यह भी कहना था—“बीजेपी के बढ़े कद, सम्राट चौधरी की बढ़ती ताकत और नीतीश कुमार की पुरानी राजनीतिक आदतों को देखते हुए गृहमंत्री का यह बयान समयोचित भी है और रणनीतिक भी।”राजनीतिक तापमान—बढ़ता ही जाएगादिल्ली की बैठक और शाह के तीखे शब्दों ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि—
बिहार भाजपा में ‘विजय’ के साथ अब ‘अनुशासन’ का एजेंडा भी प्रमुख होगा।
गठबंधन में सूक्ष्म खटपट है, जिसे भाजपा समय रहते साधना चाहती है।
और आने वाले महीनों में बिहार के नेता राज्य से बाहर भी पार्टी के बड़े अभियानों का हिस्सा बनेंगे।राजनीति अब शांत नहीं रहने वाली—बिहार से उठी हल्की कंपन दिल्ली तक महसूस हो चुकी है।
