समुद्री सुरक्षा से वैश्विक भरोसे तक: G7 में प्रधानमंत्री मोदी का संदेश और बदलती विश्व व्यवस्था

बी के झा

NSK

एवियन (फ्रांस) / नई दिल्ली, 17 जुन

फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दृढ़ता के साथ समुद्री सुरक्षा, वैश्विक भरोसे और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का मुद्दा उठाया, वह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं था, बल्कि तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था के बीच भारत की रणनीतिक सोच का स्पष्ट संकेत भी था।ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य वैश्विक नेताओं की मौजूदगी में कहा कि “समुद्री रास्ते सुरक्षित रहने चाहिए और नाविकों को भयमुक्त होकर अपना दायित्व निभाने का अवसर मिलना चाहिए।” यह संदेश ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर बढ़ते खतरे पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।

समुद्र में संकट, दुनिया पर असर

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यदि यहां अस्थिरता बढ़ती है तो इसका सीधा असर ईंधन की कीमतों, व्यापार, मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक विकास पर पड़ता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इसी संदर्भ में कहा कि समुद्री व्यापार में व्यवधान केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए चुनौती है। भारत, जिसकी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है, स्वाभाविक रूप से इस मुद्दे को लेकर संवेदनशील है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: भारत की बदली हुई कूटनीति

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह वक्तव्य भारत की “निष्क्रिय प्रतिक्रिया” वाली पुरानी विदेश नीति से अलग दिखाई देता है।राजनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत अब केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह वैश्विक एजेंडा तय करने की क्षमता विकसित कर रहा है।

जी-7 जैसे मंच पर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और समुद्री स्थिरता का मुद्दा उठाना इसी आत्मविश्वास का प्रतीक है।हालांकि विपक्षी दलों का एक वर्ग यह सवाल भी उठा रहा है कि यदि भारतीय नाविकों की मौत हुई है तो सरकार को इस घटना के लिए जिम्मेदार पक्ष से और अधिक स्पष्ट एवं कठोर जवाब मांगना चाहिए था।

विपक्ष की संभावित प्रतिक्रिया

विपक्षी नेताओं का मानना है कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उनका तर्क है कि सरकार को केवल वैश्विक मंचों पर चिंता व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए ठोस कूटनीतिक प्रयास भी करने चाहिए।कुछ विपक्षी दल यह भी पूछ सकते हैं कि यदि समुद्री सुरक्षा भारत के लिए इतनी महत्वपूर्ण है तो हिंद महासागर क्षेत्र में बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करने के लिए सरकार कौन से नए कदम उठाने जा रही है।

कानूनविदों का दृष्टिकोण

अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों के अनुसार, समुद्री मार्गों की सुरक्षा केवल राजनीतिक दायित्व नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था का भी हिस्सा है।संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के तहत समुद्री आवागमन की स्वतंत्रता और नागरिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी देशों की सामूहिक जिम्मेदारी मानी जाती है। यदि किसी सैन्य कार्रवाई में नागरिकों की मृत्यु होती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप मानी जाती है।

कानूनविदों का कहना है कि भारत को इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्यापक सहमति विकसित करने की दिशा में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए।

रक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।उनके अनुसार भारत को निम्नलिखित कदमों पर गंभीरता से विचार करना होगा—भारतीय व्यापारी जहाजों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना,संकटग्रस्त समुद्री क्षेत्रों में नौसैनिक निगरानी बढ़ाना,मित्र देशों के साथ समुद्री खुफिया साझेदारी का विस्तार करना,और भारतीय नाविकों के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल विकसित करना।

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि “ब्लू इकॉनमी” के इस दौर में समुद्री सुरक्षा सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ चुकी है।’

भरोसा ही सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति’

प्रधानमंत्री मोदी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही था कि आज की दुनिया में सबसे बड़ी रणनीतिक पूंजी न तो प्राकृतिक संसाधन हैं, न तकनीक और न ही बाजार, बल्कि ‘भरोसा’ है।उन्होंने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और साइबर सुरक्षा जैसी चुनौतियां किसी एक देश की सीमाओं के भीतर हल नहीं हो सकतीं। ऐसे समय में सहयोग और साझेदारी अनिवार्य हो जाती है।दरअसल, यह बयान उस वैश्विक माहौल में दिया गया है जहां महाशक्तियों के बीच अविश्वास लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में भारत स्वयं को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है जो संवाद, संतुलन और बहुपक्षीय सहयोग का पक्षधर है।

ग्लोबल साउथ की आवाज

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को भी प्रमुखता से रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकासशील देश अब केवल सहायता प्राप्त करने वाले राष्ट्र नहीं रहना चाहते, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी की अपेक्षा रखते हैं।यह भारत की उस दीर्घकालिक विदेश नीति का हिस्सा है जिसमें वह एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की आवाज को वैश्विक मंचों तक पहुंचाने का प्रयास करता रहा है।

निष्कर्ष:

भारत की नई वैश्विक भूमिकाजी-7 के मंच से दिया गया प्रधानमंत्री मोदी का संदेश केवल समुद्री सुरक्षा तक सीमित नहीं था। यह एक ऐसे भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता है जो अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर मुखर है, वैश्विक स्थिरता में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है और भरोसे पर आधारित नई विश्व व्यवस्था की वकालत करता है।

हालांकि, इस दृष्टिकोण की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने कूटनीतिक सिद्धांतों को व्यवहारिक रणनीतियों में किस हद तक बदल पाता है।

विपक्ष के सवाल, कानूनविदों की अपेक्षाएं और रक्षा विशेषज्ञों की चेतावनियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी सरकार की नीतिगत घोषणाएं।फिलहाल इतना स्पष्ट है कि समुद्र में उठी यह लहर केवल नाविकों की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति, आर्थिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय भरोसे की नई परीक्षा भी है।

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