शुभेंदु के ‘राजतिलक’ से पहले सियासी संग्राम तेज, AIMIM बोली- बंगाल में संविधान चले, बुलडोजर राज नहीं”

बी के झा

NSK

कोलकाता, 9 मई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के साथ ही अब वैचारिक टकराव और सियासी बयानबाजी का दौर भी तेज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद आज सुबह 10 बजे Suvendu Adhikari मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं, लेकिन उनके “राजतिलक” से पहले ही All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) ने बड़ा और तीखा बयान देकर बंगाल की नई राजनीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

AIMIM के उत्तर प्रदेश प्रवक्ता शादाब चौहान ने शुभेंदु अधिकारी को भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जनता के जनादेश का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन भाजपा ने ऐसे नेता को चुना है, जिनके कई बयान संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े करते रहे हैं।

शादाब चौहान ने कहा, “यह लोकतंत्र की विडंबना है कि जिस व्यक्ति पर एक धर्म विशेष की राजनीति करने और समाज को विभाजित करने के आरोप लगते रहे हों, वही अब बंगाल का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। भाजपा में और भी कई वरिष्ठ नेता थे, जिन्हें चुना जा सकता था।

”उन्होंने उम्मीद जताई कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद शुभेंदु अधिकारी संविधान की मर्यादा का पालन करेंगे और किसी भी भारतीय नागरिक को संदेह की नजर से देखने की राजनीति से बचेंगे।

AIMIM प्रवक्ता ने कहा कि बंगाल में कानून का शासन कायम रहना चाहिए, अदालतों को स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाना चाहिए और राज्य में “बुलडोजर राजनीति” जैसी स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए।दरअसल, AIMIM की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब पश्चिम बंगाल में भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है और पूरे देश की नजरें कोलकाता के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह पर टिकी हुई हैं।

भाजपा इस समारोह को केवल सरकार गठन नहीं, बल्कि “वैचारिक विजय” के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है।सूत्रों के अनुसार, शपथ ग्रहण समारोह को बेहद भव्य बनाया गया है।

प्रधानमंत्री Narendra Modi, केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah सहित भाजपा और एनडीए शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्री तथा वरिष्ठ नेता इस ऐतिहासिक मौके के साक्षी बनने कोलकाता पहुंच रहे हैं।

शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा भी कम नाटकीय नहीं रही है। कभी तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के मजबूत स्तंभ रहे शुभेंदु ने विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा का दामन थामा और फिर बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी लड़ाई में Mamata Banerjee को भवानीपुर सीट पर हराकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं। चुनाव परिणाम आने के बाद उनके कुछ बयानों ने राजनीतिक विवाद भी खड़ा किया था।

उन्होंने कहा था कि उन्हें “सभी हिंदुओं का वोट” मिला, जबकि ममता बनर्जी को मुस्लिम वोटों का समर्थन प्राप्त हुआ। विपक्षी दलों ने इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति करार दिया था।

अब मुख्यमंत्री बनने जा रहे शुभेंदु अधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रशासन चलाने की नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण और वैचारिक संघर्ष के बीच बंगाल की सामाजिक समरसता बनाए रखने की भी होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में भाजपा की जीत ने राज्य की दशकों पुरानी राजनीतिक धारा को बदल दिया है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या नई सरकार “राष्ट्रवाद और हिंदुत्व” की आक्रामक राजनीति को प्रशासनिक नीति में बदलेगी या फिर विकास और सुशासन को प्राथमिकता देगी।

AIMIM के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है। विपक्षी दलों का एक वर्ग आशंका जता रहा है कि उत्तर प्रदेश की तरह बंगाल में भी सख्त प्रशासनिक मॉडल लागू किया जा सकता है, जबकि भाजपा इसे कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता बता रही है।

फिलहाल, बंगाल की राजनीति एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ी है। परेड ग्राउंड में होने वाला शपथ ग्रहण केवल सत्ता हस्तांतरण का समारोह नहीं, बल्कि उस वैचारिक संघर्ष की नई शुरुआत माना जा रहा है,

जिसकी गूंज आने वाले वर्षों तक राष्ट्रीय राजनीति में सुनाई दे सकती है।

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