बी. के. झा
नई दिल्ली/रांची, 7 जुन
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाला चुनाव अब केवल एक औपचारिक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह सियासी रणनीतियों, संभावित क्रॉस वोटिंग और अप्रत्याशित गठबंधनों का दिलचस्प मुकाबला बनता जा रहा है। नामांकन पत्रों की खरीद ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है और कई अनुत्तरित सवाल खड़े कर दिए हैं।
गठबंधन में सब ठीक या भीतरखाने बेचैनी?
सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से झामुमो ने पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस ने प्रणव झा पर दांव खेला है। कांग्रेस नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से गठबंधन की एकजुटता का दावा किया है, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि वास्तविक तस्वीर नामांकन और मतदान के दौरान ही स्पष्ट होगी।
भाजपा की रणनीति पर सबकी नजर
भाजपा ने अभी तक अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। हालांकि भाजपा नेता गौरव वल्लभ द्वारा नामांकन पत्र खरीदने से राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल यह है कि क्या भाजपा सीधे मुकाबले में उतरेगी या किसी अन्य रणनीतिक विकल्प पर विचार कर रही है?
परिमल नथवानी और विजयसाई रेड्डी की एंट्री ने बढ़ाया रोमांच
राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा दो नामों को लेकर है—परिमल नथवानी और वी. विजयसाई रेड्डी।दोनों नेताओं का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन पत्र खरीदना कई राजनीतिक संकेत दे रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि राज्यसभा चुनाव में कोई भी गंभीर उम्मीदवार बिना पर्याप्त राजनीतिक समर्थन के मैदान में उतरने का जोखिम नहीं लेता।यही कारण है कि अब सबकी नजर उन प्रस्तावकों पर टिकी है जिनके हस्ताक्षर नामांकन पत्रों के साथ सामने आएंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल दो सीटों का चुनाव नहीं बल्कि झारखंड की भावी राजनीतिक दिशा का संकेतक भी बन सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार यदि निर्दलीय उम्मीदवारों को अपेक्षा से अधिक समर्थन मिलता है तो यह संकेत होगा कि राज्य की राजनीति में नए समीकरण आकार ले रहे हैं।
विपक्ष और सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों का आरोप है कि सत्ता पक्ष राज्यसभा चुनाव को लेकर पर्दे के पीछे राजनीतिक प्रबंधन में जुटा हुआ है। वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि गठबंधन पूरी तरह एकजुट है और किसी प्रकार की अस्थिरता की बात केवल राजनीतिक अफवाह है।
क्या दोहराया जाएगा पुराना इतिहास?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों को 2014 के चुनावी समीकरण भी याद आ रहे हैं, जब अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम ने कई विश्लेषकों को चौंका दिया था। यही कारण है कि इस बार भी हर राजनीतिक कदम को बेहद बारीकी से देखा जा रहा है।
आठ जून पर टिकी निगाहें
अब पूरा राजनीतिक परिदृश्य आठ जून के नामांकन दिवस पर केंद्रित हो गया है। प्रस्तावकों के नाम सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कौन उम्मीदवार वास्तव में मजबूत स्थिति में है और कौन केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है।
फिलहाल इतना तय है कि झारखंड का राज्यसभा चुनाव इस बार सामान्य चुनावी प्रक्रिया से कहीं अधिक रोचक, रहस्यमय और रणनीतिक मुकाबले में बदल चुका है।
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