बी के झा
NSK


चेन्नई/नई दिल्ली, 10 मई
तमिलनाडु की राजनीति में रविवार का दिन ऐतिहासिक भी रहा और नाटकीय भी। सिनेमा के सुपरस्टार से सत्ता के शिखर तक पहुंचे टीवीके प्रमुख सी. जोसेफ विजय उर्फ ‘थलापति विजय’ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही जनता को बड़ा संदेश दिया कि उनकी सरकार केवल नारों की नहीं, बल्कि त्वरित फैसलों की सरकार होगी।राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने चेन्नई में आयोजित भव्य समारोह में विजय को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद मुख्यमंत्री विजय ने अपनी चुनावी गारंटी को अमल में लाते हुए 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने संबंधी फाइल पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष सुरक्षा बल के गठन की मंजूरी देकर उन्होंने सामाजिक सुरक्षा को भी प्राथमिकता में रखने का संकेत दिया।
मगर सत्ता के इस उत्सव के बीच राजनीतिक गलियारों में एक और कहानी तेजी से आकार ले रही है—
एक वोट से जीती गई सीट अब अदालत की चौखट तक पहुंच चुकी है और यही मामला आने वाले दिनों में विजय सरकार की स्थिरता की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है।“
मैं किसी शाही परिवार से नहीं हूं…” विजय का भावुक संदेश
मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद विजय ने अपने संबोधन में भावनात्मक अंदाज अपनाते हुए कहा—“मैं किसी राजनीतिक वंश या शाही परिवार से नहीं हूं। मैं सामान्य परिवार से आया हूं, लेकिन तमिलनाडु की जनता ने मुझ पर भरोसा किया। यह सरकार जनता के सम्मान और अधिकारों की सरकार होगी।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय ने अपने पहले भाषण में सीधे तौर पर वंशवादी राजनीति पर प्रहार किया। यह संदेश केवल तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की बधाई, केंद्र-राज्य संबंधों पर नजर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विजय को मुख्यमंत्री बनने पर बधाई देते हुए कहा कि केंद्र सरकार तमिलनाडु के विकास और लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए राज्य सरकार के साथ मिलकर कार्य करेगी।दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस संदेश को बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए विजय सरकार के साथ “सहयोगात्मक संतुलन” की नीति अपना सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एस. रंगराजन कहते हैं—“
विजय का उदय दक्षिण भारतीय राजनीति में एक नए सामाजिक समीकरण का संकेत है। वे न तो पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के ढांचे में फिट बैठते हैं और न ही राष्ट्रीय दलों की शैली में। यही कारण है कि दिल्ली भी उन्हें लेकर सतर्क और उत्सुक दोनों है।”
मुफ्त बिजली का फैसला: राहत या आर्थिक चुनौती?
200 यूनिट मुफ्त बिजली का निर्णय जनता के बीच बेहद लोकप्रिय माना जा रहा है। चेन्नई, मदुरै, कोयंबटूर और तिरुचिरापल्ली जैसे शहरों में आम लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है।
चेन्नई की गृहिणी लक्ष्मी अम्माल कहती हैं—“महंगाई के दौर में बिजली बिल सबसे बड़ी चिंता बन गया था। अगर सरकार वादा निभाती है तो मध्यम वर्ग को बड़ी राहत मिलेगी।”
हालांकि अर्थशास्त्रियों और वित्त विशेषज्ञों ने इस योजना की आर्थिक व्यवहारिकता पर सवाल भी उठाए हैं।शिक्षाविद और अर्थविशेषज्ञ डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम का कहना है—“लोकप्रिय योजनाएं राजनीतिक रूप से लाभ देती हैं, लेकिन राज्य पहले से वित्तीय दबाव में है। सरकार को बताना होगा कि राजस्व का स्रोत क्या होगा।”
महिलाओं की सुरक्षा पर विशेष बल: राजनीतिक संदेश भी, सामाजिक प्रयोग भी
महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष बल के गठन को विजय सरकार का दूसरा बड़ा निर्णय माना जा रहा है।सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह फैसला तमिलनाडु की शहरी महिलाओं और छात्राओं के बीच सरकार की सकारात्मक छवि बनाएगा।चेन्नई विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. मीना कृष्णन कहती हैं—“महिलाओं की सुरक्षा केवल पुलिसिंग का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का प्रश्न है। यदि विशेष बल प्रभावी ढंग से काम करता है, तो यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।”
एक वोट का खेल और हाई कोर्ट का संकट
शपथ ग्रहण समारोह की चमक के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल तिरुपत्तूर सीट से उठा है। यहां टीवीके प्रत्याशी श्रीनिवासा सेतुपति ने डीएमके उम्मीदवार एवं स्टालिन सरकार के पूर्व मंत्री के.आर. पेरियाकरुप्पन को महज एक वोट से हराया था।निर्वाचन आयोग के अनुसार:श्रीनिवासा सेतुपति — 83,375 वोटके.आर. पेरियाकरुप्पन — 83,374 वोट
अब डीएमके नेता ने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मतगणना प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की है कि सेतुपति को विश्वास मत प्रक्रिया में भाग लेने से रोका जाए। हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष पीठ गठित करने पर सहमति जताई है।
कानूनविदों की राय: “यह मामला सरकार की स्थिरता तय कर सकता है”
संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गणेशन कहते हैं—“यदि अदालत मतगणना में गंभीर अनियमितता पाती है, तो परिणाम पलट भी सकता है या पुनर्मतगणना का आदेश दिया जा सकता है। चूंकि सरकार बहुमत के बेहद नाजुक आंकड़े पर टिकी है, इसलिए यह मामला राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है।”
कानूनविदों का मानना है कि अदालत सीधे तौर पर विश्वास मत रोकने जैसे आदेश देने में बेहद सावधानी बरतेगी, क्योंकि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा विषय है।
विपक्ष का हमला: “जनादेश अधूरा, सरकार अस्थिर
”डीएमके नेताओं ने विजय सरकार पर “संख्याबल की मजबूरी” वाली सरकार होने का आरोप लगाया है।विपक्ष का कहना है कि चुनाव परिणामों के बाद जिस तरह सहयोगी दलों को साथ जोड़कर सरकार बनाई गई, वह जनता के स्पष्ट जनादेश का प्रतिबिंब नहीं है।
डीएमके प्रवक्ता ने कहा—“फिल्मी लोकप्रियता और प्रशासनिक क्षमता में अंतर होता है। सरकार को पहले दिन से ही बहुमत बचाने की चिंता सताने लगी है।”वहीं भाजपा और कांग्रेस दोनों फिलहाल “वेट एंड वॉच” की रणनीति अपनाए हुए हैं।
जनता के बीच उम्मीद और उत्सुकता
तमिलनाडु के गांवों और कस्बों में विजय सरकार को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। युवा वर्ग इसे “नई राजनीति” की शुरुआत बता रहा है।मदुरै के ऑटो चालक मुरुगन कहते हैं—“विजय ने फिल्मों में गरीबों की आवाज उठाई। अब लोग उम्मीद कर रहे हैं कि वह असल जिंदगी में भी आम आदमी के लिए काम करेंगे।”लेकिन कुछ लोग सतर्क भी हैं।
व्यापारी वर्ग का कहना है कि लोकलुभावन योजनाओं के साथ रोजगार और उद्योग पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
क्या तमिलनाडु में शुरू हो गया है नया राजनीतिक युग?
द्रविड़ राजनीति के लंबे इतिहास वाले तमिलनाडु में विजय का सत्ता तक पहुंचना केवल एक चुनावी जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि यह पारंपरिक राजनीति के ढांचे में बदलाव का संकेत भी है।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि विजय अपनी लोकप्रियता को प्रशासनिक दक्षता में बदलने में सफल रहे, तो वे दक्षिण भारत की राजनीति में नई धुरी बन सकते हैं।
लेकिन यदि सरकार शुरुआती कानूनी और राजनीतिक संकटों में उलझ गई, तो यह “फिल्मी करिश्मा” ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा।
फिलहाल तमिलनाडु की जनता के सामने दो तस्वीरें हैं—एक तरफ मुफ्त बिजली और सुरक्षा के वादों के साथ उम्मीदों से भरी नई सरकार,तो दूसरी तरफ अदालत, बहुमत और राजनीतिक अस्थिरता का बढ़ता दबाव।
अब सबकी नजर मद्रास हाई कोर्ट और विधानसभा के विश्वास मत पर टिक गई है, जहां तय होगा कि विजय की राजनीतिक पटकथा सुपरहिट साबित होगी या सत्ता का यह रोमांचक अध्याय जल्द ही नए मोड़ लेगा।
