बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 24 मई
भारत और अमेरिका के रिश्तों में इन दिनों कूटनीति की मुस्कान के पीछे तनाव की महीन रेखाएं साफ दिखाई दे रही हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio की दिल्ली यात्रा ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि वॉशिंगटन, नई दिल्ली के साथ बिगड़ते भरोसे को संभालने की कोशिश में जुट गया है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi और रूबियो की मुलाकात केवल ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी पर सामान्य बातचीत नहीं थी, बल्कि यह उस रिश्ते को “रफ्फू” करने की कोशिश मानी जा रही है जिसे अमेरिकी टैरिफ नीतियों, रूस-ईरान समीकरण और पाकिस्तान-चीन के साथ अमेरिकी बढ़ती निकटता ने झटका पहुंचाया है।
अमेरिका का नया संदेश: ‘रूसी तेल छोड़ो, अमेरिकी ऊर्जा अपनाओ’
रूबियो ने साफ संकेत दिया कि अमेरिका भारत को बड़े पैमाने पर ऊर्जा निर्यात करना चाहता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद भारत की ऊर्जा आपूर्ति को “विविधता” देने में मदद कर सकते हैं।लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल व्यापारिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संदेश है। अमेरिका लंबे समय से चाहता रहा है कि भारत रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे।
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने भारी मात्रा में रियायती रूसी तेल खरीदा, जिससे वॉशिंगटन असहज रहा।अब ईरान संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ऊर्जा आपूर्ति को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
संदेश साफ है — “अगर पश्चिम एशिया में संकट गहराता है, तो भारत को अमेरिका की ऊर्जा छतरी की जरूरत पड़ सकती है।
”टैरिफ ने बिगाड़ी दोस्ती की रफ्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की आक्रामक टैरिफ नीति ने दोनों देशों के रिश्तों में सबसे बड़ी दरार पैदा की। भारत पर लगाए गए भारी शुल्क ने नई दिल्ली को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या वॉशिंगटन वास्तव में रणनीतिक साझेदार है या केवल अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने वाला सहयोगी।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने “रणनीतिक साझेदारी” और “व्यापारिक राष्ट्रवाद” के बीच संतुलन बनाने में गलती की। भारत जैसे उभरते बाजार पर ऊंचे टैरिफ लगाने से अमेरिका का दीर्घकालिक भरोसा कमजोर हुआ।दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के विशेषज्ञों के अनुसार भारत अब अमेरिका पर पूर्ण निर्भरता के बजाय “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति अपना रहा है, जहां वह रूस, अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों — सभी के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहता है।
पाकिस्तान और चीन फैक्टर से बढ़ी नई बेचैनी
भारत की रणनीतिक चिंता केवल टैरिफ तक सीमित नहीं है। अमेरिका का पाकिस्तान के साथ फिर से बढ़ता संवाद और चीन के साथ ट्रंप की कूटनीतिक सक्रियता नई दिल्ली को असहज कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान संकट में पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में अहमियत मिलने से भारत के रणनीतिक हलकों में चिंता बढ़ी है।
नई दिल्ली को डर है कि वॉशिंगटन क्षेत्रीय समीकरणों में इस्लामाबाद को फिर से उपयोगी साझेदार के रूप में देख सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका अभी भी अमेरिका के लिए बेहद अहम है, लेकिन ट्रंप की “डील आधारित विदेश नीति” अनिश्चितता पैदा करती है। यही वजह है कि भारत अब अपने रक्षा और ऊर्जा हितों को लेकर ज्यादा सतर्क दिख रहा है।
विपक्ष ने सरकार को घेरा
कांग्रेस और विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार “दोस्ती की छवि” बनाने में सफल रही, लेकिन व्यापारिक और आर्थिक मोर्चे पर भारत को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि अमेरिका भारत को रणनीतिक साझेदार मानता है, तो फिर भारतीय वस्तुओं पर इतने कठोर टैरिफ क्यों लगाए गए?
वहीं वाम दलों ने आरोप लगाया कि भारत की विदेश नीति “अत्यधिक अमेरिका-केन्द्रित” होती जा रही है, जिससे पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता कमजोर पड़ सकती है।हालांकि सत्ता पक्ष का तर्क है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अमेरिका के साथ मजबूत संबंध भारत की आर्थिक, तकनीकी और रक्षा जरूरतों के लिए अनिवार्य हैं।
क्वाड की चमक भी पड़ रही फीकी?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच क्वाड समूह की घटती राजनीतिक सक्रियता पर भी सवाल उठने लगे हैं। लगातार तीसरी बार शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति में विदेश मंत्रियों की बैठक होना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि व्यापारिक तनाव और वैश्विक संकटों ने इस मंच की गति को धीमा किया है।रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि क्वाड अभी भी चीन को संतुलित करने का अहम मंच है, लेकिन सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताएं इसकी धार को कमजोर कर रही हैं।
मोदी सरकार की रणनीति क्या?
विदेश नीति के जानकारों के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी फिलहाल “संतुलित रणनीति” पर चल रहे हैं। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ तकनीक, रक्षा और निवेश के रिश्तों को मजबूत करना चाहता है, दूसरी तरफ वह रूस, ईरान और खाड़ी देशों के साथ अपने ऊर्जा व सामरिक संबंधों को भी बनाए रखना चाहता है।यही वजह है कि मोदी ने रूबियो के साथ बातचीत में शांति और कूटनीति पर जोर दिया, लेकिन किसी एक खेमे के पक्ष में खुला झुकाव दिखाने से बचते रहे।
रिश्ते पटरी पर लौटेंगे या अविश्वास बढ़ेगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रूबियो की यह यात्रा वास्तव में भारत-अमेरिका संबंधों की दरार भर पाएगी, या यह केवल कूटनीतिक मुस्कान तक सीमित रह जाएगी?
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में व्यापार समझौते, ऊर्जा सहयोग और रक्षा तकनीक पर होने वाले फैसले तय करेंगे कि दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें रणनीतिक साझेदार के रूप में आगे बढ़ेंगी या फिर टैरिफ, तेल और भू-राजनीति के टकराव उनके रिश्तों को बार-बार झकझोरते रहेंगे।
