बी के झा
NSK

पटना /नई दिल्ली , 19 मई
बिहार की राजनीति में अक्सर घोषणाएं होती रही हैं, योजनाएं बनती रही हैं, लेकिन इस बार सम्राट चौधरी सरकार ने जो “सहयोग शिविर” मॉडल लागू किया है, उसने प्रशासनिक गलियारों से लेकर गांव की चौपाल तक हलचल पैदा कर दी है।
कारण साफ है—यह पहली ऐसी व्यवस्था बताई जा रही है, जिसमें जनता की शिकायत का समाधान 30 दिनों में नहीं होने पर संबंधित अधिकारी के स्वतः निलंबन की बात कही गई है। यही वजह है कि इसे केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि “प्रशासनिक जवाबदेही का राजनीतिक प्रयोग” माना जा रहा है।
सारण जिले के सोनपुर के डुमरी बुजुर्ग गांव से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस अभियान की शुरुआत करते हुए साफ संकेत दिया कि अब सरकार जनता और अफसरशाही के बीच की दूरी को सीधे खत्म करना चाहती है। पंचायत स्तर पर लगने वाले इन सहयोग शिविरों में अंचल, प्रखंड और थाना स्तर के अधिकारी एक साथ बैठेंगे और लोगों की शिकायतें सुनेंगे।
आवेदन मिलने के 10वें day पहला नोटिस, 20वें दिन दूसरा नोटिस, 25वें दिन तीसरा नोटिस और 30 दिन में समाधान नहीं होने पर 31वें दिन निलंबन—सरकार का यह फार्मूला जितना सख्त दिख रहा है, उतना ही राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी भी माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक संस्कृति का संकेत भी है। लंबे समय से बिहार की राजनीति जातीय समीकरण, कानून-व्यवस्था और विकास के वादों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन अब “गुड गवर्नेंस” और “अफसरों की जवाबदेही” को चुनावी नैरेटिव बनाने की कोशिश दिखाई दे रही है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर यह मॉडल जमीन पर सफल हुआ तो यह एनडीए सरकार के लिए वैसा ही राजनीतिक हथियार बन सकता है जैसा कभी “सुशासन” की राजनीति हुआ करती थी।
शिक्षाविदों का एक वर्ग इसे लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाला कदम मान रहा है। उनका कहना है कि गांव के आम नागरिक को पटना या जिला मुख्यालय के चक्कर लगाने के बजाय अपनी पंचायत में ही न्याय और समाधान मिलने लगे, तो इससे लोकतंत्र की वास्तविक भावना मजबूत होगी। विशेष रूप से भूमि विवाद, दाखिल-खारिज, जाति-आय प्रमाण पत्र, पेंशन, राशन और आवास योजनाओं जैसी समस्याएं ग्रामीण जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा रही हैं। यदि इनका त्वरित समाधान होता है तो प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास बढ़ेगा।
हालांकि कानूनविद इस योजना को लेकर कुछ गंभीर सवाल भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि “31वें दिन स्वतः निलंबन” जैसी व्यवस्था सुनने में कठोर और प्रभावशाली लगती है, लेकिन इसका कानूनी और प्रशासनिक ढांचा बेहद मजबूत होना चाहिए। कई बार मामले न्यायालय में लंबित होते हैं, दस्तावेज अधूरे होते हैं या विवाद बहुस्तरीय होते हैं। ऐसे में बिना पर्याप्त जांच के केवल समयसीमा के आधार पर निलंबन करना भविष्य में कानूनी विवाद खड़ा कर सकता है। कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि इससे अफसरों पर अनावश्यक दबाव भी बढ़ सकता है और वे केवल “फाइल निपटाने” की मानसिकता में काम करने लगेंगे।
विपक्षी दलों ने भी इस योजना पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार “सस्पेंशन की धमकी” देकर सुर्खियां बटोरना चाहती है, जबकि जमीनी स्तर पर पंचायतों में कर्मचारियों और संसाधनों की भारी कमी है। कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में जवाबदेही चाहती है तो पहले खाली पदों पर नियुक्ति करे, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए और थानों-अंचलों में दलाल व्यवस्था खत्म करे। उनका तर्क है कि केवल घोषणाओं से गांवों की समस्याएं हल नहीं होंगी।
इसके बावजूद आम नागरिकों के बीच इस पहल को लेकर उत्सुकता और उम्मीद दोनों दिखाई दे रही है। गांवों में रहने वाले लोगों का कहना है कि वर्षों से छोटे-छोटे कामों के लिए उन्हें प्रखंड और जिला कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। अगर पंचायत स्तर पर ही समाधान मिलने लगे तो यह ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत होगी। खासकर बुजुर्ग, महिलाएं और गरीब परिवार इस व्यवस्था से सबसे ज्यादा लाभान्वित हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने संबोधन में केवल शिकायत निवारण की बात नहीं की, बल्कि सोनपुर को “नोएडा मॉडल” की तरह विकसित करने का सपना भी दिखाया। एयरपोर्ट, टाउनशिप, फैक्ट्री और रोजगार की बात करते हुए उन्होंने संकेत दिया कि सरकार सोनपुर को भविष्य के औद्योगिक और शहरी केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है। बाबा हरिहरनाथ के नाम पर नए टाउनशिप की घोषणा और जमीन देने वालों को चार गुना मुआवजा देने का आश्वासन भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो यह पहल सम्राट चौधरी की व्यक्तिगत नेतृत्व शैली को भी स्थापित करने की कोशिश है। वे खुद को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं जो सीधे जनता से जुड़कर प्रशासन को नियंत्रित करता है। मुख्यमंत्री कार्यालय से “रियल टाइम मॉनिटरिंग” की घोषणा इसी संदेश को मजबूत करती है कि अब सरकार केवल आदेश देने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि परिणाम भी देखना चाहती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह योजना कागजों से निकलकर गांव की वास्तविकता बदल पाएगी?
क्या पंचायत स्तर पर बैठे अधिकारी सचमुच 30 दिन में समस्याओं का समाधान कर पाएंगे?
क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति नौकरशाही की जटिलताओं पर भारी पड़ेगी?
यदि सरकार अपने दावों पर खरी उतरती है तो यह बिहार के प्रशासनिक इतिहास में एक नई मिसाल बन सकती है। लेकिन अगर यह पहल भी केवल भाषणों और सरकारी फाइलों तक सीमित रह गई, तो जनता की उम्मीदें फिर एक बार राजनीतिक नारों की भीड़ में खो जाएंगी।
फिलहाल बिहार की जनता देख रही है, अफसरशाही सतर्क है और राजनीति में एक नया प्रयोग शुरू हो चुका है।
