बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 25 मई
भारतीय राजनीति के कठोर और रणनीतिक गलियारों में भावनाएं अक्सर पर्दे के पीछे रह जाती हैं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान की नई पुस्तक ‘अपनापन’ सत्ता के शिखर पर मौजूद रिश्तों के उस मानवीय पक्ष को सामने लाती है, जिसे सामान्यतः जनता नहीं देख पाती।यह केवल संस्मरणों की पुस्तक नहीं, बल्कि तीन दशक से अधिक पुराने राजनीतिक विश्वास, आत्मीयता, संघर्ष और नेतृत्व की एक ऐसी यात्रा है, जिसमें नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान के संबंधों का भावनात्मक एवं रणनीतिक पक्ष खुलकर सामने आता है।
मोहन यादव के शपथ मंच पर तय हुई ‘दिल्ली की भूमिका’
पुस्तक का सबसे चर्चित प्रसंग 13 दिसंबर 2023 का है, जब मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। लंबे समय तक प्रदेश का नेतृत्व करने वाले शिवराज सिंह चौहान स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में थे।शिवराज लिखते हैं कि जैसे ही मोहन यादव ने शपथ ली, सबका ध्यान नए मुख्यमंत्री की ओर चला गया। तभी प्रधानमंत्री मोदी उनके पास आए और धीमे स्वर में बोले—
“शिवराज, समय निकालकर दिल्ली आइए… आपसे कुछ बातें करनी हैं।”शिवराज के अनुसार, उस समय उन्हें इस बातचीत का गहरा अर्थ समझ नहीं आया था। लेकिन छह महीने बाद जब उन्होंने केंद्रीय मंत्री के रूप में शपथ ली और उन्हें कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय सौंपा गया, तब उन्हें एहसास हुआ कि प्रधानमंत्री ने उसी दिन उनके लिए नई भूमिका की रूपरेखा तय कर ली थी।‘
ऑपरेशन सिंदूर’ और मोदी का दृढ़ नेतृत्व
पुस्तक में पहलगाम आतंकी हमले के बाद की कैबिनेट बैठक का उल्लेख भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिवराज लिखते हैं कि जब देश आक्रोश और तनाव में था, तब प्रधानमंत्री सऊदी अरब दौरे को बीच में छोड़कर तत्काल भारत लौट आए।
उन्होंने लिखा कि कैबिनेट बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी पूरी तरह शांत, संयमित लेकिन दृढ़ दिखाई दे रहे थे। शिवराज के शब्दों में—“उनके चेहरे पर क्रोध नहीं, बल्कि संकल्प था।
”पुस्तक के अनुसार प्रधानमंत्री ने बैठक में कहा—“इस बार का ऑपरेशन अलग होगा। दुनिया के किसी भी कोने में छिपे हों, हम आतंकियों और उनके आकाओं को नहीं छोड़ेंगे।”राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रसंग मोदी की उस नेतृत्व शैली को दर्शाता है, जिसमें सार्वजनिक आक्रामकता से अधिक रणनीतिक संयम दिखाई देता है।
जब ‘मामाजी’ को लेकर उड़ाया गया मजाक
पुस्तक में 2023 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों का भी विस्तृत जिक्र है। जब शुरुआती उम्मीदवार सूची में शिवराज का नाम नहीं आया, तब विपक्ष ने इसे उनके राजनीतिक अंत का संकेत बताना शुरू कर दिया था।कांग्रेस नेताओं और सोशल मीडिया पर “मामाजी का राजनीतिक अंतिम संस्कार” जैसे तंज कसे गए। शिवराज लिखते हैं कि विपक्ष ने उनके उस बयान को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया, जिसमें उन्होंने कहा था—“अगर हम नहीं रहे, तो हमें बहुत याद किया जाएगा।
”उनके अनुसार, यह बयान विकास कार्यों के संदर्भ में था, लेकिन विपक्ष ने इसे सत्ता से विदाई का संकेत बताकर प्रचारित किया।
‘मैं मुख्यमंत्री से नहीं, अपने शिवराज से बात कर रहा हूं’
पुस्तक का सबसे भावनात्मक हिस्सा वह है, जब चुनावी तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने व्यक्तिगत रूप से शिवराज को फोन किया।शिवराज लिखते हैं कि प्रधानमंत्री ने उनसे कहा—“आज मैं मुख्यमंत्री से बात नहीं कर रहा हूं… मैं अपने शिवराज से बात कर रहा हूं।
”उन्होंने शिवराज को कुछ समय एकांत में बिताने, आध्यात्मिक मार्गदर्शन लेने और मानसिक संतुलन बनाए रखने की सलाह दी।शिवराज के अनुसार, उन्होंने जवाब दिया—“भाई साहब, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं सिर्फ काम करना चाहता हूं।”लेकिन प्रधानमंत्री ने फिर कहा—“अपने मन का ध्यान रखिए… फिर काम में जुट जाइए।
”राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह संवाद केवल व्यक्तिगत संवेदना नहीं, बल्कि संगठनात्मक मनोविज्ञान की गहरी समझ को भी दर्शाता है। भाजपा नेतृत्व यह समझता था कि यदि शिवराज का मनोबल कमजोर पड़ा, तो उसका असर सीधे कार्यकर्ताओं पर पड़ सकता है।
ऋषिकेश का एकांत और आत्ममंथन
प्रधानमंत्री की सलाह पर शिवराज उत्तराखंड चले गए। उन्होंने ऋषिकेश में गंगा किनारे बिताए एकांत क्षणों का भी उल्लेख किया है।वह लिखते हैं कि बहती गंगा और अडिग पहाड़ों को देखते हुए उनका मन धीरे-धीरे शांत हुआ और तभी उन्हें समझ आया कि मोदी केवल राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और सहयोगियों की मानसिक स्थिति को भी गहराई से समझने वाले व्यक्ति हैं।
राजनीतिक संदेश क्या है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि ‘अपनापन’ केवल संस्मरण नहीं, बल्कि भाजपा की आंतरिक कार्यशैली और नेतृत्व संस्कृति का राजनीतिक दस्तावेज भी है।इस पुस्तक के जरिए एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी की निर्णायक और संवेदनशील छवि उभरती है, वहीं दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान स्वयं को एक समर्पित संगठनात्मक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं।
विमोचन पर राष्ट्रीय नजर
नई दिल्ली में 26 मई को इस पुस्तक का विमोचन एम. वेंकैया नायडू और एच. डी. देवेगौड़ा की उपस्थिति में होगा। राजनीतिक गलियारों में इसे केवल पुस्तक विमोचन नहीं, बल्कि भाजपा नेतृत्व के भीतर विश्वास और राजनीतिक संदेश के सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।
भारतीय राजनीति में जहां रिश्ते अक्सर सत्ता के समीकरणों में खो जाते हैं, वहां ‘अपनापन’ सत्ता और संवेदना के उस दुर्लभ संगम की कहानी कहती है, जो राजनीति को केवल रणनीति नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों का भी माध्यम बनाती है।
