14 साल बाद आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला, तब तक दो दोषियों की हो चुकी थी मौत! क्या ‘देर से मिला न्याय’ वास्तव में न्याय है?

बी. के. झा

NSK News

नई दिल्ली, 28 जून।

“देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।” भारतीय न्याय व्यवस्था का यह बहुचर्चित सिद्धांत एक बार फिर कठोर यथार्थ के सामने खड़ा दिखाई देता है। विडंबना यह है कि यही सिद्धांत समय-समय पर अदालतों द्वारा दोहराया जाता है, लेकिन कई मामलों में न्याय मिलने में इतनी लंबी देरी हो जाती है कि उसका वास्तविक उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।ऐसा ही एक मामला देश की सर्वोच्च अदालत से सामने आया है, जहां गैर-इरादतन हत्या के एक मुकदमे में अंतिम फैसला आने में लगभग 14 वर्ष लग गए। इस लंबी न्यायिक प्रक्रिया का सबसे दर्दनाक पहलू यह रहा कि जब तक फैसला आया, तब तक तीन दोषियों में से दो की मृत्यु हो चुकी थी और तीसरा आरोपी 33 वर्ष की आयु से बढ़कर 60 वर्ष से अधिक का हो चुका था।यह केवल एक मुकदमे की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने खड़े उस गंभीर प्रश्न का आईना है कि यदि न्याय समय पर न मिले तो उसका वास्तविक मूल्य कितना शेष रह जाता है।

निचली अदालत और हाईकोर्ट ने दिखाई तत्परता, शीर्ष अदालत में थम गई रफ्तार

इस मामले का सबसे आश्चर्यजनक पक्ष यह है कि ट्रायल कोर्ट ने लगभग पांच वर्षों में सुनवाई पूरी कर फैसला सुना दिया। इसके बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी अपील का निस्तारण अपेक्षाकृत उचित समय में कर दिया और वर्ष 2012 में दोषसिद्धि को बरकरार रखा।लेकिन सितंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा यह मामला अगले लगभग 14 वर्षों तक अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा करता रहा। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस अवधि में मामले को केवल 12 बार सूचीबद्ध किया गया। अर्थात कई वर्षों तक सुनवाई आगे बढ़ने के बजाय केवल तारीखें मिलती रहीं।

500 रुपये की घड़ी बना 29 वर्षों की कानूनी लड़ाई का कारण

इस मुकदमे की शुरुआत 12 फरवरी 1997 को महज 500 रुपये की एक घड़ी के लेन-देन को लेकर हुए विवाद से हुई थी। मामूली कहासुनी देखते ही देखते मारपीट में बदल गई। धक्का-मुक्की के दौरान घड़ी बेचने वाला व्यक्ति संतुलन खो बैठा और पास की सूखी, पथरीली नहर में गिर गया। सिर में गंभीर चोट लगने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।पुलिस ने तीन लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया। वर्ष 2002 में ट्रायल कोर्ट ने तीनों को पांच-पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने भी 2012 में इस निर्णय को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

तीन दशक बाद बदला फैसला

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने अपने निर्णय में इस असाधारण देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने माना कि घटना के समय मुख्य अपीलकर्ता 33 वर्ष का था और अब वह 60 वर्ष से अधिक आयु का हो चुका है। वहीं उसके दो सह-आरोपियों का इस दौरान निधन हो चुका है।पीठ ने यह भी माना कि मृतक को लगी घातक चोटें मुख्यतः सूखी पथरीली नहर में गिरने के कारण हुई थीं। इन परिस्थितियों तथा बीते लगभग तीन दशकों के लंबे अंतराल को देखते हुए अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन पांच वर्ष की सजा को घटाकर उतनी अवधि तक सीमित कर दिया जितना समय आरोपी पहले ही जेल में बिता चुका था, जो लगभग डेढ़ वर्ष था।

न्याय व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न

यह मामला केवल एक फैसले की देरी नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था के समक्ष खड़े उस व्यापक संकट को उजागर करता है, जहां वर्षों तक लंबित मुकदमे पीड़ितों, आरोपियों और उनके परिवारों के जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय केवल सही निर्णय देने का नाम नहीं, बल्कि उचित समय पर निर्णय देने की भी संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि फैसले दशकों बाद आएं, तो उनका सामाजिक और मानवीय महत्व स्वतः कम हो जाता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेन्द्र मिश्रा की राय

वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेन्द्र मिश्रा का कहना है कि न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत संवैधानिक संस्थाओं में से एक है और जनता का उस पर अटूट विश्वास बना रहना चाहिए। किंतु न्यायिक प्रक्रिया में अत्यधिक विलंब स्वयं न्याय के उद्देश्य को प्रभावित करता है।उन्होंने कहा, “न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समयबद्ध होना भी उतना ही आवश्यक है। यदि किसी मुकदमे का अंतिम निर्णय आने में दो-दो या तीन-तीन दशक बीत जाएं, तो पीड़ित, आरोपी और समाज—तीनों न्याय की वास्तविक उपयोगिता से वंचित हो जाते हैं। संविधान प्रत्येक नागरिक को त्वरित और प्रभावी न्याय की भावना प्रदान करता है। इसलिए लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए संस्थागत सुधार, न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, आधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग तथा समयबद्ध सुनवाई की प्रभावी व्यवस्था आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।”उन्होंने आगे कहा कि न्यायपालिका पर जनता का विश्वास उसकी सबसे बड़ी पूंजी है और इस विश्वास को मजबूत बनाए रखने के लिए न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयोचित बनाना अनिवार्य है।

न्यायिक सुधार पर नई बहस

कानूनविदों और न्यायिक सुधार के पक्षधर विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला एक बार फिर न्यायिक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट सहित सभी न्यायालयों में लंबित मामलों के निस्तारण के लिए स्पष्ट प्राथमिकता, समयबद्ध सुनवाई, डिजिटल प्रबंधन प्रणाली और पर्याप्त न्यायिक संसाधनों की व्यवस्था किए बिना स्थिति में अपेक्षित सुधार संभव नहीं होगा।

निष्कर्ष

यह मामला केवल तीन आरोपियों या एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने खड़े उस मौलिक प्रश्न का प्रतीक है कि क्या दशकों बाद मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाया जा सकता है?

जब निर्णय आने तक दो दोषियों का जीवन समाप्त हो जाए और तीसरा वृद्धावस्था की दहलीज पर पहुंच जाए, तब यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है। न्याय व्यवस्था की गरिमा केवल उसके निर्णयों में नहीं, बल्कि उनकी समयबद्धता में भी निहित है।यदि “देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के समान है” केवल एक आदर्श वाक्य बनकर रह जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। समय की मांग है कि न्यायिक सुधारों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि अदालतों का न्याय केवल कानून की पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि समय पर प्रत्येक नागरिक तक पहुंच सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *