बी के झा
NSK



पटना/नई दिल्ली, 15 मई
बिहार की राजनीति में अब विकास, रोजगार और महंगाई के साथ-साथ “अंग्रेजी” भी बड़ा सियासी मुद्दा बनती जा रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अंग्रेजी बोलने की शैली को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे तंज और मीम्स ने ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री सह केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी और भाजपा की फायरब्रांड नेता उमा भारती खुलकर सम्राट चौधरी के समर्थन में उतर आई हैं। वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की विदेश यात्राओं और उनके खर्च को लेकर नया हमला बोल दिया है। देखते ही देखते यह विवाद भाषा से निकलकर नेतृत्व, अभिजात्य मानसिकता और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में बदल गया है।
केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर सम्राट चौधरी के समर्थन में तीखा बयान देते हुए कहा कि “सम्राट चौधरी वही अंग्रेजी बोलते हैं जिसे गांव-जवार का आदमी समझ सके।” मांझी ने सीधे तौर पर विपक्ष और ट्रोलर्स पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग सम्राट चौधरी की अंग्रेजी का मजाक उड़ा रहे हैं, उन्हें पहले लालू प्रसाद यादव और सोनिया गांधी से सवाल पूछना चाहिए।
उन्होंने कहा कि “लालू जी को अंग्रेजी नहीं आती और सोनिया गांधी आज तक ठीक से हिंदी नहीं सीख पाईं, फिर भी उनके नेतृत्व पर कभी सवाल नहीं उठे।”मांझी का यह बयान बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय और ग्रामीण पृष्ठभूमि बनाम अभिजात्य राजनीति की बहस को फिर हवा दे गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा और एनडीए अब इस मुद्दे को “ग्रामीण बनाम एलीट मानसिकता” के फ्रेम में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा का एक वर्ग इसे “अंग्रेजी गुलामी की मानसिकता” बता रहा है।
इस विवाद में मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी जोरदार एंट्री ली। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि “सम्राट चौधरी की अंग्रेजी का मजाक उड़ाने वाले अंग्रेजों की छोड़ी हुई जूठन हैं।” उमा भारती ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया के शक्तिशाली नेताओं को अंग्रेजी बोलने की जरूरत नहीं पड़ती, नेतृत्व क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। उनके इस बयान ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है। समर्थक इसे भारतीय भाषाओं के सम्मान की लड़ाई बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक बचाव की रणनीति कह रहे हैं।
दरअसल, जन सुराज के संयोजक प्रशांत किशोर लंबे समय से सम्राट चौधरी की शिक्षा और अंग्रेजी को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनके भाषणों में कई बार मुख्यमंत्री की भाषा शैली पर कटाक्ष सुनाई देता है। सोशल मीडिया पर भी कुछ लोग मुख्यमंत्री के भाषणों के वीडियो शेयर कर मीम्स बनाते रहे हैं। लेकिन अब भाजपा ने इसे “व्यक्तिगत उपहास” और “गरीब-पिछड़े समाज का अपमान” करार देकर पलटवार शुरू कर दिया है।इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “त्याग और बचत” वाली अपील पर राहुल गांधी की आलोचना ने सियासत को और गरमा दिया है।
राहुल गांधी ने पीएम मोदी की अपील पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार अपनी विफलताओं का बोझ जनता पर डाल रही है। राहुल ने तंज कसते हुए कहा कि “मोदी सरकार अब जनता को बता रही है कि क्या खरीदना है, क्या नहीं; कहां जाना है और कहां नहीं।
” उन्होंने प्रधानमंत्री को “Compromised PM” तक कह डाला।राहुल गांधी के इस हमले के बाद भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस नेता की विदेश यात्राओं को मुद्दा बना दिया।
बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मंगल पांडेय ने दावा किया कि राहुल गांधी ने पिछले 22 वर्षों में 54 विदेश यात्राएं कीं, जिन पर लगभग 60 करोड़ रुपये खर्च हुए। मंगल पांडेय ने सवाल उठाया कि राहुल गांधी अपनी यात्राओं की फंडिंग का स्रोत सार्वजनिक करें।
भाजपा का आरोप है कि जो नेता जनता को त्याग का पाठ पढ़ाने पर सरकार को घेर रहे हैं, उन्हें पहले खुद अपनी जीवनशैली का हिसाब देना चाहिए।मंगल पांडेय ने दावा किया कि राहुल गांधी की घोषित आय और विदेश यात्राओं के खर्च में बड़ा अंतर है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी इटली, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, सिंगापुर, मालदीव और कतर जैसे देशों की निजी यात्राएं करते रहे हैं, इसलिए उन्हें पारदर्शिता दिखानी चाहिए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा अब इस पूरे विवाद को “राष्ट्रवाद बनाम अभिजात्य राजनीति” और “जमीन से जुड़े नेता बनाम विदेशी सोच” के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। वहीं कांग्रेस इसे महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट जैसे मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति बता रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, सोना की खरीद टालने और विदेश यात्राओं से बचने की अपील के बाद भाजपा शासित राज्यों में सादगी अभियान शुरू हो गया है। बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने काफिले की गाड़ियों की संख्या घटा दी है। कई मंत्री भी कम वाहनों के साथ चल रहे हैं। भाजपा इसे “राष्ट्रीय जिम्मेदारी” बता रही है, जबकि विपक्ष इसे “प्रतीकात्मक राजनीति” कह रहा है।
बिहार की सियासत में फिलहाल मुद्दा सिर्फ अंग्रेजी या विदेश यात्रा नहीं रह गया है। असली लड़ाई अब इस बात की है कि जनता किसे “जमीन से जुड़ा नेता” मानती है और किसे “विशेषाधिकार वाली राजनीति” का प्रतीक।
आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं, क्योंकि चुनावी मौसम करीब है और हर बयान अब राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है।
