बी के झा
NSK

चेन्नई/ न ई दिल्ली, 6 मई
चेन्नई की राजनीतिक फिज़ा इन दिनों असाधारण रूप से गर्म है। बड़े जनादेश के बाद भी सरकार गठन की राह आसान नहीं दिख रही। विजय ने राज्यपाल के समक्ष 112 विधायकों के समर्थन का दावा पेश कर दिया है, लेकिन संवैधानिक कसौटी 118 के जादुई आंकड़े पर अटकी हुई है। यही वह रेखा है, जिसके इस पार सत्ता और उस पार प्रतीक्षा खड़ी है।
संख्या का गणित: जीत के बाद भी अधूरा बहुमत
तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत के लिए 118 विधायकों का समर्थन अनिवार्य है।विजय के पास फिलहाल:टीवीके के 107 विधायक (दो सीटों पर खुद विजय की जीत के कारण संख्या तकनीकी रूप से प्रभावित)
कांग्रेस के 5 विधायकों का समर्थन
कुल मिलाकर 112 का आंकड़ा—जो “सरकार बनाने की इच्छा” तो दिखाता है, लेकिन “स्थिर सरकार” की गारंटी नहीं देता।राज्यपाल आर. एन. आर्लेकर ने स्पष्ट संकेत दिया है कि औपचारिक आमंत्रण से पहले बहुमत के ठोस प्रमाण अपेक्षित हैं। यही वजह है कि प्रस्तावित शपथ ग्रहण की समय-सीमा अब अनिश्चितता में घिर गई है।
संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: कानून क्या कहता है?
संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह सरकार गठन के दावे की विश्वसनीयता पर संतुष्ट हों।भारतीय संविधान के अनुसार:राज्यपाल उस नेता को आमंत्रित करते हैं जो बहुमत साबित कर सके“संख्या का ठोस प्रमाण” (letters of support) आवश्यक होता है शपथ के बाद भी फ्लोर टेस्ट अनिवार्य हो सकता है
कानूनविदों का कहना है कि 112 के साथ शपथ दिलाना “राजनीतिक जोखिम” होगा, क्योंकि सदन में बहुमत साबित न होने पर सरकार तुरंत गिर सकती है।
सियासी जोड़-तोड़: समर्थन की तलाश
विजय के लिए अब हर विधायक की अहमियत बढ़ गई है।वीसीके (2 विधायक) का फैसला अभी लंबितवाम दलों (4 विधायक) का समर्थन 8 मई तक अनिश्चितपीएमके (4 विधायक) ने मुलाकात तो की, पर समर्थन पत्र नहीं दिया इस बीच कांग्रेस सक्रिय रूप से छोटे दलों को जोड़ने में लगी है, ताकि गठबंधन का आंकड़ा 118 के पार पहुंच सके।
गठबंधन की राजनीति: शर्तें और संकेत
कांग्रेस ने समर्थन तो दिया है, लेकिन एक स्पष्ट शर्त के साथ—“सांप्रदायिक ताकतों” को गठबंधन से बाहर रखा जाए।यह शर्त परोक्ष रूप से एआईएडीएमके के लिए एक राजनीतिक संदेश मानी जा रही है।दिलचस्प यह है कि एआईएडीएमके खुद सत्ता में शामिल होने के बजाय “बाहरी समर्थन” के विकल्प पर विचार कर रही है—जो सरकार को स्थिरता देने के बजाय अस्थिरता का खतरा भी बढ़ा सकता है।
डीएमके का पलटवार: ‘विश्वासघात’ की राजनीति
DMK ने कांग्रेस के इस कदम को “विश्वासघात” बताया है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में नए ध्रुवीकरण की शुरुआत है।डीएमके, जो अब तक कांग्रेस की स्वाभाविक सहयोगी रही, खुद को अलग-थलग महसूस कर रही है—और यही भविष्य में बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन का कारण बन सकता है।
विश्लेषण: विजय की राह कितनी कठिन?
राजनीतिक शिक्षाविदों के अनुसार, विजय की स्थिति “जनादेश बनाम गणित” की क्लासिक केस स्टडी है।जनसमर्थन उनके पक्ष में है लेकिन विधायकों का गणित अभी अधूरा हैअगर वह जल्द ही 118 का आंकड़ा पार कर लेते हैं, तो यह उनकी राजनीतिक कुशलता का प्रमाण होगा।अगर नहीं, तो यह उनके लिए पहली बड़ी परीक्षा साबित होगी।
राष्ट्रीय असर: विपक्षी राजनीति पर प्रभाव
सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी के संभावित रूप से शपथ समारोह में शामिल होने की खबर इस पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रीय आयाम देती है।यह संकेत है कि क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस नए समीकरण गढ़ने को तैयार है।
even अगर इसके लिए पुराने सहयोगियों से दूरी क्यों न बनानी पड़े।
निष्कर्ष:
शपथ या स्थगन?
तमिलनाडु की राजनीति इस वक्त एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।8 मई की सुबह प्रस्तावित शपथ ग्रहण समारोह अब केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि “संख्या की परीक्षा” बन चुका है।
अंतिम सवाल यही है:क्या ‘थलापति’ बहुमत जुटाकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंच पाएंगे,या फिर 112 का आंकड़ा उन्हें कुछ और दिनों की राजनीतिक प्रतीक्षा में धकेल देगा?
तमिलनाडु का अगला अध्याय अब कुछ विधायकों के फैसले पर टिका है–
और यही लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प, लेकिन सबसे जटिल सच्चाई भी है।
