बी के झा
NSK

कोलकाता, नई दिल्ली, 21 मई
पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट आज केवल एक उपचुनाव का मैदान नहीं, बल्कि राज्य की बदलती राजनीति, सत्ता संघर्ष और राजनीतिक प्रतीकों के पतन की जीवंत तस्वीर बन चुकी है। जिस सीट को कभी All India Trinamool Congress का अभेद्य गढ़ माना जाता था, वहां आज पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच गई है कि EVM पर उसका उम्मीदवार मौजूद है, लेकिन चुनाव मैदान में नहीं।यह शायद भारतीय चुनावी इतिहास के सबसे विचित्र राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक है—जहां मतदाता मशीन पर जिस उम्मीदवार का नाम देखेंगे, वही उम्मीदवार खुद मतदान की लड़ाई छोड़ चुका है।‘
पुष्पा झुकेगा नहीं’ से ‘मैदान छोड़कर चला गया’ तक
इस पूरे राजनीतिक नाटक का सबसे चर्चित चेहरा रहे Jahangir Khan ने चुनाव प्रचार के दौरान खुद को फिल्म Pushpa: The Rise के नायक की तरह पेश किया था।मंचों से उनका सबसे पसंदीदा संवाद था—“पुष्पा झुकेगा नहीं।”
उन्होंने पुलिस पर्यवेक्षक तक को सार्वजनिक चुनौती दी थी और खुद को ऐसा नेता बताया था जो किसी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। लेकिन पुनर्मतदान से ठीक पहले वही “पुष्पा” अचानक चुनावी रणभूमि से बाहर हो गया।अब बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा व्यंग्य यही बन गया है कि जो नेता “न झुकने” का दावा कर रहा था, उसने लड़ाई शुरू होने से पहले ही हथियार डाल दिए।
TMC अपने ही गढ़ में क्यों असहाय दिख रही?
फलता सीट Abhishek Banerjee के प्रभाव वाले डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का मजबूत किला मानी जाती रही है।लेकिन जहांगीर खान के पीछे हटने ने पार्टी के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक उम्मीदवार का व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि बदलते सत्ता समीकरणों और स्थानीय राजनीतिक दबाव का परिणाम है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि TMC अब अपने ही गढ़ में “चेहरे के संकट” से जूझती दिख रही है।
EVM पर नाम क्यों रहेगा?
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार नाम वापसी की अंतिम तारीख निकल चुकी थी। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से जहांगीर खान का नाम हटाया नहीं जा सकता।यानी मतदाता जब वोट डालने जाएंगे, तो मशीन पर TMC प्रत्याशी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों दिखाई देंगे, जबकि उम्मीदवार स्वयं चुनाव से अलग होने की घोषणा कर चुका है।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारतीय चुनावी प्रक्रिया का दुर्लभ लेकिन वैधानिक पहलू है, जहां तकनीकी प्रक्रिया और राजनीतिक वास्तविकता अलग-अलग दिशा में खड़ी दिखाई देती हैं।
BJP ने देबांग्शु पांडा पर क्यों लगाया दांव?
Bharatiya Janata Party ने इस सीट पर Debangshu Panda को उम्मीदवार बनाया है।भाजपा इस चुनाव को केवल एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि “TMC के मनोबल पर हमला” मानकर लड़ रही है।राजनीतिक रणनीतिकारों का कहना है कि भाजपा अब यह नैरेटिव गढ़ने में जुटी है कि बंगाल की राजनीति में डर और अस्थिरता इतनी बढ़ चुकी है कि सत्ताधारी दल के उम्मीदवार तक चुनाव मैदान छोड़ रहे हैं।
चुनाव आयोग ने क्यों बढ़ाई सुरक्षा?
23 अप्रैल को हुए मतदान में अनियमितताओं और हिंसा की शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने पुनर्मतदान का फैसला लिया था।इस बार आयोग किसी भी विवाद से बचना चाहता है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ा दी गई है।हर बूथ पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CPF) के 8 जवान तैनात होंगे कुल 35 कंपनियां केंद्रीय बलों की तैनात की गई हैं 30 क्विक रिस्पॉन्स टीमें बनाई गई हैं हर मतदान केंद्र के भीतर और बाहर कैमरे लगाए गए हैं लाइव वेब-कास्टिंग की जाएगी ड्रोन निगरानी पर भी विचार किया जा रहा है
विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सुरक्षा इंतजाम नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की “विश्वसनीयता बचाने की परीक्षा” भी है।बंगाल पुलिस की कार्रवाई और बढ़ती सियासी गर्मीपुनर्मतदान से पहले बंगाल पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें फलता पंचायत समिति के उपाध्यक्ष Saidul Khan का नाम भी शामिल है।इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं।
भाजपा इसे “कानून व्यवस्था की वापसी” बता रही है, जबकि विपक्षी स्वर इसे “राजनीतिक दबाव” कह रहे हैं।क्या
यह बंगाल की राजनीति का टर्निंग पॉइंट है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, फलता उपचुनाव अब सामान्य चुनाव नहीं रहा। यह बंगाल की बदलती राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक बन चुका है।एक तरफ भाजपा “संगठन + सुरक्षा + राष्ट्रवाद” के मुद्दे पर आक्रामक है, तो दूसरी ओर TMC अंदरूनी असंतोष और नेतृत्व संकट से जूझती दिखाई दे रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि एक मजबूत गढ़ में पार्टी अपने उम्मीदवार को संभाल नहीं पाती, तो आने वाले समय में उसका राजनीतिक प्रभाव कितना स्थिर रहेगा?
निष्कर्ष
फलता की यह लड़ाई केवल वोटों की नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीकों की लड़ाई बन चुकी है।
EVM पर “पुष्पा” मौजूद रहेगा, लेकिन मैदान में नहीं। TMC अपना गढ़ बचाने की कोशिश करेगी, जबकि भाजपा इसे बंगाल की नई राजनीतिक हवा का संकेत साबित करने में जुटी है।अब नजर इस बात पर होगी कि जनता किसे चुनती है—
पुरानी राजनीतिक निष्ठा को या बदलते सत्ता समीकरणों को। लेकिन इतना तय है कि फलता का यह चुनाव बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
