बी के झा
NSK News

एवियन (फ्रांस)/नई दिल्ली, 17 जुन
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, समुद्री व्यापार पर मंडराते खतरे और वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत ने एक बार फिर दुनिया के सामने अपनी कूटनीतिक सोच को स्पष्ट शब्दों में रखा है। फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में न केवल अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में मारे गए भारतीय नाविकों का मुद्दा उठाया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी भी संघर्ष का समाधान युद्ध नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में देखता है।प्रधानमंत्री का यह संदेश केवल एक औपचारिक बयान नहीं था, बल्कि ऐसे समय में आया है जब दुनिया यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, ऊर्जा असुरक्षा और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरों से जूझ रही है।
तीन भारतीयों की मौत का मुद्दा वैश्विक मंच पर
जी-7 के शक्तिशाली मंच से प्रधानमंत्री मोदी ने उन भारतीय नाविकों का उल्लेख किया जिन्होंने हालिया संघर्षों के दौरान अपनी जान गंवाई। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता का असर केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दुष्प्रभाव उन हजारों नागरिकों और नाविकों पर भी पड़ रहा है जो वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला को चलाते हैं।मोदी ने स्पष्ट कहा कि समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखना पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले समुद्री व्यापार को किसी भी परिस्थिति में बाधित नहीं होने दिया जा सकता।
ट्रंप के सामने भारत की संतुलित कूटनीति
प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने किसी पक्ष का समर्थन या विरोध करने के बजाय शांति और स्थिरता को प्राथमिकता दी।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उनके ठीक बगल में बैठे थे, लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की परंपरा को कायम रखते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि सैन्य कार्रवाई की जगह बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।यह वही नीति है जिसने भारत को आज वैश्विक दक्षिण (Global South) और विकसित देशों के बीच एक विश्वसनीय सेतु के रूप में स्थापित किया है।
“विश्वास” को बताया 21वीं सदी की सबसे बड़ी पूंजी
प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण शब्द था—विश्वास।उन्होंने कहा कि आज की दुनिया पहले से कहीं अधिक परस्पर जुड़ी हुई है। ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक विकास अब किसी एक देश की सीमाओं के भीतर तय नहीं होते।मोदी ने कहा कि आधुनिक दुनिया में सबसे बड़ा रणनीतिक संसाधन तेल, गैस, खनिज या तकनीक नहीं, बल्कि देशों के बीच आपसी विश्वास है।उन्होंने संकेत दिया कि यदि राष्ट्र एक-दूसरे पर भरोसा खो देंगे तो वैश्विक संस्थाएं, व्यापारिक समझौते और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी।
कोविड का जिक्र कर दुनिया को दिखाया आईना
प्रधानमंत्री ने कोविड महामारी का उल्लेख करते हुए कहा कि संकट के समय दुनिया ने देखा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और एकजुटता के बड़े-बड़े दावे कितने कमजोर साबित हुए।महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक संस्थाओं को अधिक जवाबदेह, समावेशी और भरोसेमंद बनाने की आवश्यकता है।मोदी का यह बयान उन देशों के लिए भी एक संदेश माना जा रहा है जो वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं।”
Trust but Verify” का संदर्भ और उसका संदेश
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Ronald Reagan के प्रसिद्ध कथन—”Trust but Verify” (विश्वास करो, लेकिन सत्यापन भी करो)—का उल्लेख किया।यह केवल एक उद्धरण नहीं था, बल्कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था पर एक गहरी टिप्पणी भी थी।
विश्लेषकों का मानना है कि मोदी ने इस कथन के माध्यम से यह संकेत दिया कि भविष्य की विश्व व्यवस्था केवल घोषणाओं पर नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और वास्तविक सहयोग पर आधारित होनी चाहिए।
भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि जी-7 मंच पर प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन भारत की बदलती वैश्विक भूमिका को दर्शाता है।एक समय वैश्विक निर्णयों का दर्शक माना जाने वाला भारत आज उन देशों में शामिल है जिनकी राय को गंभीरता से सुना जाता है।ऊर्जा, व्यापार, तकनीक, जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक दक्षिण के मुद्दों पर भारत अब नीति-निर्माण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
भू-राजनीतिक संकेत भी छिपे हैं
प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को केवल शांति की अपील के रूप में नहीं देखा जा रहा।कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें कई महत्वपूर्ण संदेश निहित थे—पश्चिम एशिया में स्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।समुद्री मार्गों की सुरक्षा किसी एक देश का नहीं, पूरी दुनिया का दायित्व है।वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता है।अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार शक्ति नहीं, विश्वास होना चाहिए।युद्धों की जगह संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
दुनिया के लिए भारत का संदेश
जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन उस समय आया है जब दुनिया कई मोर्चों पर संघर्ष, अविश्वास और ध्रुवीकरण का सामना कर रही है। ऐसे माहौल में भारत ने एक बार फिर खुद को शांति, संवाद और संतुलित कूटनीति के पक्षधर राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया है।
प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट था—21वीं सदी की दुनिया हथियारों की होड़ से नहीं, बल्कि भरोसे, सहयोग और साझा जिम्मेदारी से सुरक्षित बनेगी। और यदि वैश्विक समुदाय स्थायी शांति चाहता है तो उसे युद्ध के मैदानों से अधिक बातचीत की मेजों पर निवेश करना होगा।
